तत्त सिद्धांत।। भाग चार।।
।।तत्त सिद्धांत भाग चार।।
सो सोहम के बीच ओम व्यापक है।सोहम के इस गुप्त रूप ओम को प्रकट कर के विश्व व्यापी विचारधारा के आधार ओम को इक़ ओंकार का स्वरूप दिया है। इस तरह से हम ओम और इक ओंकार तीनों शब्दों के अर्थो में कोई अंतर नहीं मानते है। हरि जपत तेऊ जन वाले शब्द के बीच गुरु रविदास जी ने सोहम ओम को और व्यापक अर्थों के बीच खोल कर व्याख्या की है। इस व्याख्या के साथ सोहम ओम का स्वरूप बदल कर इक ओम बन गया है। सो उन्होंने सोहम को इक ओंकार का स्वरूप देकर विश्व व्यापी विचारधारा को परिपक्वता और दृढ़ता प्रदान की है। उन का कथन है कि:---
हरि जपत तेऊ जना पदम् कवलासपति
तास सम तुल नहीं आन कोऊ।।
एक ही एक अनेक होई बिस्तारियो
आन रे आन भरपूर सोऊ।। रहाऊ।।
इस शलोक में आए हरि के अर्थ को इस शब्द के बीच दर्ज हरि स्पष्ट करता है। ये स्पष्ठता भी रहाऊ के अधीन है। रहाऊ वाले बन्द के बीच समूचे शब्द का बुनियादी सिद्धांत और मुख्य मंतव्य होता है इस तरह हरि के अर्थों की स्पष्टता और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। इस के बीच आए हरि के अर्थ हैं, पारब्रह्म केवल और केवल एक हैं। विष्णु महेश और ना कोई अन्य ब्रह्मा आदि हरि भगत के भी बराबर नहीं है। सो पारब्रह्म एक है, सृष्टि का सृजन उस का पालन करना और उस का संहार करना उस की शक्तियां हैं। वह एक से अनेक हो कर अपनी सृष्टि के बीच विचर रहा है। साईंस भी यही कहती है। साईंस ने इस एक को ऊर्जा कहा है और इस ऊर्जा विद्युत के कणों के साथ ही सभ कुछ बना हुआ है। एक से ही सब कुछ बना हुआ है। विज्ञान कहता है की ऊर्जा इलेट्रिसिटी तीन के बीच टूटती है---इलेक्ट्रान, न्यूट्रॉन और प्रोटान। यही तीन शक्तियाँ जन्म पालन और संहारन का कार्य करती हैं। भाव ऊर्जा परमात्मा है और इस की तीन शक्तियाँ जन्म देना, पालना और उस का संहार करना। ब्रह्मा, विष्णु और महेश उस का ही सृजन है और पारब्रह्म उन के बीच ही विराजमान हैं, इस कर के वह भगवान बन नहीं सकते। वे आम व्यक्ति ही है गुरु रविदास जी के इस विचार की पुष्टि गुरु नानकदेव जी भी जपुजी के बीच करते हैं। इस तरह उपरोक्त विश्व व्यापी विज्ञानक विचारधारा ने भगवानों के संकल्प को रद्द कर के हिन्दू धर्म की विचारधारा को भी रद्द कर दिया है।उपरोक्त चर्चा अनुसार शलोक के बीच आए हरि के अर्थ बनते हैं, पारब्रह्म एक है और जन्म देना पालन और संहार करना इस कि तीन प्रमुख शक्तियाँ हैं। इस कर के सो भाव पारब्रह्म एक ही है और हं भाव "मैं"उस का सृजन --उस का अंश है।
परिणामस्वरूप गुरु ग्रँथ साहिब के बीच दर्ज मूलमंत्र का इक़ ओम इस शलोक के बीच निरूपित है क्योंकि सोहम ओम और इक ओंकार तीन शब्दों के अर्थों के बीच अंतर नहीं है।
सोहम- उआँग
सो -उ एक वचन इक उ
हं--अं
सोहम -इक ओम
उ - ओम
सो सोहम - इक ओम
गुरु नानकदेव जी की वाणी से भी दृढ़ हो जाता है कि ओम के बीच एक व्यापक है--
ओङ्कारी ब्रह्मा उतपत्ति ।।
ओंकारू किया जिनी चिति।।
सो ओम ही इक ओंकार है। सो सोहम -- इक ओंकार।
इस का टेबल निम्नलिखित अनुसार है।
सोहम
क्रमशः।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
मई 12, 2021।
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