।।घट अबघट डूगर घना।।
।। घट अबघट डूगर घना।।
।। राग गौउड़ी बैरागण।।
सारे संसार में अनेकों धर्म हैं मगर किसी भी धर्म के अवतार और पैगंबर ने यह दृढ़ विश्वास के साथ नहीं कहा है, कि मैं अकेला ही दिव्य ज्ञान का स्रोत हूं। अकेला ही ज्योतिर्ज्ञानी हूं मगर गुरु रविदास महाराज ने कहा है, कि मैं ज्योतिर्ज्ञान का स्वामी हूं और मेरा ज्ञान का उद्योग है, जिस के उत्पादों का विक्रेता भी हूं। विश्व में कोई भी ज्ञानी ऐसा दावा नहीं कर सका है। गुरु जी के इस कथन की प्रमाणिकता निम्नलिखित शब्द से होती है:---
"घट अबघट डूंगर घना, इक निर्गुण बैलु हमार।।"
गुरु रविदास जी महाराज शरीर को धरती के समान मानते हैं, जिस प्रकार धरती के ऊपर अनेकों नदी, नाले, ऊंचे-नीचे, पर्वत, पहाड़, उन के बीच गहरी और खूनी जोतें (घाटियां) हैं, जिन में से मानव के लिए गुजरना खतरे से खाली नहीं है। गुरु जी फरमाते हैं कि केवल मॉनव के शरीर के बीच ही कई प्रकार की दुश्वार घाटियां हैं, जिन की उबड़ खाबड़, ऊँच नीची, गहरी खाईयों में से गुजरना मृत्यु को संदेश भेज कर मृत्यु को बुलाना है। गुरु जी फ़रमाते हैं, कि शरीर रूपी जंगल बहुत ही घना है, जिस के बीच निराकार परमात्मा का अंश आत्मा रहती है, जिसका नियंत्रक केवल बैल (मन) है, यह मन आत्मा को कई प्रकार के आदेश देकर अच्छे और बुरे कर्म करवाता है, इस बेलगाम मन के सारथी काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार हैं, जिन को गुरु जी खतरनाक ही नहीं अपितु अति कठिन खूनी घाटियां मानते हैं, जिन में से आत्मा को गुजरना अति कठिन होता है।
"रमई ऐ सिउ इक बेनती, मेरी पूंजी राखु मुरारि।।१।।"
गुरु रविदास जी महाराज परमपिता परमेश्वर के आगे विनती करते हैं, कि हे परमेश्वर! मुझे काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार आदि डाकुओं से बचा कर रखना, कहीं ये मेरी ज्ञान रूपी संपत्ति को चुरा ना सके
को बंजारो राम को, मेरा टांडा लादिया जाई रे।। १।। रहाउ।।
हंऊँ बनजारो राम को, सहज करउ ब्यपारू।।
मैं राम नाम धन लादिआ, विखु लादी संसारि।।२।।
गुरु रविदास महाराज जी ज्ञान के व्यापारियों से पूछते हैं, कि यहां ऐसा कौन ऐसा व्यापारी है ? जो राम नाम अर्थात ज्योतिर्ज्ञान का व्यापार करता है, यदि कोई राम नाम अर्थात ज्योतिर्ज्ञान का व्यापार करता है और वह खालस (बिना मिलाबट, पवित्र) सामान खरीदना चाहता है, तो वह मेरे पास आकर सामान खरीद सकता है और मेरे टांडे अर्थात ज्योतिर्ज्ञान से भरी हुई गाड़ी में से अपनी पसंद का सामान मुफ्त में ले जा सकता है। गुरु जी ज्योतिर्ज्ञान के व्यापारियों को आह्वान करते हैं, सच्चा व्यापारे निडर हो कर अपनी पूंजी इस सच्चे व्यापार में लगा सकते हैं। मेरा व्यापार करने का तरीका बहुत ही सरल और आसान है। मेरे सिवाय दुनियां में, कोई भी ऐसा खालस, ईमानदार, सच्चा-सुच्चा और विश्वसनीय व्यापार करने वाला व्यापारी नहीं है, क्योंकि सारे संसार में जितने भी धर्म हैं और उन के व्यापारी हैं उनके पास केवल विषैला समान है, जिस को खरीद कर कोई भी सुखी नहीं रह सकता है और वह सांप के विष की तरह ही अच्छे व्यापारी को बर्बाद कर सकता है, इसलिए ईमानदार और सच्चे सुच्चे व्यापारी ही मेरे पास आकर व्यापार करने का तरीका सीख सकते हैं और दूसरों को भी व्यापार करना सिखा सकते हैं। गुरु जी यहीं पर नहीं रुकते हैं, वे खरीददारों को भी पूरा विश्वास दिलाते हैं, कि मैंने ज्योतिर्ज्ञान प्राप्त कर लिया है, इस कर के यमदूत मेरे पास नहीं आ सकते हैं और ना ही मेरा कुछ नुकसान कर सकते हैं।
उआर पारके दानिआ लिखी लेहु आल पातालू।।
मोहि जम डन्ड न लागी, तजि ले सरब जंजाल।।३।।
ब्राह्मण तिलकधारियों द्वारा घड़े गए कल्पित चित्रगुप्त का भी उपहास उड़ाते हुए गुरु जी फरमाते हैं कि, अगर कहीं तूँ जिंदगी का लेखा जोखा रखता है तो, जो तूँ मेरे जीवन का बेकार का बकबास अर्थात उल जलूल लिखना चाहता है, उसे लिख ले अर्थात जिस प्रकार आप के जनेऊधारी ब्राह्मण मेरे खिलाफ झूठे आरोप पत्र राजाओं को लिख कर मुझे परेशान करते रहे, और हर बार राजाओं की अदालत में मुंह की खाते रहे, वैसे ही तूँ भी झूठे आरोप लिख ले, उस के बाबजूद मुझे तेरे यमदूत कोई भी किसी प्रकार का दंड नहीं दे सकते।
जैसा रंग कसुंभ का, तैसा यह संसारु।
मेरे रमईए रंग मजीठ का कहु रविदास चमार।४।। १।।
गुरु रविदास जी महाराज सांसारिक जीवों और परमात्मा के अस्तित्व के बारे में फरमाते हैं, कि यह संसार कुसुंभ (सेंवल पेड़ ) के लाल लाल रंग के सुंदर फूल की तरह है, जो सुबह खिलता है और शाम को मुरझा जाता है, परंतु ईश्वर का रंग कुसुंभ के फूल की तरह कच्चा नहीं है। यह स्थिर रहता है। ईश्वरीय रंग तो शाश्वत और पक्का है, उस का अस्तित्व शाश्वत है, उस का रंग गेरुए रंग की तरह पक्का और स्थाई है।
गुरु रविदास जी महाराज ने, यह शब्द मुंबई और अहमदाबाद के बीच बहने वाले सूर्य नदी के तट पर सतगुरु कबीर साहब, सतगुरु सेन जी, सतगुरु नामदेव जी और सतगुरु संदना जी के साथ एक विचार गोष्ठी के बीच रचा था। सूर्य नदी के दूसरी ओर कुसुंभ पेड़ों का जंगल है, जो आज भी मौजूद है। इस पेड़ के लाल रंग के सुंदर सुंदर फूलों को देख कर ही गुरु रविदास जी महाराज ने यहां कुसुंभ फूल के अस्तित्व का वर्णन किया है यह फूल एक दिन का मेहमान होता है और शाम को इस की इह लीला समाप्त हो जाती है। गुरु जी ने प्राणी जगत की तुलना कुसुम फूल से की है और ईश्वर की तुलना गेरुए रंग से की हुई है, जिस की चमक और आभा कभी धीमी नहीं पड़ती है। कभी खत्म नहीं होती है। इस की चमक शाश्वत है, इस से स्पष्ट होता है, कि गुरु रविदास जी महाराज को पूर्ण ईश्वरीय ज्ञान था, तभी तो उन्हों ने इस अंतर को प्रमाण सहित स्पष्ट किया है। वास्तव में इन प्रमाणों से यह साबित हो जाता है, कि गुरु रविदास महाराज की तुलना किसी भी संत महापुरुष और अवतार, पैगंबर से नहीं की जा सकती है। वे सचमुच ही गुरुओं के गुरु, सन्तों में शिरोमणि सन्त हुए हैं।
शब्दार्थ:घट-दो पहाड़ियों के बीच छोटी घाटी, मन, आत्मा, शरीर। अबघट-गहरा मार्ग, कठिन रास्ता। डूंगर-दो पहाड़ियों के बीच गहरी खाई। घणा-सघन, वहुत ही घना। निर्गुण-गुणों के बिंना, अयोग्य, जिस आदमी ने कोई व्यवसाय सीखा ना हो। रमईआ-ईश्वरीय, परमात्मा। सिऊँ-से। पूंजी-धन, सम्पत्ति। मुरारि-परमेश्वर। को- कौन। बनजारों-व्यापारी, चूड़ियां बेचने वाला। को-का। टांडा-सामान ढोने का छकड़ा, गाड़ी, रेल। हम-गुरु रविदास जी। सहज-सरल, आसान। करउ-करता हूँ। बिखु-विष, जहर, पांच विकार। लादी-गाड़ी में भरा हुआ। उरवार पार-नदी के एक किनारे को उआर और नदी के दूसरे किनारे को पार कहते हैं। दानिया-ब्राह्मणों द्वारा कल्पित जीवन का लेखा जोखा रखने वाला चित्रगुप्त जो पात्र तर्कसंगत नहीं है। ऑल पताल-उल जलूल की बातें, तर्कहीन बातें। तजी ले-त्याग दे, छोड़ दो। जंजाल-बंधन, मच्छलियों को पकड़ने वाले जाल की तरह, मोह के बंधन। कसुंभ-सेंवल का पेड़ जिस के फूल सुबह खिलते और शाम को मुरझा जाते हैं, क्षणिक जीवन। मजीठ-गेरूआ रंग, शास्वत रहने वाला रंग।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
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