तत्व सिद्धांत भाग सात।।

 ।।तत्त्व सिद्धांत भाग सात।।

लेखक:---प्रोफेसर लालसिंह।

गतांक से आगे:---इन तथ्यों से बिंना शक और संकोच से सिद्ध हो गया है कि, गुरु रविदास जी ने श्लोंकों की रचना की है। इस तथ्य को झुठलाया नहीं जा सकता है, क्योंकि बाहरी वाणी के सारे के सारे उपलब्ध प्रारूपों के बीच ये शलोक दर्ज हैं, इसलिए सिद्ध हो गया है कि, डाक्टर साहिब सिंह का निर्णय सही नहीं है और ये भी सिद्ध हो गया है कि, ये शलोक नंबर 242 गुरु रविदास जी की ही रचना है।

2 सिटा नंबर 2 के अनुसार, डाक्टर साहिब सिंह ने सिरलेख ना होने के कारण यह निर्णय ले लिया है, कि शलोक नंबर 242 गुरु कबीर जी का है। इस तथ्य की परिपक्वता शलोक नंबर 242 और 213 के नीचे दिया गया नोट करता है:--- 

"नोट:---"महला" 5 के शलोक सिर्फ तीन हैं - नंबर, 209, 210,211। अब फिर कबीर जी के उच्चारे गए शलोक हैं, क्योंकि इन का सिरलेख "महला-5" नहीं है।"

डाक्टर साहिब सिंह इस नोट के बीच दलील देते हैं कि शलोक नंबर 212 और 213 के आरंभ में सिरलेख नहीं है, इसलिए ये शलोक गुरु कबीर जी के हैं, परंतु ये निर्णय सही नहीं है क्योंकि शलोक नंबर 212 और 213 के लिए अलग सिरलेख की जरूरत नहीं है। शलोक नंबर 209, 210 और 211 के लिए "महला 5" सिरलेख तो "गुरु नानक पंजवाँ" भाव गुरु अर्जुनदेव  जी को कर्ता के तौर पर स्पष्ट करने के लिए आया है।परंतु "भगतों की वाणी"  के बीच ऐसी कोई समस्या नहीं है। इस कारण शलोक नंबर 212 और 213 के कर्ता गुरु कबीर जी नहीं हैं बल्कि इन श्लोकों के बीच जिन महापुरुषों के नाम दर्ज हैं, वही उन के कर्ता हैं।

इस तरह यदि शलोक के आरंभ में कोई सिरलेख नहीं है और श्लोक के अंदर दर्ज नाम, मुख्य सिरलेख वाले नाम से भिन्न है, तब भी वह शलोक हर हालत में शलोक के बीच दर्ज नाम वाले की ही रचना है।

इस सिद्धांत की परिपक्वता गुरु अर्जुनदेव जी ने "शलोक शेख फरीद के" सिरलेख के नीचे आए श्लोकों के बीच की है, जिस प्रकार शलोक नंबर 21 के बीच "नानक नाम दर्ज है और इस के आरंभ में कोई सिरलेख नहीं है:---

मुख्य सिरलेख:---"शलोक शेख फरीद के"

हंऊँ (मैं) ढूढेंदी (तलास) सजणा, सजणु मैंडे नाल।।

नानक अलखु न लखीए, गुरमुखि देई दिखालि।। ।।121।। पृष्ठ 1384

डाक्टर साहिब सिंह ने इस शलोक को गुरु रामदास जी का माना है। इस तरह "शलोक भगत कबीर जीऊ के "बीच शलोक नंबर 242 के बीच "रविदास" नाम दर्ज है। इस शलोक के आरंभ में कोई सिरलेख नहीं है:---

मुख्य सिरलेख:--- "शलोक भगत कबीर जीऊ के"

हरि सो हीरा छाँड़ि कै करहि आन की आस।।

ते नर दोजक जाहिंगे, सति भाखै रविदास।। 242।। पृष्ठ :1377

डा साहिब सिंह ने इस शलोक को गुरु कबीर का माना है। उपरोक्त दोनों श्लोकों के बीच सँयुक्त नुक्ते नीचे लिखे हैं:---

1 दोनों श्लोकों के मुख्य सिरलेख हैं।

2 दोनों श्लोंकों के आरंभ में कोई सिरलेख नहीं है।

3 दोनों श्लोकों के अंदर मुख्य सिरलेख की अपेक्षा अलग नाम दर्ज है।

इन संयुक्त नुक्तों से परिणाम भी सँयुक्त अर्थात एक ही निकलेगा परन्तु डा साहिब सिंह दोनों श्लोकों की उपरोक्त सांझ के होते हुए भी एक सांझा निर्णय नहीं लेते हैं। वे शलोक नंबर 121 को तो गुरु रामदास जी का मानते हैं और शलोक नंबर 242 को गुरु कबीर जी का मानते हैं। डाक्टर साहिब सिंह का ये निर्णय सारा ही ठीक नहीं है। यदि उपरोक्त नानक नाम वाला शलोक गुरु रामदास जी का है तो उपरोक्त रविदास नाम वाला शलोक गुरु रविदास जी का क्यों नहीं। इस को दूसरे ढंग से भी प्रस्तुत किया जा सकता है। यदि गुरु रविदास नाम वाला उपरोक्त शलोक गुरु कबीर जी का है, तब उपरोक्त नानक नाम वाला शलोक शेख फरीद जी का क्यों नहीं है।

डाक्टर साहिब सिंह का नानक नाम वाले शलोक वाला निर्णय सही नहीं है। इस आधार से ही शलोक नंबर 242 वाला निर्णय लेना पड़ेगा, इसलिए गुरु रविदास वाले शलोक के कर्ता का नाम गुरु रविदास जी ही है।

नानक नाम वाले शलोक नंबर 121 का निर्णय क्यों सही है? इस पर विचार करते हैं:---

उपरोक्त नानक नाम वाले शलोक के आरंभ के बीच महला का उल्लेख नहीं है। इसी कारण ये निश्चित करने के बीच मुश्किल हो गई है कि ये किस नानक का शलोक है ? इस शलोक का  निर्णय करने के लिए डाक्टर साहिब सिंह लिखते हैं:---

"नोट:---यह शलोक गुरु रामदास जी का है। राग काहनड़ें की वार की पंद्रहवीं पौउड़ी के बीच आया है।" 

उपरोक्त नोट से स्पष्ट हो जाता है कि ये शलोक चौथे नानक गुरु रामदास जी का है परन्तु ये सहायता लेना इसलिए जरूरी हो गई है कि ये निर्णय किया जा सके कि ये शलोक किस नानक का है ? क्योंकि मुख्य सिरलेख शलोक शेख फरीद के अधीन शलोक नंबर 121 के आरंभ में कोई महला दर्ज नहीं है।

इस नोट का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि गुरु रामदास जी का शलोक गुरु ग्रन्थ साहिब के बीच राग काहनड़ा की वार के बीच मिलता है, इसलिए गुरु रामदास जी का है। इस विचार को मानने से तो ये सिद्ध हो जाता है कि यदि यह श्लोक वार के बीच ना होता तो डॉक्टर साहब सिंह के अनुसार यह शलोक शेख फरीद जी की रचना सिद्ध हो जानी थी, जिस प्रकार उन्होंने श्लोक नंबर: 242 को गुरु कबीर जी का मान लिया है। सो इस नोट का मुख्य मंतव्य केवल यह स्पष्ट करना है कि यह शलोक गुरु राम दास जी का है। इस सहायता के बिना इस श्लोक के कर्ता का पता ज्ञात नहीं होंना था। जिन श्लोकों के आरंभ में महल्ला दर्ज है, वहां ऐसी सहायता की आवश्यकता नहीं पड़ी है, क्योंकि महल्ला स्पष्ट कर देता है की यह किस गुरु का श्लोक हैं।

जिस प्रकार उपरोक्त चर्चा से यह सिद्ध हो गया है कि श्लोक नंबर 121 शेख फरीद जी का नहीं है बल्कि गुरु रामदास जी का है उसी तरह यह भी सिद्ध हो गया है कि श्लोक नंबर 242 गुरु कबीर जी का नहीं है बल्कि गुरु रामदास जी का है। 

एक और दृष्टिकोण से विचार करने से भी श्लोक नंबर 242 गुरु रविदास जी का ही सिद्ध होता है जहां श्लोक के आरंभ में महल्ला सिरलेख आया है और श्लोक के अंदर दर्ज नाम गुरु कबीर जी या बाबा फरीद जी के ही हैं, वहां विचार तो उपरोक्त दोनों महापुरुषों के ही हैं परंतु महल्ला उन्हीं विचारों को संदेह पड़ने से बचाने के लिए और स्पष्ट करता है।

जहां श्लोक के आरंभ में महल्ला सिरलेख नहीं है, परंतु अंदर नानक नाम दर्ज है, वहां नानक के विचार हैं। इस प्रकार के श्लोक अगले और पिछले श्लोकों की विचारधारा की लड़ी को निरंतर अटूट रखने के लिए प्रयोग किये गए हैं। यदि ऐसे श्लोक दर्ज नहीं किए जाते हैं, तो श्लोकों के बीच विचरण कर रही विचारों की लड़ी टूट जानी थी और विचारधारा के बीच निराशा पड़ जानी थी, जिस के कारण समूची विचारधारा अस्पष्ट और धुंधली बन कर साधक के रूहानी विकास के बीच रुकाबट बन जानी थी।

इस दृष्टि से चर्चा करने के उपरांत भी यही सिद्ध होता है कि शलोक नंबर 242 गुरु रविदास जी का है और शलोक नंबर 121 गुरु रामदास जी का है। शलोक नंबर 242 की जगह पर गुरु कबीर जी का कोई भी ऐसा शलोक नहीं था, जो विचारधारा के बीच पड़े घपे (अंतराल) को पूरा कर सकता है, इसलिए गुरु रविदास जी के इस शलोक को घपा पूर्ण करने के लिए ही यहाँ शलोक नंबर 242 के ऊपर दर्ज किया गया है। शलोक के बीच गुरु रविदास जी का नाम दर्ज होने के कारण पति और श्लोक के आरंभ में सिरलेख ना होने के कारण ये गुरुजी दे निरोल, उन के अपने ही मौलिक विचार हैं।

कई विद्वानों ने डॉक्टर जोध सिंह के इस श्लोक को गुरु रविदास जी का माना है। उन्होंने बिना शक और संकोच के अपनी पुस्तक "भगत रविदास, जीवनी और रचना" के अंत में इस श्लोक को पृष्ठ नंबर 51 के ऊपर दर्ज किया है।

इसलिए परिपक्वता के साथ स्पष्ट तौर से दृढ़ हो गया है कि श्लोक नंबर 242 गुरु रविदास जी की ही मौलिक रचना है, जिसको गुरु कबीर जी के श्लोंकों के बीच विचरण कर रही विचारधारा के बीच पये घपे (अंतराल) को पूर्ण करने के लिए प्रयोग किया गया है।

अनुवादक।

राम सिंह आदवंशी।




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