सिंधुघाटी सभ्यता और चँवरवंश ही मूलनिवासियों के आदधर्म का इतिहास।
।। सिंधुघाटी सभ्यता और चँवरवंश ही मूलनिवासियों के आदधर्म का इतिहास।।
भारतवर्ष की पवित्र भूमि आदपुरुख की पवित्र सन्तानों की भूमि है, जिस के आदर्श शासक भी खुद आदपुरुख हुए हैं, उन के बाद जुगाद, नील कैल, चंडूर मंडल कैलाश सिद्धचानो, कोलचानो महादानो केलावीर चँवरसेन, कालूदास, सन्तोष दास, गुरु रविदास जी महाराज हुए हैं, जिन के इतिहास का पता इटारसी के समीप चँवरवंशियों के राजमहलों से आज भी जाना जा सकता है। इसी इतिहास को आर्य एवं यूरेशियन लेखकों ने, वहुत ही कुतर्कपूर्ण ढंग से ईश्वर की वंशावली का आरंभ मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परसुराम, राम, कृष्ण और बुद्ध को माना हुआ है, जो प्रकृति और तर्क की धज्जियां उड़ाने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। सर्वश्रेष्ठ सिंधुघाटी की अनुपमेय सभ्यता का, आज तक कोई भी मुकाबला नहीं कर सका है और ना ही कोई भी सानी हुआ है, जिस का अनुमान इन सभ्यताओं के मिले अवशेषों से चलता है। इनके तो अबतार भी मछली, सूअर, आधे आदमी और आधे शेर के संयुक्त मुंह वाले, छोटे कद वाला महाराजा बलि को छलने वाला, लोहे के फरसे से राजपूतों को कत्ल करने वाला, नृशंस हो कर खून की नदियां बहाने वाल रामचन्द्र और कृष्ण कभी भी अबतार नहीं हो सकते। जब कि आदपुरुख की सन्तानों ने, सिंधुघाटी सभ्यता के अंत तक किसी का खून नहीं बहाया है और ना ही अपने पवित्र हाथ किसी शत्रू से भी रक्त रंजित किये हैं।
सिन्धुघाटी सभ्यता के अंतिम सम्राट चँवरसेन जी महाराज, के शासन के बाद आध्यात्मिक शक्ति सम्पन्न गुरुओं के गुरु रविदास जी महाराज ही हुए हैं, जिन्होंने पुनः आदगुरूओं की सच्ची सुच्ची परंपराओं के नियमों, सिद्धांतों के अनुसार पथभ्रष्ट ब्राह्मणवादियों को भी सुधारने के लिए सम्पूर्ण जीवन लगाया है, मगर ये यूरेशियन नहीं शान्ति की भाषा नहीं समझ सके। इन की छद्म नीतियों ने, हमारे सत्पुरुषों को भी आत्मसात कर लिया है मगर ये छली छदमी गुरु रविदास महाराज और सतगुरू कबीर साहिब को रंच मात्र भी छल नहीं सके, क्योंकि इन्होंने बड़े ही स्वाभिमान पूर्वक अपनी जाति को अपने नाम के साथ जोड़ा जिस से ये बंदिश लगा दी थी, कि उन्हें कोई भी ब्राह्मण अपना वंशज ब्राह्मण लिख ही ना सके अन्यथा ये छली लोग गुरु रविदास जी महाराज और कबीर साहिब को भी हम से छीन लेते। गुरु रविदास जी महाराज ने कभी भी चमड़े का काम नहीं किया है, जिस का ठोस प्रमाण उन की निम्नलिखित पंक्ति से होता है:---
चमरठा गाँठि ना जानी, लोग गठावीं पनहीँ!
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, हम तो चमड़ा गाँठना नहीं जानते, लोग कहते हैं कि हम गुरु रविदास जी से जूते गठवाते हैं, हम तो गंदे शरीर रूपी जोड़ों की मुरम्मत करते हैं जिन की मुरम्मत करने से महामूर्खो का छल-कपट, ऊँच-नीच, छुआ-छूत, छोटे-बड़े, गोरे-काले का भेदभाव समाप्त हो जाता है, बहिशियों को हम इंसानों की तरह जीना सिखाते हैं। यहाँ बड़े ही दुख से लिखना पड़ रहा कि, गुरु रविदास जी के वंशज भी, गुरु जी के लिखे विचारों को तोड़ मरोड़ कर, गलत अर्थ निकाल कर लिखते आए हैं, मगर ये लोग ब्राह्मणों की चाँदी की जूती पहन कर ऐसा अनर्गल प्रलाप करते आए हैं। गुरु रविदास जी महाराज ने शब्द के अंत में बिना किसी सँकोच के, बिंना किसी हिचकिचाहट के लिखा हुआ है कि:---
कहि रविदास खलास चमारा।
जो हम शहरी सो मीत हमारा।। पृष्ठ 345।।
प्रोफेसर लालसिंह जी अपनी पुस्तक " गुरु रविदास जी दा धर्म सिंधुघाटी दे आदिवासी आछूतां दा आदधर्म" में उपरोक्त क्रान्तिकारी पंक्ति की व्याख्या करते हुए लिखते हैं कि, इन शब्दों में गुरु रविदास जी महाराज फरमाते है कि, गुरु रविदास जी ने विश्व संविधान और इस के अनुसार वैश्विक सरकार के सृजन का जिक्र किया है। इस का अत्यंत गहन ही नहीं वहुत बड़ा सांकेतिक अर्थ है मगर अर्थ भरपूर रूप में सिंधुघाटी की सभ्यता में ही उपलब्ध है।
"That anything so advanced in India could have resulted only from strong imperial rule ( like the British ). This opinion needs no further comments."
प्रोफेसर लालसिंह जी लिखते हैं कि, इससे वहुत महान तत्वों की परिपक्वता स्पष्ट हो जाती है।
1 आदिवासियों की भावुक एकता का सवूत आदधर्म ही था।
2 उन का केंद्रीय संविधान था, जिस के लिए अन्य सवूतों की आवश्यकता नहीं है।
3 इस संविधान के अधीन अंग्रेजों की तरह विशाल केंद्रीय हकूमत थी।
4 एक महान शक्तिशाली आदिवासी फ़ौज थी।
5 समूचे भारत में नापतोल के यंत्र एक जैसे ही थे, जिस की प्रौढ़ता श्री द्वारका प्रसाद शर्मा जी करते हुए लिखते हैं कि, "नापतोल के यंत्र एक ही थे। इसलिए चाहे सूबे की सरकारें भिन्न भिन्न हों परन्तु केन्र्द सरकार शक्तिशाली थी।"
6 इस कथन से ये भी स्पष्ट हो गया कि, केंद्रीय संविधान के अनुसार ही अलग अलग सूबे थे। हंऊँ वन्जारो राम को सहज करऊ बपारू।
मैं राम नाम धन लादिया विख लादी संसारू।।
मेरे रमिए रंग मजीठ का, कहि रविदास चमार।।
प्रोफेसर लालसिंह जी लिखते हैं कि इस शब्द में गुरु रविदास जी स्पष्ट करते हैं कि, हम चमार हैं क 1 के बीच बताए आदधर्म की विचारधारा के बारे में भी परिपक्व करते हुए स्पष्ट करते हैं कि, समूचे ज्योतिर्मंडल के बीच केवल और केबल अछूत चमार गुरु रविदास के पास ही ज्योतिर्ज्ञान है और वही इस ज्ञान के सर्वश्रेष्ठ बिक्रेता हैं। यह सिंधुघाटी के धर्म की समरूपता और महत्ता है। सिंधुघाटी की सीलों से ये परिपक्व किया गया है कि:---
Indus valley peculiar of its art and religion had no reselenblence in other countries in point of style जिस का शाब्दिक अर्थ है, सिंधुघाटी की कला और धर्म अदभुत गुणों के धारनी थे। जिस की दूसरे देशों के साथ किस भी किस्म की समरूपता नहीं थी।
उपरोक्त कथन में गुरु रविदास जी महाराज ने, सिंधुघाटी के आदधर्म की महानता, विलक्षणता और विश्व विचारधारा की तरह ही डंके की चोट पर घोषणा की है कि, संसार भर में केवल और केवल वे खुद ही अकेले ज्योतिर्ज्ञान के मालिक और बिक्रेता हैं।
बड़ा ही विष्मयकारी तथ्य तो ये है कि, सिंधुघाटी के आदधर्म की विचारधारा का विश्व में कोई भी सानी नहीं है और गुरु रविदास जी के आदधर्म की विचारधारा का भी कोई सानी नहीं है। दूसरे दोनों धर्मों की विचारधारा के बीच हैरान कर देने वाली समरूपता है।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
मई 02, 2021।
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