तोही मोही मोही तोही अंतरु कैसा।।

 ।। तोही "मोही मोही" तोही अंतरु कैसा।।

              ।। सीरी राग।।

तोही मोही मोही तोही अंतरु कैसा।।।

कनक कटक जल तरंग जैसा।।

जउ पै हम न पाप करंता आहे अनंता।।

पतीत पावन नामु कैसे हुंता।।१।। रहाउ।।

तुम जु नाइका अछहु अंतरजामी।।

प्रभ ते जनु जानीजे जन ते सुआमी।।२।।

शरीर अराधै मो कउ बीचारु देहू।।

रविदास सम दल समझावै कोऊ।।३।।

गुरुओं के गुरु, गुरु रविदास जी ही विश्व में, ऐसे गुरु, पीर, पैगंबर, साधु, ज्ञानी संत हुए हैं जिनका कोई भी विश्व में सानी नहीं है, ना ही कभी भी होगा। किसी ने भी उनके समान अध्यात्मिक वाणी की रचना नहीं की हुई है और ना ही भविष्य में भी कोई ऐसी वाणी की रचना कर सकेगा। आत्मा और परमात्मा के बारे में अनेक टीकाकारों ने, कई साधुओं, संतों, विचारकों की वाणी की व्याख्या की हुई है, मगर आज तक गुरु रविदास जी की वाणी की तर्कसंगत तर्कपूर्ण व्याख्या किसी भी माई के लाल से नहीं हो सकी है, केवल पंजाबी लेखक प्रोफेसर दितसिंह और प्रोफेसर लालसिंह जी ने ही गुरु रविदास जी की वाणी की व्याख्या और सरल अर्थ लिखने का सफल प्रयास किया है, जब कि अन्य कोई भी बुद्धिमान बुद्धिजीवी इस कार्य को तर्कसंगत ढंग से नहीं कर सका है। गुरु रविदास जी महाराज आत्मा और परमात्मा के बारे में फरमाते हैं कि:

"तोही मोही मोही तोही अंतरु कैसा।" 

"कनक कटिक जल तरंग जैसा।।"

हे परम शक्तिमान अर्थात परम ज्योति! आप के और मेरे बीच किस प्रकार का अंतर है? किस प्रकार का भेद है ? आप विश्व के अस्तित्व में आने से पहले आप ही थे और उस के बाद भी आपने ही सृष्टि का सृजन किया हुआ है। गुरु रविदास जी आत्मा और परमात्मा के बीच अंतर को स्पष्ट करते हुए कहते हैं, कि आप ही मोही और तोही है, इस वाक्यांश में पहले तोही ही शब्द है और बीच में दो बार मोही मोही है। अंत में फिर तोही ही शब्द है, गुरु जी फ़रमाते हैं कि परम ज्योति अर्थात परमपिता परमेश्वर तोही, "मोही के पहले भी और बाद में भी आता है", इस प्रकार परम ज्योति जीवात्मा पहले भी आप के पवित्र आगोश में समाई हुई थी और आप के बाद भी आत्मा के साथ जुड़ी हुई है, इसीलिए तो कहते हैं, तोही, मोही मोही, तोही अंतर कैसा है? गुरु जी के इस कथन से स्पष्ट है कि निराकार ईश्वर तोही से ही हम जीवों का सृजन हुआ है, मोही से मेरा निर्माण हुआ है अर्थात अदृश्य परम ज्योति से ही जीवात्मा प्रकट हुई है, गुरु रविदास जी के कहने का तात्पर्य है, कि अति सूक्ष्म जीव आत्मा परम शक्ति से अर्थात परम ज्योति, ईश्वर से ही उत्पन्न हुई है, जिस प्रकार बिजली का निर्माण पानी के मंथन से होता है और उस से जो शक्ति निकलती है, उसी से ही वर्तमान में सभी जीव आत्मा रूपी मशीनरी काम करती है, यदि एक क्षण के लिए भी बिजली चली जाए, तो सॉरी मशीनरियाँ बंद हो जाती हैं, इसी तरह मोही अर्थात परम ज्योति पिता परमेश्वर अगर अपनी ज्योति रूपी शक्ति को क्षण भर के लिए खींच ले तो जीवात्मा, मृत आत्माओं में बदल जाती है अर्थात गुरुजी का फरमान है कि आत्मा का निर्माण का फार्मूला ही वैज्ञानिक है, विज्ञान के नियमों के अनुसार ही आत्मा का सृजन हुआ है इस तथ्य को कोई भी विचारक, साधु-सन्त, ज्ञानी-विज्ञानी समझ नहीं सका है। आत्मा का संबंध सोने और उस से बनी हुई श्रृंगारिक वस्तुओं का है, जिस प्रकार सोने से कंगन का निर्माण और सृजन होता है और हम उसे सोने का कड़ा या कंगन कहते हैं, मगर जब हम सोने को पिघला देते हैं तो उसे फिर सोना ही कहते हैं, इसी प्रकार जब आत्मा रूपी कंगन, सोने रूपी शरीर से निकल जाती है, तो फिर यही आत्मा परमात्मा बन जाती है अर्थात् परमात्मा में बदल जाती है, इसी प्रकार गुरु जी कहते हैं की आत्मा जल की तरंग की तरह है अर्थात जिस प्रकार तरंग, लहर जल से निकलती है, मगर कुछ ही क्षणों के बाद वह तरंग पानी में समा जाती है अर्थात समन्दर में उछला हुआ पानी, तरंग नहीं रहता है और पुनः सागर में ही समा करके पानी की तरह ही हो जाता है। गुरु रविदास महाराज परमपिता परमेश्वर! को संबोधित करते हुए कहते हैं:

जउ पै हम न पाप करंता, अहे अनंता।।

पतित पावन नामु कैसे हुन्ता।।

गुरु जी फ़रमाते हैं कि, हे परमेश्वर! यदि हम नहीं होते, तो पाप कौन करता? हे अनंत परमज्योति सर्वशक्तिमान पिता परमेश्वर, हम पाप करने वालों के कारण ही आप हैं और आप हमारे पापों का शमन करते हैं, इसीलिए तो आपको पतित पावन कहा गया है। अगर हम पापी ना होते, हम पॉप कर्म नहीं करते, तो आप भी नहीं होते। आप को भी कोई पतित को उठाने वाला, पतित के सुधारने वाला, पतित को पवित्र करने वाला अर्थात पतित पावन कौन कहता? आपका नाम पतित पावन कैसे होता? गुरु रविदास जी ईश्वर के बारे में फरमाते हैं:

तुम जु नाइक अछहु अंतरजामी।।

प्रभ ते जनु जानीजै जन ते सुआमी।।

गुरु जी महाराज फ़रमाते हैं कि, कि आप अर्थात परम ज्योति हैं, आप ही नाईक (नायक) हो क्योंकि नाईक सारी सँगत, सेना का नेतृत्व करने वाला होता है, वे आप ही है और प्रभ का शाब्दिक अर्थ भी परम ज्योति है अर्थात आप ही परमपिता परमेश्वर सभी आत्माओं का नेतृत्व करते हैं और आप ही निष्ठुर अंतर्यामी है, आप दूसरों की आत्मा की बातों, विचारों और भावों को अपनी अंतर्दृष्टि से समझते हैं। आप ज्ञान रूपी ज्योति का आदि स्रोत हैं अर्थात आप ही ज्योतिर्ज्ञानी है, ज्योतिरपुंज है आप सब की जीवात्मा को ज्योतिर्ज्ञान प्रदान करते हैं, 

"प्रभ से जन जानीजै, जन ते सुआमी"

इस वाक्यांश में गुरु जी फ़रमाते हैं कि, शाश्वत ज्योति से ही जन अर्थात जीव जगत है और जीव जगत से ही स्वामी है, यहाँ केवल जीव और परम ज्योति के स्थान का ही परिवर्तन हुआ है, ज्योति से ही जीव बनता है और जीव पुनः ज्योति में ही समा कर ज्योति ही बन जाता है। जब ऐसा होता है, तब आप के साथ समरस हो कर आत्मा भी परमात्मा का रूप बन जाती है, जिस के कारण आत्मा की पहचान का आभास नहीं होता है। आत्मा भी परमात्मा अर्थात ईश्वरीय रूप बन जाती है, इस तरह आत्मा मोही भी सर्वोच्च ज्योतिरपुंज से मिलकर परमज्योति ही बन जाती है अर्थात मोही आत्मा, तोही के बीच परिवर्तित हो कर परमात्मा में ही एकाकार हो जाती है। परमात्मा और जीवात्मा का रहस्य खत्म हो जाता है। गुरु जी आत्मा और परमात्मा के बारे में समझाते हैं कि, ज्योतिर्ज्ञान की प्रक्रिया में, पहले और अंत में मोही (ज्योतिर्ज्ञान) ही है, बीच में केवल ज्योति है, जिस से आभास होता है कि सृष्टि के आरंभ और अंत में जीवात्मा का ही वर्चस्व रहता है और बीच में परम ज्योति हमेशा विद्यमान रहती है। यही परम ज्योति जीव को प्रकाश में लाती है और यही ज्योति जीव की कमियों के कारण निष्ठुर हो कर जीवात्मा का विध्वंश भी कर देती है। जीवात्मा की पोल खोलते हुए गुरु जी फ़रमाते हैं कि:

शरीर अराधै मो कउ बीचारु देहु।।

गुरु जी खुद याचक बन कर परम ज्योतिरपुंज से अर्ज करते हैं कि, हे ज्योतिर्ज्ञान के पुंज मुझ जीवात्मा को ज्योतिर्ज्ञान की बख्शिश करो क्योंकि यह कार्य आप ही कर सकते हैं, हम तो केवल शरीर से ही आप की भक्ति कर सकते हैं, अपनी इंद्रियों को वश में रख कर काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार को त्याग सकते हैं मगर जब तक आप की मेहर की नजर नहीं होगी तब तक हमारा कल्याण नहीं हो सकता, इसलिए आप हमें ज्ञान का विचार देदो।

गुरुजी सभी धर्मों के धर्म ग्रंथों के आडंबर पूर्ण विचारों का खंडन करते हुए केवल आदपुरष की सर्वोच्चता को ही सर्वोच्च सिद्ध करते हैं, कि आप की आज्ञा के अनुसार ही सभी जीवात्माऐं कार्यशील रहती है और आप के निर्देश से वह सारे कार्यों को अंजाम देती है, गुरु जी फरमाते हैं कि आप समदृष्टि वाले हैं, आप ही जीवात्मा को अपने पवित्र ज्ञान से समझा सकते हैं, ऐसा कार्य कोई भी आपके बिना नहीं कर सकता है।

शब्दार्थ:तोही-आप, परम ज्योतिर्ज्ञानी, प्रकाश, रोशनी, परमात्मा। मोही-मैं, ज्योति से निकला हुआ ज्योति अंश, अंतर-भीतर, शरीर में। भेद- रहस्य। कनक-सोना, स्वर्ण। कटिक-कंगन, कड़ा, भिन्न भिन्न प्रकार के आभूषण। जउ पै-यदि, जेकर। हम-मैं। आहे-है। पतित-विकारों से भरपूर, अपवित्र। पावन-पवित्र, निष्कलंक।करंता-करने वाला, कर्ता, नियंत्रण करने वाला आदपुरष। अनंता-बेअंत, जिस के गुणों का वर्णन किया नहीं जाय। हुन्ता-होता। जु-जो। नाईक-नेतृत्व करने बाला, विश्व का संचालक, आछहु-निष्ठुर, निर्दयी, जिसे छुआ नहीं जाए, अदृश्य, निर्गुण, निराकार। अंतरजामी- जीवात्मा की आत्मा के रहस्य को जानने वाला। प्रभ- प्रकाश, ज्योति, रोशनी। जानीजै-जानने वाला। शरीर-काया, देह, तन। अराधै-सिमरन, साधना, आदपुरष का ध्यान करना। बीचारु-विचार करना, मेहर करना। समदल-समदृष्टि से सभी को देखना, सभी से समान व्यवहार करना, कोऊ- सभी में से कोई एक।

रामसिंह आदवंशी।

अध्यक्ष।

विश्व आदधर्म मंडल।।

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