बेगमपुरा शहर को नांऊँ।।

 

          ।।।बेगमपुरा शहर को नांऊँ।।
             ।।राग गौड़ी गुआरेरी।।
गुरु रविदास जी ने संसार में फैली हुई तानाशाही गुंडागर्दी, माब्लिंचिंग, छल कपट अत्याचार कत्लेआम, छुआछूत, ऊंच-नीच, काले, गोरे के भेदभाव का मुख्य कारण यही अनुभव किया है कि, इन समस्याओं का केवल मात्र धरती का बंटवारा ही है। कुछ शैतान लोगों ने धरती को टुकड़ों में विभाजित कर रखा है, जिस से धरती खण्ड खण्ड हो गई है और उसके स्वयंभू मालिक अमीर भूमालिक राजा, महाराजा, बादशाह बन बैठे हैं। ये लोग अपने अहंकार के कारण प्रजा को दुखी करते हैं, युद्धों में मारते हैं, आदमी को आदमी का गुलाम बना कर रखते हैं, जिस के स्थाई हल के लिए उन्होंने सारे देशों की सीमाओं को समाप्त कर के, केवल एक शहर विकसित करने का नियम प्रस्तुत किया है। जिस के तहत नए विश्व शहर का नाम बेगमपुरा रखा गया है। बेगमपुरा का अर्थ है, वह स्थान जहां गम नहीं होता है, सभी लोग सुख, शांति और आनंद से रहते हैं। गुरु जी बेगमपुरा का रोड मैप बताते हुए कहते हैं:---
बेगमपुरा शहर को नांऊँ।।
दुख अंदोहू नहीं तिहि ठाऊँ।।
गुरु रविदास जी महाराज, फरमाते हैं धरती के विभाजन से मानवता का भी विभाजन हो गया है, जिसके कारण मानव मानव के ही खून का प्यासा बन चुका है, इस का मुख्य कारण ही धरती के ऊपर अनेक देशों का निर्माण है, जिस के कारण धरती टुकड़ों टुकड़ों में विभक्त हो चुकी है और इन विभाजन की रेखाओं के बीच सिमटा हुआ विश्व कुछ एक लोगों की बपौती बन चुका है। ये लोग इन खंडों के तानाशाह बन कर, अपना जीवन तो सुख शान्ति से जी रहे हैं मगर जनता का जीना दूभर करते आए हैं, जिस के कारण सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक समस्याएं पैदा हो चुकी हैं, जिन के कारण समस्त विश्व के लोग मानसिक रूप से संतप्त और प्रताड़ित हो चुके हैं। इंसान, इंसान को छूना पसंद नहीं कर रहा है, हिंदू राष्ट्र के समर्थक तो मूल भारतीयों को गुलाम बना कर रखे हुए हैं, उन्हें ना तो बोलने का अधिकार है और ना ही लिखने का अधिकार, जिसके कारण वे अपने ही देश में घुट घुट करके जी रहे हैं। शिक्षा का अधिकार ना होने के कारण शूद्र वर्ण अपने अस्तित्व ओर अधिकार तक भूल चुके हैं। इन गुलाम लोगों को शिक्षा अर्जित करने पर कान में सिक्का डालकर बहरा कर दिया जाता है, अगर यह लोग भक्ति करें तो सजा-ए-मौत दी जाती है, जिस का साक्षात उदाहरण रामचंद्र राजा है, जिसने शूद्र शंबूक नामक महाऋषि को इसलिए मौत के घाट उतार दिया था, कि कोई शूद्र तपस्या कर रहा है, जिस के कारण किसी ब्राह्मण के बेटे की मृत्यु हो गई थी और उस के इल्जाम में शंबूक को मौत के घाट उतारा गया था। ब्राह्मण बेटे की मृत्यु तो एक बहाना था मगर उन्हें भक्ति करने के कारण मौत की सजा दी गई थी। शूद्र वेद शास्त्र नहीं पढ़ सकता है, अगर पढ़ें तो उसकी जीभ काट देते हैं, कानों में सिक्का डालकर भर दिया जाता है, मंदिर में तो जा नहीं सकता और ना ज्ञान की बातें सुन सकता, ना ही वह किसी को ज्ञान दे सकता है, वह गुरु भी नहीं बन सकता है, उसे खाने के लिए गेहूं, चावल, जौ, जैसे अनाज, मेवे, फल खाने की अनुमती नहीं है, पहनने के लिए उसे मनुवादियों के पुराने कपड़े पहनने पड़ते हैं, अपना कोई घर नहीं बना सकते हैं, इसी तरह इस्लाम में भी शिया, सुन्नी की नफरत सारे विश्व में जगजाहिर है, सिखों के सिख धर्म में अमृतधारी और सहजधारी आपस में एक दूसरे खून की प्यासे बने हुए हैं, इसी तरह ईसाई धर्म के बीच भी काले-गोरे का विवाद चलता आया है, जो आज भी चल रहा है, इस प्रकार अभी-अभी अमेरिका में एक गोरे पुलिस सिपाही ने काले विद्वान की गला दबाकर हत्या कर दी है। कैथोलिकों और प्रोटेस्टेंट के बीच की लड़ाई में एक दूसरे का सिर काटने का आतंक फैला हुआ है। एक शासक दूसरे शासक को पराजित कर के, कत्ल करके विश्व विजेता बनने के प्रयास कर रहे हैं और भोली भाली जनता का कत्लेआम कर के घोर अन्याय, अत्याचार, अनाचार और अपराध करते हैं, एक दूसरे देश को गुलाम बना कर के वहां की सारी धन-दौलत संपत्ति को छीन कर के अपने देश ले जाते रहे हैं। अंग्रेजों और मुसलमानों ने भारत में ऐसा ही किया हुआ है, भारत का सारा कच्चा सामान इंग्लैंड ले जा कर के, वहां से पक्का कर कर के हजार गुना अधिक मूल्य पर बेच कर शूद्रों का शोषण किया जाता रहा है, ऐसा ही मुस्लिम बादशाहों ने भारत पर आक्रमण कर कर के यहां के सभी लोगों और मंदिरों को लूट कर के अपने देश ले गए, जिस से भारत कमजोर होता रहा। इन्हीं अत्याचारों, अन्यायों लूटघसूट के कारण गुरु रविदास जी महाराज ने अनुभव किया है, कि इन सभी मुसीबतों की जड़ केवल छोटे-छोटे देशों का निर्माण ही है, यदि छोटे छोटे देश ना होते और केवल एक ही देश धरती पर विद्यमान होता तो इतने क्रूर तानाशाह, अहंकारी राजा महाराजा ना होते और ना ही धरती के ऊपर विश्व विजेता बनने की किसी को ललक होती और ना ही जनता का खून, कत्ल हो सकता था, इसलिए उन्होंने बेगमपुरा नामक शहर की अद्वितीय कल्पना की, ताकि उस शहर में सभी धर्मों, जातियों के लोग सौहार्दपूर्ण आनंदमय जीवन जी सकें, कोई किसी का शोषण ना करें, कोई किसी को गुलाम ना बना सके, कोई किसी को सजा ना दे सके, इस बेगमपुरा शहर में कोई सीमा विवाद नहीं हो होगा और ना ही किसी को कोई सेना, पुलिस तैयार करनी पड़ेगी, कोई भी किसी किस्म का अस्त्र-शस्त्र बनाने की आवश्यकता नहीं होगी। तोप, गन, बारूद, राकेट लॉन्चर, परमाणु बम, मिजायल, लड़ाकू जहाज, पनडुब्बियां आदि बनाने की आवश्यकता नहीं होगी और ना ही जनता के टैक्स से असंख्य शासकों का खर्च जनता को सहन करना पड़ेगा, गुरु रविदास जी ने बेगमपुरा शहर को विश्व देश कहा है, सारी धरती के ऊपर केवल एक ही देश को बेगमपुरा कहा है। इसीलिए गुरु जी फरमाते हैं कि:---
दुखु आन्दोहू नहीं तिहि ठाऊँ।।
बेगमपुरा नामक शहर में किसी को कोई किसी  किस्म का दुख संताप, कष्ट, क्लेश नहीं होगा, ना ही किसी को कोई चिंता सताएगी, ना किसी प्रकार की कोई समस्या होगी, चारों तरफ सुख शांति का राज होगा। रोटी, कपड़ा और मकान सभी को नसीब होगा।
ना तसवीस खिराजु ना मालू।।
खउफ़ न खता न तरसु न जवालु।।
कोई किसी को किसी विजेता राजा की कोई खिराजु ( घबराहट, भय और उहापोह) नहीं होगा, किसी को कोई भी गुलाम बना कर रखने की चिंता नहीं होगी और ना ही कोई किस किस्म का कर (टैक्स) लगाकर जनता का खून चूसने के लिए किसी की पैतृक संपत्ति को छीन सकता है। कहीं किसी को मानसिक संताप का आतंक नहीं होगा, ना किसी का खौफ सताएगा। ना कोई खता (गलती) करेगा, ना किसी को कोई भय सताएगा, सभी निर्भय और निरवैर हो कर जीवन बसर करेंगे। किसी को भी अवनति का नुकसान सहन करना नहीं पड़ेगा। गुरु जी के फरमान का सारांश है कि, वैश्विक सरकार, विश्व वतन के निवासियों को रोटी, कपड़ा और मकान देकर, समानता का व्यवहार कर के स्थायी लोकतंत्र स्थापित करेगी। इस विश्व देश में चारों दिशाओं में सभी को आनंदमयी जीवन जीने का परम सुख नसीब हो सकेगा।
अब मोहि खूब वतन गह पाई।।
उहां खैरी सदा मेरे भाई।। १।। रहाउ।।
गुरु रविदास जी महाराज फ़रमाते हैं कि, हे मेरे भाइयों! अब मुझे ऐसा श्रेष्ठ, उत्तम देश मिल गया है, जिस जगह सदा खैर (कुशलता) है, हर प्रकार का सर्वश्रेष्ठ जीवन का सुख मिल रहा है। बेगमपुरा में शाश्वत परम आनंद प्राप्त हो रहा है, वैश्विक सरकार में मानवतावादी आचरण किया जा रहा है और यहां ना कोई बादशाह है और ना ही कोई राजा प्रजा का रिश्ता है। सभी को शाश्वत सुख, शांति, प्यार, स्नेह, सम्मान, आनंद मिल रहा है।
काईम दाईम सदा पतिसाही।।
दोम न सेम एक सों आही।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि इस विश्व देश में काईम (सभी स्थाई रूप से मौजूद, विद्यमान) है, इस वैश्विक देश में कोई सीमा नहीं है, यह दाईंम (शाश्वत सत्य) है और इसआदर्श बेगमपुरा में शाश्वत सत्य के ऊपर आधारित बादशाही का साम्राज्य हैं, यहां का रूहानी विश्व देश सदा से ही प्रसिद्ध है, इस देश के शहरी एक दूसरे, तीसरे नंबर के नहीं है अर्थात सभी बराबर हैं। हर पक्ष से, हर क्षेत्र में सभी को समानता का अधिकार मिला हुआ है, प्रजा भी सदाचारी हैं। सभी लोग आत्मबल और आत्म शक्ति से भरपूर हैं, सभी दूरदर्शी और संतोष से जीवन बसर करते हैं। हर तरफ से सभी संतुष्ट हैं। इस तरह यहां पर कोई तानाशाही नहीं है। यहां पर सभी समानता और भाईचारे का जीवन जीते जा रहे हैं। ये अद्वितीय संयोग है कि सारी प्रजा दूरदर्शी संतोषी निडर और सदाचारी है, इसी संविधान के अनुसार बादशाह सिकन्दर लोदी और बाबर ने गुरु रविदास जी की अधीननता स्वीकार कर के भारत में न्याय प्रणाली शुरू कर के, बेगमपुरा शहर स्थापित किया था।
आवादानु सदा मशहूर।।
ऊहाँ गनी बसहि मामूर।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि इस विश्व वतन के बीच अध्यात्मिक लोग रहते हैं और सभी अध्यात्म ज्ञान से परिचित हैं। वे सभी अध्यात्म ज्ञान से के लिए प्रसिद्ध है। वहां पर सभी धन सम्पन्न अमीर लोग निवास करते हैं। सभी दूरदर्शी हैं, सदाचारी और आत्मिक शक्ति से संपन्न हैं, सभी सबर और संतोष से जीवन जीते हैं।
तियूं तियूं सैल करहि जियूं भावे।।
मरहम महल न को अटकावै।।
गुरु रविदास महाराज फरमाते हैं कि बेगमपुरा वासी बड़े आनंद से स्वेच्छापूर्वक सैर सपाटा करते हैं और प्रजा को जिस प्रकार उन के मन को अच्छा लगता है, वे जहां जाना चाहते हैं, वे जा सकते हैं। प्रजा, शासक, बादशाह के प्रति, उस के सदाचारी व्यवहार से पूर्णरूपेण परिचित है और आपस में बड़े प्रेम और विश्वास के साथ जीवन जीते हैं
कहि रविदास खलास चमारा।।
जो हम शहरी सु मीतु हमारा।।३।।२।।
गुरु रविदास जी जात्याभिमानियों को बुरी तरह से सबक सिखाते हुए, फटकारते हैं कि, हम खलास (पवित्र) चमार हैं, गुरु जी ने जातियों की हीनता पर पत्थर की चोट मारते हुए जातियों को बनाने वालों को सबक सिखाते हुए ऐसा कहा है और जिन लोगों को नीच, निम्न जाति, शूद्र वर्ण कहा है, उन के मन में भी अपना जातीय गौरव और स्वाभिमान जागृत किया है, ताकि किसी के अंदर चमार कहने के ऊपर कोई आत्मग्लानि ना हो, गुरु जी फरमाते हैं कि जो हमारे बेगमपुरा शहर में निवास करते हैं, वही हमारे श्रेष्ठ मित्र है, अर्थात जो व्यक्ति सत्यवादी, सदाचारी, सत्यनिष्ठ इमानदार, कर्मठ और आपस में सौहार्द पूर्ण जीवन नहीं जीता है, वही हमारा श्रेष्ठ मित्र है। गुरु रविदास जी के बेगमपुरा का ऐसा एक पंक्ति का आदर्श संविधान है, जिस की नकल यूएनओ ने कर ली है और उसके अनुसार ही उन के नेताओं ने भी अपने संविधान में संशोधन करके धारा एक में लिखा है:--
All human beings are born free and in equal dignity and tight.They are endowed with reason and conscience and should act towards one another in spirit of brotherhood.
यही गुरु रविदास जी महाराज के सिद्धांत की सफलता है, इसलिए गुरु जी को विश्व गुरु कहा जाता है जो भारत के मनुवादियों को हजम नहीं होता।
शब्दार्थ: बेगमपुरा-गम रहित, आनंददायक, सुखदायक। शहर-सम्पूर्ण धरती मंडल ही, गुरु रविदास जी का शहर है। नांऊँ-नाम। दुखु-पीड़ा, मुशीबत। आन्दोहू-सामाजिक उत्पीडन की चिंताएं, परेशानियां। तसवीस-घबराहट, बेचैनी, उहापोह। खिराजु-गुलामी स्वीकार कर के जीना, पराजित राजे की दशा। मालू-पैतृक संपत्ति, निजी सम्पत्ति। खउफ़-भय, डर, आतंक। खता-गलती, तरसु-दया, मेहर, कृपा। जवालु-हानि, नुकसान, घाटा, अवनति।खूब-वहुत, उत्तम। गह-घर, निवास स्थल, ग्रहण करना। खैरी सदा-हमेशा कुशलता, शाश्वत आनंद। काईम-मौजूद रहना, स्थिर, एक स्थान पर टिकना, स्थाई ठहराव। दाईंमु-अटल। दोम न सेम- पहले, दूसरे,तीसरे दर्जे का। एक सों-समान स्तर। आरी-हैं।आबादान-आध्यात्मिक, रूहानी।गनी-गणमान्य, अमीर, धन सम्पन्न। मामूर-संतोष, सब्र, इच्छाओं से मुक्त। तियूं तियूं-जैसे जैसे, जिस तरह। सैल-भ्रमण करने, सैर करना, टहलना। जियूं- जिस प्रकार। भावै-जिस प्रकार मन चाहता, अच्छा लगना। महरम-परिचित, भिज्ञ। महल-राजमहल। खलास-पवित्र, जिस वस्तु में मिलाबट ना हो। हम शहरी-एक ही स्थान पर रहने वाले।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।।

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