मेरी संगति पोच सोच दिन राति।।
।।मेरी सँगत पोच, सोच दिन राति।।
।।राग गौउड़ी।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि गौड़ी राग स्नेह, दया और ईश्वर भक्ति की भावना से ओतप्रोत राग है, इसलिए इस राग में भक्ति भाव का समावेश है। गुरु जी भारतीयों की दयनीय दशा को देख कर उन के दुखों को दूर करने के लिए संघर्षरत थे, जातीय, धार्मिक, सामाजिक भेदभाव से असहाय सँगत उद्धार के लिए दिन रात प्रयास करते जा रहे थे, जिससे ब्राह्मण बड़े ही चिंतित और दुखी थे, क्योंकि गुरु रविदास जी सामाजिक समानता के लिए धर्मयुद्ध कर रहे थे जो ब्राह्मणों को रास नहीं आ रहा था, जिस के कारण वे आए दिन झूठे आरोप लगा कर गुरु जी को मुकद्दमों में उलझाते रहते थे, गुरु जी इन्हीं गिरिजनों को ऊपर उठाने के लिए आदपुरष से अर्ज करते हुए फरमाते हैं:---
मेरी संगति पोच, सोच दिनु राती।।
मेरा करमु कुटिलता जनमु कुभाँति।।१।।
गुरु रविदास जी महाराज बड़े स्वाभिमान से कहते थे, कि मैं खलास चमार हूं, फिर कोई उन्हें कहे की गुरु जी फरमाते हैं, कि मैं नीच हूँ, मेरी जाति और संगत नीच लोगों के साथ हैं अर्थात शूद्र वर्ण के साथ है, जिन के बारे में, मैं हर समय, दिन रात सोचता रहता हूं, क्या यह व्याख्या तर्कसंगत है ? क्या गुरुजी के फरमान के साथ इस व्याख्या का संबंध जोड़ा जा सकता है ? कदापि नहीं, क्योंकि गुरु जी ने हमेशा ही अपने आप को चमार कहा और लिखा है, अगर वे यह कहते कि मेरी संगत नीच लोगों के साथ है तो उनके साथ बहुत बड़ी बेईमानी लगती है, जिन इन व्याख्या कारों ने, ये अर्थ निकाले हैं, उन्होंने गुरु जी के स्वाभिमान, तर्क और उन के मानतावादी दृष्टिकोण को कतई नहीं समझा है। इसीलिए ये लोग लिखते हैं, कि गुरु जी कहते हैं कि मेरा कर्म भी छोटा और अस्वच्छ है। भला जिस गुरु के 52 शिष्य राजा, महाराजा, बेग़में, बादशाह और महारानियाँ हों, क्या उन का गुरु कोई कुटिल, व्यवसाय कर सकता था? क्या वे अपने गुरु को ऐसा करने देते ? कुछ मूर्ख तो गुरु जी कहते हैं, कि जीवन के आरंभ में तो वे वहुत साधन संपन्न थे, बाद वे गरीबी से जूझते रहे और अपना चर्म कर्म का व्यवसाय करने के लिए विवश हो गए थे, मैं उन से पूछना चाहता हूँ कि, जब गुरु जी के मोक्ष के बाद ब्राह्मणों ने उन का सारा साहित्य ढूंढ ढूंढ कर जला दिया था, फिर इन ब्राह्मण लोगों को ऐसी कुतर्कपूर्ण कथाएं कहां से मिल गईं ? ब्राह्मण लोग झूठी, कल्पित कथाओं के सृजक तो जन्मजात ही हैं,इसीलिए ऐसी दंतकथाएं घड़ कर, अपनी पराजय का बदला लेने के लिए गुरु जी के दामन को दाग लगाने का निंदनीय प्रयास करते आए हैं। जिस के शिकार चँवरवंशी स्कालर भी हो रहे हैं। वे भी गुरु जी के खिलाफ लिख रहे हैं कि उन की हत्या कर दी गई थी, जिस के बारे राजस्थानी भाषा में में लिखी गई बारें, कथाएं, गीत और नाटक आदि हैं। मगर मैं इन लोगों से पूछना चाहता हूं कि, जब कोई भी चँवरवंशी शिक्षित था ही नहीं तो फिर किस अछूत या शूद्र वर्ण के लेखक ने ये दूषित साहित्य लिखा है ? जिस को आधार बना कर हमारे ही शूद्र वर्ण के पीएचडी धारक भी वही किंबदन्तिया अंधाधुंध लिखते आए हैं।
गुरु जी तो राजवंश से संबंध रखते थे, उन के पिता और बाबा बहुत बड़े उद्योगपति थे, उनकी संतान क्या चर्म कर्म कर सकती थी? यह चिंतन का विषय है? कुछ लोग लिखते हैं, कि गुरु जी कहते हैं कि मेरा जन्म ही कुभाँति है। क्या किसी का जन्म बुरा हो सकता है ? क्या जन्म लेने का ढंग बुरा हो सकता है ? जन्म मरण की प्रक्रिया तो प्राकृतिक है, जिससे सृष्टि का श्रृंगार होता है सृष्टि का विकास होता है, इसलिए कुभाँति के अर्थ गुरु के जीवन चरित्र से जोड़ना सरासर बेईमानी है, जिस आक्षेप को किसी भी स्थिति में सहन नहीं किया जा सकता।
गुरु रविदास जी महाराज ने हमेशा चारों वर्णों को मानवता का संदेश दिया है, मगर ब्राह्मणों ने उनके साथ ऐसा व्यवहार किया, जैसा व्यवहार जानवर तक नहीं करते हैं, इसीलिए शायद वे कहते हैं, कि मेरी संगत महानीचों के साथ है और उन से बचाने के लिए, मैं सभी जातियों और धर्मो के भोले भाले लोगों के लिए दिन रात सोचता रहता हूं, मैं यह इन भूले भटके लोगों को भी रास्ते पर लाने का प्रयास कर रहा हूं, ये कार्य अत्यंत टेढ़ा मेढ़ा है और कुटिल है। इन लोगों का जन्म लेना ही व्यर्थ है।
राम गुसईंआँ जिअ को जीवना।।
मोहि ना बिसारहु, मैं जनु तेरा।।१।।रहाउ।।
गुरु रविदास जी आदि पुरुष के समक्ष दुहाई देते हुए फ़रमाते हैं कि, ब्राह्मणों ने जीवों का जीना दुश्वार कर दिया है, इसलिए हे मेरे आद पुरुष, राम गुसाईं! इन असहाय जीवों की भलाई और कष्टों का निवारण के लिए मुझे पूर्ण शक्ति दे दो ताकि में दुखी लोगों के दुखों को दूर कर सकूं। ऐ मेरे मालिक मेरी इस अर्ज को, प्रार्थना को भुला मत देना, मैं तेरा ही भेजा हुआ धरती के ऊपर तेरा प्रतिनिधि हूं।
मेरी हरहु बिपत्ति जन करहु सुभाई।।
चरण ना छाडिउ, सरीर कल जाई।।२।।
हे प्रभ जी! मुझे इन ब्राह्मणों ने बहुत परेशान कर रखा है, मुझे पल पल परीक्षाओं के बीच में से गुजरना पड़ रहा है, मैं कई बार क्रूर राजाओं महाराजाओं, बादशाहों के पास परीक्षा दे चुका हूं, ताकि तेरे मासूम बच्चों का उत्साह और हिम्मत बनी रहे, मगर ये दुष्ट लोग मेरा पीछा नहीं छोड़ रहे हैं, इसलिए मेरी मुसीबतों को दूर करो और मुझ में अपनी इतनी शक्ति पैदा कर दो, कि इन विकृत लोगों को मानसिक रूप से बदल कर अच्छे इंसान बना सकूं, इन लोगों के स्वभाव को परिवर्तित करने की मुझ में शक्ति पैदा कर दो, मैं आपके चरण कमलों को कभी भी नहीं छोडूंगा, चाहे मेरा शरीर ये लोग नष्ट ही क्यों न कर दें।
कहु रविदास परउ तेरी साभा।।
बेगि मिलहु जन करि न बिलांभा।।
हे परमपिता परमेश्वर! इन पंडे, पुजारियों ने मेरा जीना मुहाल कर दिया है, इसलिए मैं आप की शरण में आया हूं, मुझे संभाल लो ताकि मैं इन अत्याचारियों का मुकाबला कर सकूं और इनको मुंहतोड़ जवाब देता रहूं ताकि ये लोग सदियों के गुलाम मूलनिवासियों को दुखी ना कर सकें। ऐ मेरे परमपिता परमेश्वर!अब देर मत करो जल्दी से आ कर के अपने जन को मिल जाओ और अपनी शक्ति देकर मुझे क्रूर अत्याचारियों का मुकाबला करने के लिए साहस, हिम्मत और अध्यात्मिक ज्ञान का वरदान दो।।
गुरु रविदास जी महाराज तो स्वयं ही, दैवीय, आध्यात्मिक शक्ति सम्पन्न थे, वे किसी भी जाति को ऊँचा और नीचा, छोटा बड़ा नहीं मानते थे, बड़े स्वाभिमान से सिकन्दर लोदी के दिये तमगे चमार शब्द को सीने से लगा कर विश्व में भ्रमण करते थे। उन की दिव्य शक्तियों को देख कर खूंखार बादशाह सिकन्दर लोदी, बाबर भी उन के चरणकमलों पर अपने कलंकित मस्तक को झुकाते थे, उन के आदेश से भारत में बादशाहों ने बेगमपुरा स्थापित कर दिया था। बाबन महा राजाओं ने बेताज बादशाह गुरु रविदास जी के पास आत्मसमर्पण कर दिया था, उन को हीरे मोतियों, सवर्ण मुद्राओं के थाल चढ़ावे में चढ़ते थे, मगर विकृत मानसिकता के लोग उन्हें जूते मुरम्मत करते हुए दिखाते आ रहे हैं, जब कि गुरु जी फिन रात पैदल चल कर जगह जगह सँगत को सत्संग देते हुए क्रान्ति का संदेश देते थे। गुरु जी को लगाए अपमानजनक आक्षेप तर्कसंगत नहीं है। गुरु जी का अपमान करने से इन लोगों को बाज आना चाहिए, अन्यथा कर्म गति भुगतनी पड़ेगी, क्योंकि कबीर साहिब फ़रमाते हैं कि:
"कर्म गति टारे न टरै।।"
अर्थात कर्मों की चाल बड़ी विचित्र है, जो टाले करने पर भी टलती नहीं है। जीव जितने प्रतिशत अच्छे कर्म करता है, उतने प्रतिशत अच्छे फल अवश्य मिलते हैं, मगर जितने प्रतिशत बुरे कर्म करता है, उतने ही प्रतिशत कठोर यातनाएँ भी झेलनी पड़ती हैं, कोई साध, बाबा इस का टाला टप्पा नहीं कर सकता।
शब्दार्थ:---संगति-प्रिय या दुर्जनों का साथ, मेलजोल। पोच-महानीच, दुष्टात्मा, जो काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार में संलिप्त रहता है। इन्हें ही पांच दूत भी कहा जाता है। सोच-चिंतन, चिंता, फिकर। कुटिलता-टेढ़ा मेढ़ा, कपट छल की भावना, बुरा चाल चलन, बुरे विचार। जन्म-माता के गर्भ से जीव का संसार में प्रकट होना। जिंदगी-जीने का समय, जीव की आयु।कुभाँति-बुरी तरह, पाप से युक्त जीवन।गुसईंआँ-गो का अर्थ गोल धरती और सुआमी का अर्थ है मालिक अर्थात धरती का मालिक। जीआके- जीव के। हरहु-दूर करना, कष्ट हटाना। बिपति-मुशीबत, बुरा होना, दुखों का पहाड़ टूटना। जन-सेवक, आदमी। करहु-करना, किसी का कार्य करना। सुभाईं- स्वभाव, सौभाग्यशाली कल-यहाँ अर्थ काल लगेगा, मौत, मृत्यु। परऊँ-पड़ना, पांव पर गिरना, आत्मसमर्पण। साभा-शरण। बेगि-तीव्र गति, शीघ्र, जल्दी जल्दी। देर- ढील करना, समय बिताना।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
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