सिंधुघाटी, मोहन जोदड़ो,राखी गढ़ी सभ्यता यूरेशियन के लिए आतंक थी।।
।।सिंधुघाटी, मोहनजोदड़ो, राखीगढ़ी सभ्यता यूरेशियन के लिए आतंक थीं।।
सिंधुघाटी, मोहन जोदड़ो, राखीगढ़ी की सभ्यता विश्व की आदर्श सभ्यताएँ थीं, जिन का आभास तत्कालीन नगर निर्माण, धर्म, कला, संस्कृति और रहन सहन से होता है। विशाल भारतवर्ष की सत्य पर आधारित जीवन शैली, जनता की धार्मिक विचारधारा, आपसी प्यार, स्नेह, श्रद्धा, अध्यापक और नारी का सम्मान सिंधुघाटी सभ्यता की प्रशंसनीय विशेषताएं थीं। जिस के बारे में निम्नलिखित वाक्यांश से ज्ञात होता है:--
"Indus valley peculiar of its arts and religion had no resemblance in-other countries in point of style.
उपरोक्त इतिहास से स्पष्ट हो जाता है कि, पाँच हजार वर्ष पूर्व भारत किस प्रकार का देश था? कितनी उन्नति की ऊंचाइयों को छू चुका था? विश्व में कितना सम्मानजनक स्थान प्राप्त कर चुका था? भाषा, कला संस्कृति कितनी उन्नत हो चुकी थी? सिंधुघाटी, मोहन जोदड़ो और राखी गढ़ी का चित्र लिखने वाले लेखक ने, इन शब्दों से करोड़ों वर्षों के इतिहास को विश्व के समक्ष प्रस्तुत कर दिया है। इन पँक्तियों का अर्थ स्पष्ट करता है कि, सिंधुघाटी सभ्यता, कला, धर्म और संस्कृति के क्षेत्र में अदभुत गुणों से भरपूर थी, जिस की विश्व के अन्य देशों से कोई भी तुलना नहीं की जा सकती है। किसी से समानता नहीं की जा सकती है अर्थात ये सभ्यता विश्व में अद्वितीय थी।
लुटेरों की आदत:---जब कोई भी लुटेरा किसी घर में घुसता है, तब वह सब से पूर्व उस घर की रोशनी (लाईट) को नष्ट कर के अपनी ही टार्च के मद्धम प्रकाश से अंदर प्रवेश करता है। इसी प्रकार विदेशी यूरेशियन भी उन्हीं डाकुओं की तरह घुसे थे और यहां की भोलीभाली जनता की मानवता का लाभ उठाते गए और लूटपाट करते करते, निहत्थे भारतीयों को मारते, काटते गए। मूल भारतीयों की अहिंसा ही तत्कालीन शासकों को ले डूबी, उन का नारी के प्रति सम्मान भारत को छल के जाल में फंसाता ही गया, यूरेशियन नारियां अपने छल बल से भारतीय शासकों को अपनी छद्म नीति से निगलती ही गईं। भारतीय लोग नारी को सृष्टि की रचयिता मानते थे, जिस के कारण वे नारी को कभी भी सन्देह की नजर से नहीं देखते थे, नारी चाहे विदेशी होती थी चाहे भारतीय हो, वे सभी को सम्माननीय समझते थे मगर यूरेशियन आक्रांता सैन्य बल से लैस तो थे नहीं, उन की सेना की टीम केवल नारी ही थी, उन की नारी के विकृत, हाव भाव, नयन कटाक्ष, मोहनी विद्या, आकर्षण और चरित्रहीनता ही भारतवासियों के साथ युद्ध करने वाले हथियार और औजार थे, जिन के बल पर इन्होंने भारत के शासकों को जीता था।
आर्यों ने नारी जाति को कलंकित किया:---बड़े ही आश्चर्य की बात है कि, जिन यूरेशियन लोगों ने शिक्षा की देवी सरस्वती, धन दौलत की देवी लक्ष्मी, शक्ति की देवी काली, चंडी का रूप दुर्गा आदि नारियों को मान कर विश्व के समक्ष प्रस्तुत किया है, उन्हीं नारियों और उन की बहनों को, ढोल नगाड़ों घण्टियों की कर्कश ध्वनि में चीखें मारती हुई, चिल्लाती हुई, विलाप करती हुई को पांच हजार सालों ने जिंदा जलाते आए हैं, गुरु रविदास जी महाराज ने ही सब से पहले अपनी अजमत से योग्य शिष्या मीराबाई जी को अपनी अमोघ शक्ति प्रदान करते हुए यूरेशियन के थोथे अहंकार को कुचलने का प्रतीक बना कर, सती के नाम पर पीड़ित मृतक की पत्नी को जिंदा जलाने वालों को विश्व में नँगा कर के, नारी के स्वाभिमान की रक्षा की थी, उन के बाद भला हो अंग्रेजी हकूमत का, जिस ने दुर्दांत सतिप्रथा के खिलाफ कड़ा कानून बना कर भारतीय नारी को अकारण शहीद होने से बचाया था। ये नारी का सम्मान केवल मूलनिवासियों के आद पुरुष से चले आ रहे आदर्श आदधर्म में ही मिलता है जब कि बाकी सभी मतों में, नारी जाति को केवल मात्र खिलौना ही समझ कर, उस की अस्मत से खिलबाड़ ही किया है।
मूल भारतीय नारी:--मूल भारतीय नारी कभी भी किसी के गिराने से कभी नहीं गिरी है, भले ही उस के दामन को कुछ भेड़िए गन्दा करते आए हैं मगर वह जहां तक हो सके अपनी आबरू को अपने आँचल में सुरक्षित संजोए रखने के लिए विदेशी यूरेशियन की हवस को भी बर्दाश्त करती आई है। आदधर्म की प्रहरी मातेश्वरी लोना उर्फ कामाख्या महादेवी को भले ही चमारी कह कर अपमानित करने का प्रयास किया गया है, उसे मन्दिरों में स्थापित कर के भी अपमानित और जलील किया जा रहा है मगर ये विश्वशक्ति एवं जननी किसी शुभचिंतक या अशुभचिंतक को निराश नहीं करती है, किसी के अपमान करने पर किसी को भी दुख नहीं देती, जो भी उस के दरबार में मांगने आता है, उसे देती है, जब कि लाखों कल्पित देवियां केवल मन्दिरों की मात्र शोभा ही बनी हुई हैं मगर शक्ति केवल साम्राज्ञी मातेश्वरी लोना के ही पास है। उन के बाद विश्व मातृ शक्ति गौरजां ने सम्राट शिव की अर्धांगिनी बन कर जो विदुषी, महाशक्ति, आदर्श गृहमंत्री बन कर, भोलेभाले पति परमेश्वर का साथ देते हुए मूलनिवासियों की रक्षा करते करते शहादत दी है उस का कोई सानी नहीं है। साधु सन्तों के सिरमौर गुरु रविदास जी महाराज की सुलक्षणी जीवन संगनी सुभागन उर्फ भगवत लोना ने आदधर्म का शंखनाद खुद भी किया और उस की ध्वनि भी समूची सँगत के साधु, सन्तों के जहन तक निरन्तर पहुँचाई। जब भी साहिब रविदास जी महाराज, विश्व टूर पर चले जाते थे, तब ये भक्ति की शक्ति महादेवी गुरु रविदास जी के आदधर्म का प्रवचन सँगत को देकर उपकृत किया करती थी।
आदधर्म अपनाना जरूरी:---वैश्विक आदधर्म ही गुरु रविदास जी महाराज का धर्म था, जिस का प्रचार प्रसार करने के लिए सभी वर्णों की औरतों ने जी भर कर अपनी मॉन मर्यादा को त्याग कर काम किया है, राजाओं महाराजाओं, रानियों, महारानियों, बादशाहों और बेगमों ने भी गुरु रविदास जी महाराज के आदधर्म की वाणी को अंतर्मन में संजो कर अपने जीवन को सफल बनाया है। यदि विश्व को सम्मान, सुख, शान्ति और स्वाभिमान से जीना है, तो गुरु रविदास जी महाराज के आदधर्म को ही अपनाना ही पड़ेगा।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
मई 03, 2021।
Comments
Post a Comment