।।। वैश्विक सरकार।।।

                ।।।वैश्विक सरकार।।।

धरती के अस्तित्व में आने पर, आदपुरष ने जब सृष्टि की रचना कर के जीव जगत को होंद में लाया था, तब सभी प्राणी समरस हो कर जीवन व्यतीत करते थे। कहीं कोई सीमा नहीं थी, कोई आपस में लड़ाई झगड़ा नहीं करता था, यहां तक की हिंसक पशु और जानवर भी किसी दूसरे को मार कर अपना शिकार नहीं बनाते थे, मगर ज्यों ज्यों प्राणी विकसित होता गया, त्यों त्यों वह स्वार्थी, दंभी, लालची, महत्वाकांक्षी, अहंकारी और अत्याचारी बनता गया, जिसके परिणाम स्वरूप आज सारी धरती सीमाओं की रेखाओं से घिरी हुई देखी जा सकती है। असंख्य सीमाओं के ऊपर, असंख्य सेना अस्त्र शस्त्रों से लैस हो कर खड़ी है, मानव मानव के खून का प्यासा बनकर एक दूसरे को अपना गुलाम बनाने के लिए दिन रात प्रयास करता आ रहा है, जिसके लिए कई प्रकार के हथियार तैयार करता आ रहा है। मानव ने मानव को अपना गुलाम बना कर, उस का खून चूसने का व्यापार शुरू कर रखा है। कबीर साहिब फ़रमाते हैं कि सभी कुदरत के बन्दे हैं, चाहे वे भले हों, चाहे मंदे मगर हैं बन्दे जिन का मालिक एक ही है। कुछ अहंकारी लोग तानाशाह बन बैठे हैं और वे अपनी शक्ति के बल पर कमजोर लोगों को अपना दास बना कर, उन का शोषण करते आ रहे हैं ।

धरती पर असंख्य शासक हो चुके हैं, मगर वे विश्व को एक झंडे के नीचे इकठ्ठा नहीं कर सके, जिस से धरती सीमाओं में बंटती ही गई है, अगर किसी ने अत्याचारियों का मुकाबला करने का साहस भी किया और सामाजिक एकता स्थापित करने का प्रयास भी किया, तो वह क्षणिक ही हुआ, उस के मरने के बाद स्थिति वैसे की वैसी ही होती रही। इन्हीं सीमाओं को देख कर, आदमी को आदमी का गुलाम देख कर, केवल चँवरवंशी सपूत गुरुओं के गुरु, गुरु रविदास जी महाराज ने, कन्याकुमारी से लेकर अरब देशों तक पदयात्रा की। जगह जगह सँगत को अपने क्रांतिकारी प्रवचनों से जागृत किया, सामाजिक समरसता के लिए तैयार किया, धार्मिक भावना जागृत की, आर्थिक दृष्टि से सभी को समानता का मार्ग बताया जिस के लिए वे कहते हैं कि:---

ऐसा चाहूं राज मैं,

जहाँ मिले सभन को अन्न।।

छोटी बड़ सभ सम वसै।

तां रविदास रहे प्रसन्न।।

इन दो पंक्तियों में गुरु रविदास जी ने, मानव की मरी हुई आत्मा को जिंदा कर दिया, उन्होंने सारे अत्याचारों की जड़ शासन को ही समझा, सारी बुराईयों के लिए शासन तंत्र को ही दोषी ठहराया तभी तो वे फरमाते हैं, कि मैं ऐसा राज चाहता हूं जहां सभी को पेट भरने के लिए अनाज मिल सके, ऊंच-नीच, छुआछूत को मानवता के माथे के ऊपर काला कलंक समझ कर वे कहते हैं कि सभी छोटे बड़े एक समान हो कर धरती के ऊपर निवास करें, तभी वे खुश रह सकते हैं। उन्होंने मानव को झुग्गी झोपड़ियों में रहते हुए देखकर, नंगे, भूखे पेट सोते हुए देखकर पशुओं की तरह जीवन जीते हुए देखा, जिससे वे व्याकुल हो उठे और आदमी को आदमी का गुलाम देखकर, गुरु जी विद्रोही हो गए, इसीलिए उन्होंने सारे विश्व में स्थाई सुख और समृद्धि स्थापित करने के लिए केवल एक वैश्विक सरकार बनाने के लिए आदर्श समाजवाद का नियम दिया, जिस के अंतर्गत कोई किसी का गुलाम नहीं हो सकता है, ना ही कोई किसी की हक हलाल की कमाई जबरन वसूल करके अपना पेट भर सकता है, भले ही वह कोई शासक ही क्यों ना हो, गुरु जी ये ऐसा मूल मंत्र देकर गए कि यदि मानव को सुख शांति से जीवित रहना है, सुखी जीवन जीना है, तो सभी को मिलजुल कर वैश्विक सरकार बनानी चाहिए, जिस से धरती की सीमाओं की सभी रेखाएं मिट जाएंगी, कहीं कोई सीमाओं के ऊपर चौकीदारी नहीं करेगा, कोई भी एक देश दूसरे देश के ऊपर आक्रमण नहीं करेगा, कोई भी शासक अस्त्र शस्त्र नहीं बनाएगा, कोई बंब, मिसाइल और रॉकेट लॉन्चर तैयार नहीं करेगा, कोई किसी का खून खराबा और कत्लेआम नहीं कर सकेगा। धरती के ऊपर चारों ओर शांति, सद्भावना और प्रेम का राज्य स्थापित होगा। इसी सोच के कारण उन्होंने मात्र दो पंक्तियों में समाजवाद की परिभाषा तैयार की थी, जिसका अध्ययन करने के बाद कार्ल मार्क्स ने बड़े-बड़े ग्रंथ लिख डाले मगर उनमें उन्होंने विश्व में स्थाई शांति स्थापित करने का कोई भी फार्मूला नहीं बताया, ताकि कोई किसी का खून ना कर सके, कोई अहंकारी शासक तानाशाह बन कर के मानवता के खून का प्यासा न बन सके, भले ही उसने मालिक और मजदूर की व्याख्या की हुई है, मगर मालिक और मजदूर की समरसता के लिए कोई रास्ता नहीं बताया है, इसीलिए जिस देश में समाजवाद आया वहां पर स्थाई शांति स्थापित नहीं हो सकी। तानाशाह को यह निर्देश तो दे दिए, कि वह निजीकरण को समाप्त करके राष्ट्रीयकरण करके समाजवाद की स्थापना करें, मगर निजीकरण से समाज में वैमनस्य और कटुता ही बढ़ती गई है, समस्याओं का स्थाई समाधान नहीं हो सका और ना ही समस्याओं का समाधान करने का किसी ने कोई प्रयास ही किया, इसी कारण मालिक और मजदूर में तनाव बढ़ता गया, खून खराबा बढ़ता गया और असंतोष दिनोदिन बढ़ता ही जा रहा है, और समाजवादी देशों के शासक तानाशाह बनते गए, जिसका साक्षात उदाहरण वर्तमान चीन की सरकार को देखा जा सकता है, चीन की तानाशाह सरकार ने अपनी सारी जनता को अपना गुलाम बना रखा है और जिस ढंग से ये अति खूंखार शासक शासन चला कर काम लेना चाहते हैं, उसी के अनुसार जनता को काम करने के लिए विवश करते आ रहे हैं। आज कम्युनिस्ट देशों में स्वतंत्रता खत्म हो चुकी है। लोग घुट घुट करके जी रहे हैं, अगर कोई क्रूर तानाशाही के खिलाफ मुंह खोलने का प्रयास भी करता है, तो शासक उसे मिटा ही देता आ रहा है। शासकों के खिलाफ कोई आवाज बुलंद कर ही नहीं पा रहा है, यह फिलॉसफर कार्ल मार्क्स के समाजवाद के दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। मगर सन्त, गुरु रविदास जी महाराज ने ऐसे स्थाई समाजवाद की कल्पना कभी नहीं की थी, वे चाहते थे कि धरती के ऊपर कोई सीमा ना हो, सारी धरती का शासक केवल एक ही हो और वह जनता को ऐसी शिक्षा दें, जिस से सारी जनता सदाचारी, इमानदार, कर्मठ और सुसंस्कृत बन सके और शासक स्वयं भी ऐसे ही सदगुणों से भरपूर हो ताकि वह किसी के साथ बेईमानी, छल कपट, अत्याचार ना कर सके। धरती के ऊपर न्याय का शासन हो, सभी एक समान हों, कोई किसी का गुलाम ना हो, कोई छोटा बड़ा ना हो, कोई अमीर गरीब ना हो, कोई काला गोरा ना हो, इसी विचारधारा से विश्व शांति की स्थापना की जा सकती है। इस सिद्धांत को यूएनओ ने भी स्वीकार करके अपने संविधान के आर्टिकल नंबर एक में शामिल कर लिया है मगर आज तक वैश्विक सरकार बनाने के लिए कहीं कोई चुनाव यूएनओ नहीं करवा सका है, जिस के कारण आज सिरफिरे तानाशाहों के आदेशों से स्टारवारों में लाखों-करोड़ों मानव मारे जा रहे हैं। अगर गुरु रविदास महाराज जी के इस सिद्धांत को विश्व स्वीकार कर लेता, तो संसार में स्थाई शांति की स्थापना की जा सकती थी, कहीं कोई युद्ध ना होता, कोई तानाशाह ना होता और ना ही आदमी, आदमी को गुलाम बनाकर के रख सकता था। काश! कि विश्व गुरु रविदास जी महाराज के समाजवाद को समझ सके और दिन प्रतिदिन बढ़ते आतंकवाद को दफन किया जा सके। इसी सिद्धांत से ही विश्व में स्थाई शांति की स्थापना हो सकेगी।

रामसिंह आदवंशी।

अध्यक्ष।

विश्व आदधर्म मंडल।


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