सिंधुघाटी सभ्यता में गुरु रविदास जी का दर्शन झलकता है।।
।।सिंधुघाटी सभ्यता में गुरु रविदास जी का दर्शन झलकता है।।
इस्लाम दर्शन जिसे अब अरब दर्शन भी कहा जाता है, उस के मुख्य चार आयाम निम्नलिखित हैं:---
मुतजलवाद (बुद्धिवाद)।
अशअरवाद (पांडित्यवाद)।
सूफीवाद (रहस्यवाद)।
दर्शन।
इस्लाम मुतजलवाद हिजरी सम्मत की प्रथम शताव्दी का अंत होते समय स्थापित हुआ था। ये धर्म ईश्वरीय एकत्व तथा ईश्वरीय न्याय पर आधारित था। ईश्वरीय एकत्व से अभिप्राय है, केवल अद्वैत अर्थात अकेला एक आदपुरुख सर्वोच्च, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान है।
अशअरवाद :---अपने समय में अशअरवाद, मुतजलवाद के विरुद्ध एक प्रतिक्रियात्मक आंदोलन था।
सूफीवाद:---ये आयाम आत्मा परमात्मा के बीच के गुप्त रहस्य अर्थात भेद को जानने का प्रयास करता है। इस का मूल दर्शन है अपने अंतःकरण को किस प्रकार पवित्र बनाएं, अपना नैतिक धरातल कैसे मजबूत बनाएं? अपने आंतरिक और बाह्य जीवन का कैसे निर्माण करें, ताकि शाश्वत आनंद की प्राप्ति हो सके।
इस्लाम दर्शन:---इस्लाम धर्म के अभ्युदय से पूर्व मेसोपोटामिया सभ्यता में हरनि तथा मिश्र में अलेक्सानड्रिया अपनी हैलेनिक संस्कृति के कारण प्रसिद्ध था।ओमैद काल के अरब साम्राज्यवादी गैर अरबियों के साथ खुल कर मिलने में अपनी हेठी समझते थे। अब्बासियों के अभ्युदय के साथ विजित लोग आपस में खुल कर विचार विनिमय करने लगे। अलकिन्दी को इस्लाम में धर्मनिरपेक्ष और विवेकशीलता का आरम्भकर्ता माना गया, जिस से स्पष्ट होता है कि इस्लाम धर्म मे भी एक निरंकार आदपुरुख की ही सर्व्यापकता को स्वीकार किया गया है।
क्रिश्चियन धर्म का दर्शन:---ये धर्म एक इब्राहीमी धर्म है, जो प्राचीन यहूदी परम्परा से जन्मा है। इस के अनुयायी ईसाई कहलाते हैं। ईसाई भी एकेश्वरवादी ही हैं लेकिन वे ईश्वर को त्रीएक के रूप में समझते हैं, परम् पिता परमेश्वर उन के पुत्र ईसा मसीह यीशू मसीह और पवित्र आत्मा। इस धर्म के अनुसार मूर्तिपूजा, हत्या, व्याभिचार, किसी को भी व्यर्थ आघात पहुँचाना बुरा कर्म है मगर बाद में इस धर्म को भी कर्मकांडों ने दुनियां को अंधकार युग में धकेल दिया था।
गुरु रविदास जी और चारों धर्म:---गुरु रविदास जी के अनुसार तीनों धर्मो में एक साम्य स्पष्ट झलकता हुआ दृष्टिगोचर होता और केवल वह है एकेश्वरवाद, जबकि बुद्ध धर्म अपनी ही खिचड़ी पकाता है, उस के अनुसार कोई ईश्वरीय शक्ति नहीं है जब कि यदि हम जीवन मे हररोज घटने वाली घटनाओं का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करें तो स्पष्ट महसूस होता है कि कोई अपरम्पार शक्ति है जो विश्व को नियंत्रित करती है। यही सत्य सिंधुघाटी की सभ्यता में भी नजर आता है क्योंकि इस सभ्यता के जीवन में कहीं भी किसी जेल के, फांसी घर के सबूत नहीं मिले हैं, कहीं भी कोई अनुचित व्यवहार के प्रमाण नहीं मिले हैं, गुरु रविदास जी ने, चारों धर्मो में अलौकिक सत्ता का अनुभव किया था मगर बुद्ध धर्म की उच्छृंखलता से उन्होंने कहीं भी सहमति दर्ज नहीं की हुई है। इसीलिए वे बुद्ध धर्म को सिरे से खारिज करते हुए परम् पिता परमेश्वर की सत्ता को स्वीकार करते हुए कहते हैं कि:---
"जब हम होते तब तुम नाहीं अब तूहीं मैं नाहीं"। गुरु जी इन शब्दों से स्पष्ट करते हैं कि उन्होंने परम् पिता परमेश्वर का आभास किया है, तभी तो वे ऐसा कहते हैं, जब कि बुद्ध ने इस सत्य को ठुकरा कर, शिक्षा विहीन तत्कालीन लोगों की अज्ञानता का लाभ उठा कर अपना दर्शन फैला कर अपना नाम ही रौशन किया है।
प्रोफैसर लालसिंह अपनी पुस्तक गुरु रविदास जी दा धर्म सिंधुघाटी दे आदिवासी अछूतां दा आदधर्म125 पर लिखते हैं कि, जिस प्रकार गुरु रविदास जी ने, हिन्दू धर्म के धर्म ग्रन्थों, पुस्तकों की विचारधारा का और चारों युगों का संक्षेप वर्णन कर के उन की समूची विचारधारा और उस के ऊपर आधारित कर्मकांडों को रद्द किया है, उसी तरह गुरु रविदास जीबन बुद्ध मत की विचारधारा का अध्ययन कर के उसे आंशिक रूप में मान्यता दी है, मगर उस में भी उन्होंने आत्मा परमात्मा के संकल्प को दर्ज करबा कर के उस में सुधार किया है और नए विश्व धर्म की विचारधारा का सृजन कर के विश्व धर्म को जन्म दिया है।
बुद्ध मत अहिंसा का राग अलापता आया है, ये अहिंसा कुछ सीमा तक तो जायज है मगर जिस प्रकार ब्राह्मण पुष्यमित्र शुंग ने, बृहद्रथ का कत्ल किया था और सम्राट अशोक द्वारा अहिंसा का पाठ पढ़ाने पर जब ब्राह्मण हिंसावादी हो गए थे तब नब्बे प्रतिशत बुद्धिष्ठ ही हिंसा के शिकार हुए थे, अगर सम्राट अशोक बुद्ध मत को विश्व में नहीं फैलाता तो बुद्धिष्टों के खून की नदियां नहीं बह सकतीं थीं। गुरु रविदास जी भी अहिंसा को उस समय तक ही जायज ठहराते हैं, जब तक उचित हो मगर जब कोई बेगमपुरा की स्थापना के रास्ते में रूकावट बन जाए, तब वे चाहते हैं कि रूकाबट डालने वालों का कत्ल करना ही बाजिब है, तभी बेगमपुरा बसाया जा सकता है। डाक्टर भीमराव अंबेडकर भी अपनी पुस्तक " Annihilation of caste ,P 127 पर लिखते हुए कहते हैं कि, मेरे अध्ययन के मुताबिक भारत देश के सन्तों ने कभी भी जात और छुआछूत को मिटाने के लिये आंदोलन नहीं चलाया। वो मनुष्यों के बीच के संघर्ष के लिए चिंतित नहीं थे, बल्कि वो ज्यादा चिंतित थे मनुष्य और ईश्वर के बीच सम्बंध के लिए। लगता है कि अम्वेदकर ने सभी गुरुओं की वाणी को पढ़ा ही नहीं है, जब कि गुरु रविदास जी ने छुआछूत के खिलाफ आजीवन ही संघर्ष किया है, वे अपने लिये खलास चमारा क्यों कहते? उन्हें तो सिकन्दर लोदी इस्लाम का सर्वोच्च नेता बनाता रहा, पंजाब का सूबा देकर महाराजा बनाता रहा, जिस को ठुकराने की सजा उन को काल कोठड़ी मिली थी, चँवर वंशी राजपूत होने पर चमार बनना पड़ा। कबीर साहिब ने भी हैं, कहा जातिपाँति पूछे नाहीं हरि को भजे सो हरि का होए। साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवालिया जी ने, अपने आदधर्म मंडल के नेताओं और आदधर्मियों का खून सड़कों पर बहाया था, जब कि डाक्टर भीम राव अम्वेदकर ऐसा कुछ नहीं कर सके थे और सांसद और कानून मंत्री बनने के लालच में फंस गए थे। गुरु रविदास जी क्रान्ति का दूसरा नाम है, जिन्हें समझना कठिन है।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
मई 08, 2021।
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