सिंधुघाटी सभ्यता तक कोई ब्राह्मणवाद नहीं था।।

।। सिंधुघाटी सभ्यता तक कोई ब्राह्मणवाद नहीं था।। सिंधुघाटी सभ्यता की खुदाईयों में, प्राचीन काल के निर्माणों और वर्तमान सभ्यता की कहीं कोई समानता नहीं मिली है। सिंधुघाटी की अंत्येष्टि हो जाने तक कोई भी मन्दिर नहीं बना था, जिन के कोई भी अवशेष नहीं मिले हैं। किसी भी ब्रह्मा विष्णु महेश की उपासना, साधना पूजापाठ का कोई भी सबूत नहीं मिल सका है। कहीं भी गाय सिंह, मातृदेवी, महादेवी, लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा काली, गोरी, देवी, महादेवी की मूर्ति, चित्र नहीं मिले हैं। सिंधुघाटी सभ्यता तक ब्राह्मण पुजारी नहीं :--- सिंधुघाटी सभ्यता में जब किसी भी जगह पर मन्दिरों के अवशेष नहीं मिले हैं, तो फिर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि, उस काल तक कोई भी पुजारी नहीं था, यदि पुजारी नहीं था, तो फिर ब्राह्मण भी नहीं थे। सिंधुघाटी के समय ब्राह्मण नहीं थे:---सिंधुघाटी सभ्यता के समय तक भारत में कोई मन्दिर नहीं थे, तो फिर मन्दिरों के पुजारी ब्राह्मण भी नहीं थे, आददुआरों में सत्संग करने वाले आदधर्म के धर्मात्मा लोग ही सम्राट सिद्धचानो जी महाराज और मातेश्वरी लोना उर्फ कामाख्या महादेवी सहित अपने आदिपुरुषों और सिद्धों की पूजा अर्चना किया करते थे, जिन का यूरेशियन लोगों ने नामोनिशान मिटा कर, उन की नकल कर के कल्पित देवी देवताओं की खोज कर के उन की कल्पित मूर्तियों को मढ़ियों में स्थापित किया है, जिन्हें बाद में हिन्दू मन्दिरों का रूप दिया गया है। आदधर्म का अंत :--- सिंधुघाटी की सभ्यता तक भारत में आर्य नहीं थे, तो फिर हिन्दू और हिन्दू धर्म और हिंदुओं के वर्तमान रामायण, गीता वेद पुराण, उपनिषद, ब्राह्मण पुस्तकें, दर्शन शास्त्र भी नहीं थे। यदि ये सभी पुस्तकें नहीं थी तो फिर भारत में जातपात, छूआछूत, ऊँच नीच भी नही थी। जिस से सिद्ध होता है कि ब्राह्मण इस काल के अंत में ही भारत मे घुसे हैं। मूलनिवासी ही आर्य:---अंग्रेज प्रोफेसर बेबर ने कहा कि भारत के लोगों को ही आर्य कहा जाता था। पंजाबी लेखक प्रोफेसर लालसिंह अपनी पुस्तक "गुरु रविदास जी दा धर्म सिंधुघाटी दे आदिवासी अछूतां दा आदधर्म" के पृष्ठ 20 पर लिखते है कि, प्रोफेसर बेबर के कथनानुसार:--- "His (Prof. Weber) conclusion that the Shudras were Aryans hits the nail squarely on the head. The only point of doubt is whether the Shudras were a tribe. That they (Shudras) were Aryans and Kshatriya is beyond doubt." जिस का अर्थ है कि, प्रोफेसर बेबर ने निष्कर्ष निकाला है कि, आर्य ही शूद्र थे, आर्यों के सिर पर विशेष तौर से कील मारने का काम करता है। केवल एक नुक्ते से शक है कि, क्या शूद्र एक कबीला ही था परन्तु वे (शूद्र) बिंना शक आर्य और क्षत्रिय वैश्य थे। प्रोफेसर लालसिंह जी लिखते हैं कि, कि, हम प्रोफेसर बेबर के तर्कपूर्ण कथन से पूर्ण रूप से सहमत हैं कि, ब्राह्मणों ने, आर्य खतरियों के बीच में से, कुछ अमीर खतरियों को अपने साथ आत्मसात कर लिया था और कुछ शूद्र घोषित किए थे, जिन्होंने इन लोगों की हस्ती, पदवी और प्रभुता की आलोचना की थी और उन्हें मान्यता देने से इंकार कर दिया था। इस प्रकार आर्यों में से ही शूद्रों की उतपत्ति हुई है। वास्तव में ये कथन तर्कपूर्ण ही सिद्ध होता है, क्योंकि आज भी खतरियों और चमारों के गोत्र एक ही हैं और  इन के सभी कुलदेवता भी वही हैं, जिन को आज चमार जाति पूजती है। ब्राह्मणों की ये फितरत चली आ रही है कि, जो भी महापुरुष मूलनिवासियों में से उन के साथ चलता है उसे मालामाल करते आए हैं, जब हनुमान उन के साथ चला तब वह भी अपमानित कर के बंदर के मुंह वाला देवता घोषित कर के हिन्दू मन्दिरों में विराजमान कर दिया है, विभीषण ने राम का साथ दिया था, तब उसे भी लँका का राजा बना दिया था, जब कृष्ण यादव ने यादवों से गद्दारी कर के कंस को मारा था, तब कृष्ण को भगवान बना दिया था, 1946 में जब इन्हें अंग्रेजी भाषा में संविधान लिखने वाला कोई भी ब्राह्मण नहीं मिला, तो डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को सांसद और कानून मंत्री बनाया दिया था, इसी तरह ही साहिब कांशीराम जी को भी राष्ट्रपति बनाने का लालच दिया था ताकि वे अछूतों को जागरूक ना बनाएं मगर उस वीर सपूत ने, ब्राह्मणों के लालच को किक मार कर अपने अछूतों के लिए जीवन कुर्बान कर दिया, आज फिर इतिहास दोहराया गया है, वर्तमान महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविद को भी ब्राह्मण पुजारियों ने अपने मन्दिर में प्रवेश करने नहीं दिया। आज केवल वहुजन मुक्ति के लिए संघर्ष करने वाले वामन मेश्राम जी ब्राह्मणों की आँखों का कांटा बने हुए हैं, जिन्हें जान से मारने की घोषणा इस लिये कर रखी है कि वे अछूतों को जागृत कर रहे है। सिंधुघाटी सभ्यता साफ साफ बता रही है कि, भारत में पांच हजार वर्षों से ही यूरेशियन लोगों ने अधिपत्य जमाया हुआ है, उससे पूर्व भारत में कोई छुआछूत, जातिवाद नहीं था, इन्होंने ही ये जहर घोल कर, बांटो और राज करो की नीति अपनाई हुई है, आज फिर अछूतों को कोरोना बीमारी की आड़ में, ब्राह्मणवाद भूखे मार रहा है, अछूतों को बेघर, बेकार और बर्बाद कर दिया है, चारों ओर कोरोना की आड़ में भय और मन में आतंक फैलाया हुआ है, ऐसा अधंकारमय युग इस से पहले भारत में कभी नहीं आया था। रामसिंह आदवंशी। अध्यक्ष। विश्व आदधर्म मंडल। मई 05,2021।

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