सिंधुघाटी सभ्यता के अंत तक कोई खूनी संघर्ष के सबूत नहीं।।

।।सिंधुघाटी सभ्यता के अंत तक कोई खूनी संघर्ष के सवूत नहीं। सिंधुघाटी सभ्यता भारत के मूलनिवासियों के स्वर्णिम इतिहास को प्रकट करती है। इस आदर्श सभ्यता के मुख्य निवासी द्राविड़ ही थे, जिस का स्पष्ट अर्थ है कि भारत के मूलनिवासी सिंधुघाटी सभ्यता के समय अत्यंत समृद्ध और सम्पन्न थे। भारतवर्ष विशाल भारत था, जिस में वर्तमान साऊदी अरब के मक्का मदीना, इराक ईरान से ले कर कन्याकुमारी तक आदवंशियों का शासन था, जिस के सम्राट कैलास महाराज का जिक्र उन के सिद्ध पुरूष राजकुमार चानो उर्फ चाणूर, उर्फ चानन, उर्फ सिद्धचानो जी महाराज के मूल मंत्रों में मिलता हैं, जिन को कोई भी षडयंत्रकारी बदल नहीं सका है, जिस में लिखा गया है कि:-- जय सिद्ध बाबा बलि मरदान, गढ़ मथुरा के पहलवान। आसमान चोटी पाताल जंघान। सेवक तेरे दर ते खड़ा, बहत्तर गज चमड़े की तड़ागी पाई, कृष्णा नाल थापि लाई। काली चले, भैरों चले, चले ग्यारह वीर मसान। नाँगा बलि है डेरे दा सरदार, सिरमौर की काली (हरि देवी जो आज भी मन्दिर में विराजमान है) करे सिंगार। लूना माई घोड़े पे आई, नाले साथ तीन सौ सखियां लाई। जय बलि दानो, बलि महादानो, तुझ को कोटी कोटी प्रणाम। तेरे दरगाही पहलवान, था, जय बाबा बलि मरदान।। ये आदिलिपि में लिखी गई अरदास लगती है, जिसे बाद में जनश्रुतियों के अनुसार एक भगत से सुन कर दूसरे भगत तक, ये मूल मंत्र के रूप में भावी पीढ़ियों तक आती गई है मगर जब यूरेशियन लोगों ने भारत को छद्म नीति से मूल निवासियों से हथिया लिया तब उपरोक्त मूल मंत्र को विकृत कर के कुछ यूरेशियन तुकों को  घड़ कर, इस मूल मंत्र में प्रक्षिप्तांश के रूप में जोड़ा गया है, जो काल और वातावरण के साथ मेल नहीं खाते हैं। खुद ही ब्राह्मण अपनी पुस्तकों में लिखते हैं कि कृष्ण 5112 वर्ष पूर्व हुआ है, फिर लाखों वर्ष पूर्व तो सम्राट सिद्धचानो जी महाराज हुए हैं, ब्रह्मा विष्णु और महेश भी विशाल भारत के अंतिम सम्राट शिव के पतन के बाद सत्ता में आए हुए हैं फिर इसी काल में आर्य अनार्य छद्म युद्ध हुए हैं, जिनमें भारत के मूलनिवासी शासक हार गए थे और यूरेशियन छद्मी जीत गए। इन्हीं जीते हुए यूरेशियन लोगों ने आदपुरुख के वंशजों को धूलधूसरित करने के लिए इतिहास को ही बदल डाला और सम्राट चानो को सिद्ध बना कर लिख डाला, कि वे पहलवानी करते थे। उन की कृष्ण से कुश्ती हुई है, जब दोनों के अस्तित्व में लाखों वर्षो का फासला है, तो फिर इस मंत्र में वर्णित यूरेशियन काल के नायकों और कल्पित पात्रों को एक दूसरे का प्रतिद्वंद्वी बता कर, जिन में यादवों और अछूतों को लड़ाया हुआ दिखाया गया है, जो सरासर असत्य है। सिद्ध नायक ही रक्षा करते थे:---सिंधुघाटी सभ्य के अंत तक जनता के प्रहरी खुद शासक ही थे, जो कभी भी आपस में युद्ध नहीं करते थे, सत्य, ईमान और धर्म का युग था, वे किसी भी प्रकार की सुरक्षा का  प्रबंधन नहीं करते थे, इसी लिए इस युग को यूरेशियन लोगों और लेखकों ने भी सतियुग कहा है। सभी देशों के इतिहास पढ़ कर देखे जा सकते हैं जिन में कोई भी ऐसा वर्ष नहीं गुजरा होगा जिस में किसी देश में खूनी संघर्ष नहीं हुआ है। पांच हजार सालों से देखा जा रहा है कि, प्रत्येक देश खूनी संघर्षों से गुजरता हुआ आ रहा है। जब सिंधुघाटी सभ्यता का अबलोकन किया जाता है तो उस समय तक खूनी संघर्ष का कोई भी नामो निशान तो क्या हुआ है? कहीं भी रक्षा तंत्त्रों का अता पता भी नहीं मिलता है। सिंधुघाटी सभ्यता का अध्ययन करने पर ज्ञात हो रहा है कि, उस के आदि से लेकर अंत तक वहां कोई लोहे का अस्त्र-शस्त्र, बंदूक, तलबार, पिस्टल, गोले, बम्ब आदि का नामोनिशान नहीं मिला है। कहीं कोई भी शासकों के रक्षात्मक दुर्ग, सेना और पुलिस का चिन्ह तक उपलब्ध नहीं हुआ है। तत्कालीन जनता बड़े ही सुख और ऐश्वर्य से जीवन जीती थी। मूलनिवासियों के इस सत्य से परिपूर्ण युग को ही आर्यों ने सतियुग कहा है। रामसिंह आदवंशी। अध्यक्ष। विश्व आदधर्म मंडल। मई 06, 2021।

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