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Showing posts from May, 2021

तत्त सिद्धांत ।।भाग छः।।

..तत्त्व सिद्धांत।। भाग। ये शलोक गुरु रविदास जी का है।। शलोक "हरि सो हीरा छाँड़ि कै" के कर्ता बारे विद्वान एक मत नहीं हैं। डाक्टर साहब सिंह और जसवीर सिंह साबर इस शलोक को गुरु कबीर जी का मानते हैं। डा सावर ने ऐसा मानते हुए कोई दलील नहीं दी है। केवल वे फुट नोट के बीच लिखते हैं कि:--- सब प्रतियां के बीच यह साखी गुरु रविदास जी के नाम के नीचे है जब कि श्री गुरु ग्रँथ साहिब के अंदर ये साखी कबीर जी के शलोक नंबर २४३के ऊपर है। पहली बात ये है कि शलोक नंबर २४३ है नहीं ये शलोक नंबर २४२ के ऊपर दर्ज है। डा सावर ने बिना विचार किये ही मॉन लिया है, इस निर्णय ने विवाद तो किया ही है, इस ने आम व्यक्तियां को भी गुमराह किया है,उस का ये निर्णय सही नहीं लगता है। डाक्टर साहब सिंह ने भी बिना दलील देते ही यह तर्क रहित निर्णय दे दिया है, कि वे शलोक नंबर २४२ को गुरु कबीर का बताते हुए इस निम्न नोट के बीच लिखते हैं:---- "! भगत नामदेव जी और गुरु रविदास जी के कोई शलोक नहीं हैं, सिर्फ शब्द हैं। जिस प्रकार शलोक नंबर २४२ को गुरु कबीर जी के अपने उच्चारे हुए हैं, वैसे ये शलोक नंबर २१२ और  २१३ कबीर जी के अपने...

तत्त सिद्धांत।। भाग पाँच।।

।।तत्त सिद्धांत भाग पाँच।।                ।।सोहम।                 इक़ ओंकार -------------------------------------------------- इक़।                          ओंकार ऊर्जा।                         ऊर्जा के तीन हिस्से      ------ ------------------------------------------ उ।                      अ।                    म। जन्म देने वाला।  पालन करने वाला।   संहारक ब्रह्मा।                विष्णु                    महेश इलेक्ट्रान।           न्यूट्रॉन।                प्रोटान ब्रह्मा विष्णु महेश आदि भगवानों को रद्द कर के सिद्ध किया गया है कि ये तीन गुणं (१) सृष्टि की उतपत्ति है (२)उस की पालना करना (३) उस का संहार करना महापुरुषों की ही शक्तियाँ हैं।उपरोक्त भगवान देहधारी और पारब्रह्म की ही रचना है। सृष्टि की हर रचना के बीच वह आप विचर रहा है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश के बीच भी वह आप ही विराजमान हैं, फिर पारब्रह्म की अपनी रचना ही उस की बराबरी किस प्रकार कर सकती है? इस कर के ये तीन देहधारी भगवान उस की शक्तियों के मालिक नहीं बन सकते। यही विचार गुरु नानकदेव जी ने जपुजी के बीच निरूपित कर के इक़ ओं...

तत्त सिद्धांत।। भाग चार।।

।।तत्त सिद्धांत भाग चार।। सो सोहम के बीच ओम व्यापक है।सोहम के इस गुप्त रूप ओम को प्रकट कर के विश्व व्यापी विचारधारा के आधार ओम को इक़ ओंकार का स्वरूप दिया है। इस तरह से हम ओम और इक ओंकार तीनों शब्दों के अर्थो में कोई अंतर नहीं मानते है। हरि जपत तेऊ जन वाले शब्द के बीच गुरु रविदास जी ने सोहम ओम को और व्यापक अर्थों के बीच खोल कर व्याख्या की है। इस व्याख्या के साथ सोहम ओम का स्वरूप बदल कर इक ओम बन गया है। सो उन्होंने सोहम को इक ओंकार का स्वरूप देकर विश्व व्यापी विचारधारा को परिपक्वता और दृढ़ता प्रदान की है। उन का कथन है कि:--- हरि जपत तेऊ जना पदम् कवलासपति तास सम तुल नहीं आन कोऊ।। एक ही एक अनेक होई बिस्तारियो आन रे आन भरपूर सोऊ।। रहाऊ।। इस शलोक में आए हरि के अर्थ को इस शब्द के बीच दर्ज हरि स्पष्ट करता है। ये स्पष्ठता भी रहाऊ के अधीन है। रहाऊ वाले बन्द के बीच समूचे शब्द का बुनियादी सिद्धांत और मुख्य मंतव्य होता है इस तरह हरि के अर्थों की स्पष्टता और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। इस के बीच आए हरि के अर्थ हैं, पारब्रह्म केवल और केवल एक हैं। विष्णु महेश और ना कोई अन्य ब्रह्मा आदि हरि भगत के भी बराब...

तत्त सिद्धांत। भाग दो।।

।। तत्त सिद्धांत भाग दो।। इन दोनों सिद्धांतों को गुरु रविदास जी ने दो दृष्टांत देकर और भी स्पष्ट कर दिया है, जिस प्रकार: सोना (सो) सोने का ही अंश है (हं), अहं का ही संक्षेप) से बने गहने हैं: जब सोने के आभूषणों को ढाल (समेट) लिया जाता है, तब वे सोना ही बन जाते हैं। जिस प्रकार पानी सो और पानी अंश (हं) लहरें हैं: जब लहरें मिट जाती हैं तब वे पानी ही बन जाती हैं। उसी प्रकार पारब्रह्म (सो) और पारब्रह्म की अंश आत्मा (हं) सृष्टि के बीच निरूपित है: जब सृष्टि समेटी जाती है, तब पारब्रह्म की अंश आत्मा (हं) पारब्रह्म सो के बीच समा जाती है। स्पष्ट है कि तोहि (सो) और मोहि (हं) एक ही हैं। इन के बीच कोई भी अंतर नहीं है। इस तरह परिपक्व हो गया है कि:--- सो-वह भाव पारब्रह्म तोहि -उ हैं-अंश भाव पारब्रह्म की अंश, मोहि -अं उ, वह का संक्षेप है और अं, अंश का संक्षेप है। सो " सोहम "सिद्धांत की स्थापना के साथ ही साथ ओम की स्थापना भी सिद्ध हो गई है और सोहम ओम से सृष्टि के सृजन का संकल्प भी दृढ़ हो गया है। इस की परिपक्वता गुरु नानक देव जी के निम्नलिखित लिखे गए शब्द से हो जाती है। उअंकारी ब्रह्मा उतपत्ति।।...

।।तत्त सिद्धांत भाग दो।

।।सोहम/इक ओंकार के सिद्धांत का निरूपण।। गुरु ग्रँथ साहिब के बीच दर्ज भगतों की वाणी के बीच आज तक किसी भी विद्वान ने मूलमंत्र का तत्त सिद्धांत ढूंढने की कोशिश नहीं की।पलेठा सिद्धांतात्मक अध्ययन होने के कारण भगतों की वाणी के बीच मूलमंत्र के सिद्धांतात्मक विचारों की खोज कर के सिद्धांत स्थापित करना एक कठिन कार्य बन गया है। ये इस कारण बन गया है, क्योंकि पहले ऐसा कोई मॉडल उपलब्ध नहीं है, चाहे वाणी की खास कर के जपु जी की चर्चा करते हुए विद्वानों ने सिद्धांतक मॉडल स्थापित किये हैं। शलोक हरि सो हीरा छाँड़ि करी----के बीच सोहम इक ओम का सिद्धांत उपलब्ध है। सोहम से ही सृष्टि का सृजन हुआ है। इस की पुष्टि के लिए नीचे अध्ययन करते हैं। इस शलोक के आरंभिक तीनों शब्दों का अर्थ पार ब्रह्म प्रभु बनता है। "हरि" का अर्थ पारब्रह्म है, "सो" का अर्थ पारब्रह्म है और हीरा का अर्थ भी करतार अर्थात पारब्रह्म ही है। इस के साथ एक और महत्त्वपूर्ण विचार स्पष्ट होता है---- "हरि" एक वचन हैं, "सो" एक वचन है और "हीरा" भी एक वचन है। इस से बड़ी परिपक्वता के साथ दृढ़ हो जाता है, कि ...

सिंधुघाटी सभ्यता और ज्योतिर्मंडल गुरु रविदास जी।

सिंधुघाटी सभ्यता और ज्योतिर्मंडल गुरु रविदास जी।।। विदेशियों लेखकों ने, गुरु रविदास जी महाराज को समझा परखा और माना है कि वे विश्व की अमूल्य धरोहर है, इसीलिए मार्क आदि अनेकों इतिहासकारों ने गुरु जी के बारे में लिखा है, जो आज हमारे लिए प्रेरणास्रोत बना हुआ है। यदि ये जातिवाद के दुश्मन ना लिखते तो आज गुरु रविदास जी गुमनाम दुनियां में ही होते। केवल गुरु रविदास जी के इतिहास को मिटाने का काम ब्राह्मणों ने ही नहीं किया है, अपितु बुद्ध और सिख मत ने भी भी पूरा ऐड़ीचोटी का जोर लगा कर अपनी जातिवादी मानसिकता को प्रदर्शित किया है। आज भी इन मतों के प्रचारक गुरु जी का नाम ले कर अपनी संख्या बढ़ाने के लिए उन का सहारा लेते हैं मगर अंदर खाते सभी गुरु जी का विरोध ही करते हैं। सिखों के अवतार गुरु नानकदेव जी गुरु रविदास जी के शिष्य हुए हैं मगर सिखों ने गुरु नानकदेवजी के नाम पर अनेकों आलीशान गुरुदुआरे, मूलमंत्र भवन तोरण आदि बना कर उनको सम्मानित कर रखा है, मगर गुरु रविदास जी के नाम पर कहीं एक ईंट तक नहीं लगाई है। अमर ऐतिहासिक तीर्थ सुल्तानपुर लोधी तो केवल गुरु रविदास जी के कारण ही विश्व में प्रसिद्ध हुआ था, गुर...

सिंधुघाटी सभ्यता में गुरु रविदास जी का दर्शन झलकता है।।

।।सिंधुघाटी सभ्यता में गुरु रविदास जी का दर्शन झलकता है।। इस्लाम दर्शन जिसे अब अरब दर्शन भी कहा जाता है, उस के मुख्य चार आयाम निम्नलिखित हैं:--- मुतजलवाद (बुद्धिवाद)। अशअरवाद (पांडित्यवाद)। सूफीवाद (रहस्यवाद)। दर्शन। इस्लाम मुतजलवाद हिजरी सम्मत की प्रथम शताव्दी का अंत होते समय स्थापित हुआ था। ये धर्म ईश्वरीय एकत्व तथा ईश्वरीय न्याय पर आधारित था। ईश्वरीय एकत्व से अभिप्राय है, केवल अद्वैत  अर्थात अकेला एक आदपुरुख सर्वोच्च, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान है। अशअरवाद :---अपने समय में अशअरवाद, मुतजलवाद के विरुद्ध एक प्रतिक्रियात्मक आंदोलन था। सूफीवाद:---ये आयाम आत्मा परमात्मा के बीच के गुप्त रहस्य अर्थात भेद को जानने का प्रयास करता है। इस का मूल दर्शन है अपने अंतःकरण को किस प्रकार पवित्र बनाएं, अपना नैतिक धरातल कैसे मजबूत बनाएं? अपने आंतरिक और बाह्य जीवन का कैसे निर्माण करें, ताकि शाश्वत आनंद की प्राप्ति हो सके। इस्लाम दर्शन:---इस्लाम धर्म के अभ्युदय से पूर्व मेसोपोटामिया सभ्यता में हरनि तथा मिश्र में अलेक्सानड्रिया अपनी हैलेनिक संस्कृति के कारण प्रसिद्ध था।ओमैद काल के अरब साम्राज्यवादी गैर अरबियो...

सिंधुघाटी सभ्यता के साथ गुरु रविदास जी के सिद्धांत मिलते हैं।।

।।सिंधुघाटी सभ्यता के साथ गुरु रविदास जी के सिद्धांत मिलते हैं।। सिंधुघाटी सभ्यता के मिले ऐतिहासिक अवशेषों से ज्ञात होता है, कि उस काल में ही बेगमपुरा स्थापित था, जिस देश काल में ना सेना थी, ना ही पुलिस थी, जिस शासन में किले दुर्ग ना हों, जिस काल में किसी को फांसी ना हुई हो, किसी का शोषण ना हुआ हो, वही काल सवर्ण युग हो सकता है वही राज्य बेगमपुरा हो सकता है, वही शासक आदर्श शासक हो सकता है, जिस प्रकार वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासन काल में चिताओं को जलाने की पंक्तियां लगी हों, चारों ओर त्राहिमाम मचा हो, चारों ओर कोहराम छा रहा हो, सरकारी खजाने खाली कर के पत्रकार खरीद कर झूठा प्रचार कर के सरकार के काले कारनामे छुपाए जा रहे हों, राफेल जैसे फ्रांसीसी जहाजों की खरीद फरोख्त की फाइलें ही गायब हो रही हों, कोरोना की आड़ में गरीबों को नंगा भूखा मारा जा रहा हो, रोजगार खत्म कर के डेढ़ अरब भारतीयों को सड़कों पर खड़ा कर दिया हो, मूक दर्शक दरबारी भी पाप कर्म में शामिल हो कर जनता का खून निचोड़ने में भागीदार हों, उस काल में क्या आदपुरुख किसी शासक का साथ देता है? मगर इन काले कारनामों का सिंधु घाटी क...

सिंधुघाटी सभ्यता के अंत तक कोई खूनी संघर्ष के सबूत नहीं।।

।।सिंधुघाटी सभ्यता के अंत तक कोई खूनी संघर्ष के सवूत नहीं। सिंधुघाटी सभ्यता भारत के मूलनिवासियों के स्वर्णिम इतिहास को प्रकट करती है। इस आदर्श सभ्यता के मुख्य निवासी द्राविड़ ही थे, जिस का स्पष्ट अर्थ है कि भारत के मूलनिवासी सिंधुघाटी सभ्यता के समय अत्यंत समृद्ध और सम्पन्न थे। भारतवर्ष विशाल भारत था, जिस में वर्तमान साऊदी अरब के मक्का मदीना, इराक ईरान से ले कर कन्याकुमारी तक आदवंशियों का शासन था, जिस के सम्राट कैलास महाराज का जिक्र उन के सिद्ध पुरूष राजकुमार चानो उर्फ चाणूर, उर्फ चानन, उर्फ सिद्धचानो जी महाराज के मूल मंत्रों में मिलता हैं, जिन को कोई भी षडयंत्रकारी बदल नहीं सका है, जिस में लिखा गया है कि:-- जय सिद्ध बाबा बलि मरदान, गढ़ मथुरा के पहलवान। आसमान चोटी पाताल जंघान। सेवक तेरे दर ते खड़ा, बहत्तर गज चमड़े की तड़ागी पाई, कृष्णा नाल थापि लाई। काली चले, भैरों चले, चले ग्यारह वीर मसान। नाँगा बलि है डेरे दा सरदार, सिरमौर की काली (हरि देवी जो आज भी मन्दिर में विराजमान है) करे सिंगार। लूना माई घोड़े पे आई, नाले साथ तीन सौ सखियां लाई। जय बलि दानो, बलि महादानो, तुझ को कोटी कोटी प्रणाम। ...

सिंधुघाटी सभ्यता तक कोई ब्राह्मणवाद नहीं था।।

।। सिंधुघाटी सभ्यता तक कोई ब्राह्मणवाद नहीं था।। सिंधुघाटी सभ्यता की खुदाईयों में, प्राचीन काल के निर्माणों और वर्तमान सभ्यता की कहीं कोई समानता नहीं मिली है। सिंधुघाटी की अंत्येष्टि हो जाने तक कोई भी मन्दिर नहीं बना था, जिन के कोई भी अवशेष नहीं मिले हैं। किसी भी ब्रह्मा विष्णु महेश की उपासना, साधना पूजापाठ का कोई भी सबूत नहीं मिल सका है। कहीं भी गाय सिंह, मातृदेवी, महादेवी, लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा काली, गोरी, देवी, महादेवी की मूर्ति, चित्र नहीं मिले हैं। सिंधुघाटी सभ्यता तक ब्राह्मण पुजारी नहीं :--- सिंधुघाटी सभ्यता में जब किसी भी जगह पर मन्दिरों के अवशेष नहीं मिले हैं, तो फिर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि, उस काल तक कोई भी पुजारी नहीं था, यदि पुजारी नहीं था, तो फिर ब्राह्मण भी नहीं थे। सिंधुघाटी के समय ब्राह्मण नहीं थे:---सिंधुघाटी सभ्यता के समय तक भारत में कोई मन्दिर नहीं थे, तो फिर मन्दिरों के पुजारी ब्राह्मण भी नहीं थे, आददुआरों में सत्संग करने वाले आदधर्म के धर्मात्मा लोग ही सम्राट सिद्धचानो जी महाराज और मातेश्वरी लोना उर्फ कामाख्या महादेवी सहित अपने आदिपुरुषों और सिद्धों क...

प्रोफैसर लालसिंह जी पँच तत्व में विलीन हो गए!!!

!!!! प्रोफेसर लालसिंह जी पंच तत्व में विलीन हो गए!!!! प्रोफेसर दित्त सिंह के बाद अगर पंजाबी भाषा का कोई विद्वान, तर्कशास्त्री, मनोवैज्ञानिक लेखक, महान विश्लेषक, आलोचक, महाज्ञानी, गुरु रविदास महाराज का अनन्य भगत, आदर्श सेवक, अनुचर, आदधर्म का वीर योद्धा, पारंगत शिक्षक अगर कोई हुआ है तो वह हुए हैं प्रोफेसर लालसिंह जी। वे अचानक विश्व को त्याग कर तीन मई को छः बजे हमें अलविदा कह कर गुरु रविदास जी महाराज के चरणों में हमेशा के लिए विलीन हो गए, वे 81 वर्ष के थे। जन्म:---प्रोफेसर लालसिंह जी का जन्म पिता शाम सिंह के घर माता हरनाम कौर की पवित्र कोख से पांच जनवरी सन ऊनी सौ चालीस को पंजाब के गांव शेरवानी मलेर कोटला, जिला संगरूर में हुआ था। शैक्षिक योग्यता:---प्रोफैसर लालसिंह जी एमए पंजाबी, एलएलबी थे, पीईएस, हेड ऑफ दा पोस्टग्रेजुएट पंजाबी विभाग सरकारी कालेज होशियार पुर मे कार्यरत रहे। उन की सत्य के ऊपर आधारित तर्कपूर्ण भाषा में लिखे थिसिज पंजाब विश्वविद्यालय को हजम नहीं हुए जिस के कारण, उन्हें पंजाब विश्वविद्यालय ने पीएचडी की उपाधि जारी करने में सँकोच किया मगर वे अपनी निर्भीक आवाज में, निर्भीक लेखनी ...

सिंधुघाटी सभ्यता और आदधर्म की स्थापना।।

।सिंधुघाटी सभ्यता और आदधर्म की स्थापना।। भले ही आद जमा मी दो वाक्यांशों को जोड़ कर आदमी शब्द की उतपत्ति की गई है, मगर की तो आद के ही बेटों ने की है। जब आद शब्द से ही विश्व की शुरुआत हुई है, तो आदधर्म भी इसी शब्द को आधार बना कर तैयार किया गया है, क्योंकि जिस प्रकार यूरेशियन आर्य घुसपैठियों ने अपने नायक ब्रह्मा के नाम पर ब्रह्म, ब्रह्मण्ड, ब्रह्मपुत्र, ब्रह्मज्ञान, ब्रह्मगिरि, ब्राह्मण, ब्रह्मगुप्त, ब्रह्मानंद, ब्रह्मर्षि, ब्रह्मपुत्री, ब्रह्मचर्य, ब्रह्मचारी, ब्रह्मपुखर, वराह ना जाने कितने शब्द आद शब्द की नकल कर के ही ढूंढे और निर्मित किए हुए हैं मगर जब से भारत को छलबल से इन्हीं आर्यों ने मूलनिवासियों से छीना है, तब से ही ये दिनरात आदधर्म को मिटाने का कार्य करते आ रहे है। मूलनिवासियों के महापुरुषों का नाम मिटाने का काम आज भी जारी है, जिसे रोकने का कार्य केवल आदधर्म के प्रचार प्रसार से ही किया जा सकता है। गुरु रविदास जी महाराज ने, पुनः मूलनिवासियों को नया रास्ता बताते हुए कहा है कि:--- आद से प्रगट भयो जा को ना कोऊ अंत आदधर्म रविदास का जाने बिरला सन्त। इन दो पंक्तियों से साफ साफ ज्ञात हो ह...

सिंधुघाटी, मोहन जोदड़ो,राखी गढ़ी सभ्यता यूरेशियन के लिए आतंक थी।।

।।सिंधुघाटी, मोहनजोदड़ो, राखीगढ़ी सभ्यता यूरेशियन के लिए आतंक थीं।। सिंधुघाटी, मोहन जोदड़ो, राखीगढ़ी की सभ्यता विश्व की आदर्श सभ्यताएँ थीं, जिन का आभास तत्कालीन नगर निर्माण, धर्म, कला, संस्कृति और रहन सहन से होता है। विशाल भारतवर्ष की सत्य पर आधारित जीवन शैली, जनता की धार्मिक विचारधारा, आपसी प्यार, स्नेह, श्रद्धा, अध्यापक और नारी का सम्मान सिंधुघाटी सभ्यता की प्रशंसनीय विशेषताएं थीं। जिस के बारे में निम्नलिखित वाक्यांश से ज्ञात होता है:-- "Indus valley peculiar of its arts and religion had no resemblance in-other countries in point of style. उपरोक्त इतिहास से स्पष्ट हो जाता है कि, पाँच हजार वर्ष पूर्व भारत किस प्रकार का देश था? कितनी उन्नति की ऊंचाइयों को छू चुका था? विश्व में कितना सम्मानजनक स्थान प्राप्त कर चुका था? भाषा, कला संस्कृति कितनी उन्नत हो चुकी थी? सिंधुघाटी, मोहन जोदड़ो और राखी गढ़ी का चित्र लिखने वाले लेखक ने, इन शब्दों से करोड़ों वर्षों के इतिहास को विश्व के समक्ष प्रस्तुत कर दिया है। इन पँक्तियों का अर्थ स्पष्ट करता है कि, सिंधुघाटी सभ्यता, कला, धर्म और संस्कृति के क्षेत्...

सिंधुघाटी सभ्यता और चँवरवंश ही मूलनिवासियों के आदधर्म का इतिहास।

।। सिंधुघाटी सभ्यता और चँवरवंश ही मूलनिवासियों के आदधर्म का इतिहास।। भारतवर्ष की पवित्र भूमि आदपुरुख की पवित्र सन्तानों की भूमि है, जिस के आदर्श शासक भी खुद आदपुरुख हुए हैं, उन के बाद जुगाद, नील कैल, चंडूर मंडल कैलाश सिद्धचानो, कोलचानो महादानो केलावीर चँवरसेन, कालूदास, सन्तोष दास, गुरु रविदास जी महाराज हुए हैं, जिन के इतिहास का पता इटारसी के समीप चँवरवंशियों के राजमहलों से आज भी जाना जा सकता है। इसी इतिहास को आर्य एवं यूरेशियन लेखकों ने, वहुत ही कुतर्कपूर्ण ढंग से ईश्वर की वंशावली का आरंभ मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परसुराम, राम, कृष्ण और बुद्ध को माना हुआ है, जो प्रकृति और तर्क की धज्जियां उड़ाने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। सर्वश्रेष्ठ सिंधुघाटी की अनुपमेय सभ्यता का, आज तक कोई भी मुकाबला नहीं कर सका है और ना ही कोई भी सानी हुआ है, जिस का अनुमान इन सभ्यताओं के मिले अवशेषों से चलता है। इनके तो अबतार भी मछली, सूअर, आधे आदमी और आधे शेर के संयुक्त मुंह वाले, छोटे कद वाला महाराजा बलि को छलने वाला, लोहे के फरसे से राजपूतों को कत्ल करने वाला, नृशंस हो कर खून की नदियां बहाने वाल रामचन्द्...