प्रोफैसर लालसिंह जी पँच तत्व में विलीन हो गए!!!
!!!! प्रोफेसर लालसिंह जी पंच तत्व में विलीन हो गए!!!!
प्रोफेसर दित्त सिंह के बाद अगर पंजाबी भाषा का कोई विद्वान, तर्कशास्त्री, मनोवैज्ञानिक लेखक, महान विश्लेषक, आलोचक, महाज्ञानी, गुरु रविदास महाराज का अनन्य भगत, आदर्श सेवक, अनुचर, आदधर्म का वीर योद्धा, पारंगत शिक्षक अगर कोई हुआ है तो वह हुए हैं प्रोफेसर लालसिंह जी। वे अचानक विश्व को त्याग कर तीन मई को छः बजे हमें अलविदा कह कर गुरु रविदास जी महाराज के चरणों में हमेशा के लिए विलीन हो गए, वे 81 वर्ष के थे।
जन्म:---प्रोफेसर लालसिंह जी का जन्म पिता शाम सिंह के घर माता हरनाम कौर की पवित्र कोख से पांच जनवरी सन ऊनी सौ चालीस को पंजाब के गांव शेरवानी मलेर कोटला, जिला संगरूर में हुआ था।
शैक्षिक योग्यता:---प्रोफैसर लालसिंह जी एमए पंजाबी, एलएलबी थे, पीईएस, हेड ऑफ दा पोस्टग्रेजुएट पंजाबी विभाग सरकारी कालेज होशियार पुर मे कार्यरत रहे। उन की सत्य के ऊपर आधारित तर्कपूर्ण भाषा में लिखे थिसिज पंजाब विश्वविद्यालय को हजम नहीं हुए जिस के कारण, उन्हें पंजाब विश्वविद्यालय ने पीएचडी की उपाधि जारी करने में सँकोच किया मगर वे अपनी निर्भीक आवाज में, निर्भीक लेखनी से गुरु रविदास जी महाराज जी के क्रांतिकारी स्वरूप को जनता के बीच प्रस्तुत करते ही रहे।सभी सन्त, गुरु रविदास जी महाराज के शब्द सति सँगत मिली रहियो माधो जस मधुप मखीरा की क्रांतिकारी शब्दों में इन्होंने ही व्याख्या की और लिखा कि हे अछूतों! गुरु जी आदेश देते है कि, आप मधुमखियों की तरह मिल कर रहो अर्थात जिस प्रकार मधुमखियों एकता बना कर रहती हैं, सभी मिल कर मीठा मीठा शहद इकठ्ठा करतीं हैं, फिर बिंना मेहताना मजदूरी लिए ही जनता को दे देतीं हैं, मगर जब कोई उनके ऊपर प्राणघातक आक्रमण कर देता है, तो वे रानी मक्खी के आदेश की परवाह नहीं करतीं और दुश्मन पर इकठी हो कर टूट पड़तीं हैं और उसे तब तक खाती रहती हैं, जब तक वह मर नहीं जाता, इसी तरह वे अछूतों को भी आह्वान करते हैं कि आप भी मूक मधुमक्खियों से सीखो और अत्याचारी को मौत के घाट उतार कर अन्याय का बदला खुद लो। आज तक कोई भी अछूत सपूत इस प्रकार की व्याख्या सँगत के समक्ष नहीं कर सका और ना ही करेगा, इसी लिए वे अमर रहेंगे।
प्रोफैसर लालसिंह का स्वभाव:---जहाँ प्रोफैसर लालसिंह जी पंजाबी के श्रेष्ठतम विद्वान थे, वहां वे क्रांतिकारी भी थे। वे अपने मार्ग पर चलते हुए किसी के बाधा बनने पर उग्र रूप भी धारण कर लिया करते थे। इसी कारण उन्होंने गुरु रविदास जी महाराज की वाणी को समझा, परखा और खूनी क्रांति का आह्वान किया। वे कहते हैं कि गुरु रविदास जी महाराज फरमान जारी करते हैं कि, यदि कोई बेगमपुरा बनने नहीं देता है, तो उसे रास्ते से हटने के लिये प्रेरित करना चाहिए, उसे प्यार की भाषा में समझाना चाहिए फिर भी वह नहीं माने और बेगमपुरा बनने नहीं देता है तो उस का कत्ल कर देना चाहिए अन्यथा धरती पर गमरहित समाज कभी नहीं बन सकता। इसी में ही जीवन की सार्थकता है, तभी हम सम्मानित जीवन जी सकते हैं, ऐसे भावों को समझने वाले बिरले ही योद्धा होते हैं।
मेरा व्यक्तिगत खट्टे मिठ्ठे संस्मरण:---मैं उन से पहली बार दो हजार ग्यारह में होशियार के पास नन्दगढ़ महिलांवाली में, स्वामी ईशरदास जी महाराज की तपोभूमि में मिला था, जहां पर वे अपने सहयोगियों के साथ, गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ में संसोधन करने के लिए अपने विचार रखने के लिए आए थे। मैं भी गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ ट्रस्ट का महासचिव होने के नाते उन से बातचीत कर रहा था। वे चाहते थे कि, गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ में से यूरेशियन ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रकरणों को हटा देना चाहिए मगर मैं उस समय धर्मांध होने के कारण, उन के विचारों से कतई सहमत नहीं हुआ जिस के कारण हम दोनों के विचारों में जोरदार टकराव होता रहा, अंत में जब मैं गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ में कोई भी छेड़छाड़ ना करने पर अड़ा ही रहा, तब वे भी चुप हो गए मगर जब बाद में मैंने उन के भावों का आत्मिक विश्लेषण किया, गहराई से चिंतन किया था, तब अनुभव हुआ कि, जो प्रोफैसर लालसिंह जी जो कह रहे थे, वह उचित ही था मगर उन्होंने भी अपनी उग्र भाषा में ही अपने विचार रखे जिन के कारण मैं भी अड़ गया, जिस का मुझे दुख होता रहता है।
दिल्ली में पुनः मतभेद:--- सैन्ट्रल कमेटी दिली ने गुरु रविदास दर्शन पर सेमिनार आयोजित किया गया था, जिस की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष श्रीमती मीरां कुमार कर रही थी, जिस में मुझे भी हिमाचल प्रदेश से श्री नरेन्द्र जस्सी, अक्षय आदवंशी, बुद्धि प्रकाश और बलबीर ने विशेष तौर पर बुलाया था। मुझे प्रोफैसर लालसिंह पर इसीलिए गुस्सा था कि, उन्होंने कई जगह गुरु रविदास जी महाराज को सिख हो कर अपनी किताब में भगत लिख हुआ है। उन से मुझे गिला शिकबा इसलिए था, कि वे भी मेरी और गुरु रविदास जी की तरह चमार ही हैं, फिर ये गुरु जी को गुरु क्यों नहीं लिखते? जब मुझे मंच पर, अपने विचार रखने के लिए बुलाया गया, तब बदकिस्मती से अध्यक्षा भी रिटायरिंग रूम में आराम फरमाने चली गई थी और अध्यक्ष की कुर्सी खाली पड़ी हुई थी, जिसे देख कर मुझे हैरानी हुई कि हमारे ही महापुरुष हमारा ही सम्मान नहीं करते तो फिर मनुवादी कब करेंगे। मैं ने, अपने संबोधन में कहा कि हम कितने सौभाग्यशाली हैं कि, हमारी अध्यक्ष की कुर्सी खाली पड़ी हुई है, किसे संबोधित किया जाए? इसी गुस्से में मुझ से ये निकल गया कि प्रोफैसर लालसिंह जी भी, गुरु रविदास जी को गुरु ना लिख कर भगत लिख देते हैं, क्या यही हम एक दूसरे का सम्मान करते हैं, प्रोफैसर लालसिंह जी बीच में ही मुझे टोकने उठ खड़े हो गए थे, मगर सभी श्रोताओं ने उन्हें बैठा दिया मगर बाद में, मुझे भी अहसास हुआ कि ये गुस्सा मुझे अकेले में निकालना चाहिए था। उस के उपरांत जब मैं पंजाब के रुड़की स्वामी ईशरदास जी महाराज के शिष्य फकीर चन्द जी महाराज के आददुआरे में, अपने अंतराष्ट्रीय गुरु रविदास मिशनरी दोस्त श्री अमरजीत गुरु के साथ, सन्त स्वयं दास जी को मिलने गया, तब सन्त स्वयं दास जी ने मुझे प्रोफैसर लालसिंह जी की लिखी हुई एक पुस्तक "आदधर्म बनाम विश्व धर्मग्रँथ आदिपोथी साहिब दे सिरजक सतिगुरु रविदास जी" भेंट की, जिसे पढ़ कर मैं प्रोफैसर लालसिंह जी का कायल हो गया था और उन्हें अपना आदर्श मानने लगा हूँ, उस के बाद मैं उन से फोन पर निरन्तर बार्तालाप करता रहा और जब भी पंजाबी भाषा के शब्दों की क्लिष्टता मुझे परेशान करती थी, मैं उन से डिसकस करता रहता और वे भी बड़े अदब से समझाते रहते। मैंने उन से एक बार आग्रह किया कि आप अपने ज्ञान को लिखते रहो ताकि भावी पीढ़ियां आप के अथाह ज्ञान से लाभान्वित हो सकें, तब वे बोले अब मैं नहीं करना चाहता हूँ। जब मैं गुरु आदिप्रगाश ग्रँथ साहिब के शब्दों की व्याख्या लिखने में कठिनाई समझता था, तब तुरन्त उन्हें फोन करता और अपनी समस्याओं को उस से बताता, वे भी लिख कर मुझे बट्सप पर भेज देते, कितने महान थे वे!
दो मई को अंतिम फोन:---मुझे चरणजीत सिंह जी गाँव भोगपुर पंजाब ने प्रोफैसर लालसिंह जी की गत मॉर्च को जालंधर में किताबें भेंट करते हुए आग्रह किया कि, सर क्या आप प्रोफैसर लालसिंह जी की किताब "सटीक वाणी श्री गुरु रविदास जी अते तत्त-सिद्धांत" का हिंदी अनुवाद कर देंगे। मैंने तत्काल सोचा कि ये काम तो गुरु रविदास जी का मुझे प्रसाद के रूप में मिल रहा है, जिसे करने के लिए मैंने तत्काल ही हाँ कर दी। इसी कारण मैंने भी दो मई को प्रोफैसर लाल सिंह जी से तत्त सिद्धांत पुस्तक को हिंदी में अनुवाद करने की अनुमती लेने के लिए एक बज कर बीस मिनट पर फोन किया और पूछा, सर अगर आप अनुमती दें दें तो मैं किताब का हिंदी में अनुवाद कर दूं। उन्होंने कहा कि, आप चरनजीत सिंह से ही बात करें, वही सब कुछ करेंगे। मैंने उन से फिर आग्रह किया कि, सर आप अपना लेखन कार्य बन्द मत करो, आप को जीवन का अनुभव है और लेखन का अनुभव है, आप की कलम क्रांतिकारी है, आप कृपया गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ की सरल भाषा में व्याख्या कर दो, क्योंकि मैं पंजाबी वहुत कम जानता हूँ भले ही मैंने गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ का पंजाबी से हिंदी अनुवाद कर दिया है मगर पंजाबी भाषा के गूढ़ शब्दों के गूढ़ अर्थों को मैं नहीं समझता, इसी लिए आप जब तक सांस हैं, तब तक ये लेखन का पवित्र कार्य करते रहें। प्रोफैसर लालसिंह जी मेरे विचारों से सहमत हो गए और अश्वासन भी दिया, कि हम कुछ करते रहेंगे मगर काल की चाल को कौन जानता कि इस समय मेरी अंतिम फोनिक भेंट चल रही है। आज आधा घण्टा बात होती रही, जब कि वे किसी से भी वहुत कम ही बोलते थे, आज रात जब मैं ने, चरनजीत सिंह द्वारा डाला शोक सन्देश फेसबुक पर पढ़ा, तो एहसास ही नहीं हो रहा था कि ये समाचार सत्य हो सकता है, इसी कारण रात के ही तीन बजे चरणजीत सिंह जी को फोन पर पूछा, कि क्या प्रोफैसर लालसिंह जी के बारे में सत्य है? तब उन्होंने कहा, हाँ, मैं ने ही ये शोक संदेश फेसबुक और बट्सप पर डाला है, तब मुझे सच लगा।
प्रोफैसर लालसिंह जी आदधर्म के सच्चे-सुच्चे कर्मठ पुरोधा थे, उन्हों ने तीर तलबार गोली को किनारे रख कर, गुरु रविदास जी महाराज की वाणी की व्याख्या कर के भावी वच्चों को चलने के लिए क्रान्ति का मार्ग प्रशस्त किया है, मैं भी उन का अनुकरण कर के, उन से सीख कर सत्य को जनमानस तक पहुँचाने का कार्य अंतिम सांस तक करता रहूंगा। ये कुछ यादें उन के लिए मेरी हार्दिक और पवित्र श्रंद्धांजलि है। उन की धर्मपत्नी जगदीश कौर जी को गुरु रविदास जी महाराज, इस दुख की वेला में ढाढस बंधाएँ!!!!
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
हमीर पुर।
हिमाचल प्रदेश।
मई 04, 2021।
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