सिंधुघाटी सभ्यता और ज्योतिर्मंडल गुरु रविदास जी।
सिंधुघाटी सभ्यता और ज्योतिर्मंडल गुरु रविदास जी।।।
विदेशियों लेखकों ने, गुरु रविदास जी महाराज को समझा परखा और माना है कि वे विश्व की अमूल्य धरोहर है, इसीलिए मार्क आदि अनेकों इतिहासकारों ने गुरु जी के बारे में लिखा है, जो आज हमारे लिए प्रेरणास्रोत बना हुआ है। यदि ये जातिवाद के दुश्मन ना लिखते तो आज गुरु रविदास जी गुमनाम दुनियां में ही होते। केवल गुरु रविदास जी के इतिहास को मिटाने का काम ब्राह्मणों ने ही नहीं किया है, अपितु बुद्ध और सिख मत ने भी भी पूरा ऐड़ीचोटी का जोर लगा कर अपनी जातिवादी मानसिकता को प्रदर्शित किया है। आज भी इन मतों के प्रचारक गुरु जी का नाम ले कर अपनी संख्या बढ़ाने के लिए उन का सहारा लेते हैं मगर अंदर खाते सभी गुरु जी का विरोध ही करते हैं। सिखों के अवतार गुरु नानकदेव जी गुरु रविदास जी के शिष्य हुए हैं मगर सिखों ने गुरु नानकदेवजी के नाम पर अनेकों आलीशान गुरुदुआरे, मूलमंत्र भवन तोरण आदि बना कर उनको सम्मानित कर रखा है, मगर गुरु रविदास जी के नाम पर कहीं एक ईंट तक नहीं लगाई है। अमर ऐतिहासिक तीर्थ सुल्तानपुर लोधी तो केवल गुरु रविदास जी के कारण ही विश्व में प्रसिद्ध हुआ था, गुरु रविदास जी ने, इसी स्थान पर सभी सन्तों को बुला कर मूलमंत्र को मान्यता दिलाने के लिए, सतगुरु कबीर जी, सेन जी, नामदेव जी, जीवन दास, जी रैदास जी और गुरु नानकदेव जी को बुलाया था मगर गुरु नानकदेव जी के पिता ने इस सन्त सम्मेलन में गुरु नानकदेव जी को जाने की अनुमति नहीं दी थी और उन पर कड़ा पहरा लगा दिया था। गुरु नानकदेव जी अपने सभी विरोधियों को चकमा देकर समीप की बेई में डुबकी लगा कर सुलतान पुर लोधी पहुँचे थे, मैं समझता था कि सुल्तानपुर लोधी में गुरु रविदास जी का वहुत बड़ा तीर्थ स्थल होगा मगर जब मैं पिछले साल वहां गया तो केवल गुरु नानकदेव का ही वहां गुणगान हो रहा था, जहां मूलमंत्र के लिए सम्मेलन हुआ था वहां भी आलीशान भवन मूलमंत्र बन रहा है मगर गुरु रविदास जी का तो कोई नामोनिशान नहीं है। इस से स्पष्ट होता है कि सिखों को भी गुरु रविदास जी के चमार होने की एलर्जी परेशान करती है, यही हाल बुद्धिष्टों का है, कहीं भी इन लोगों ने गुरु रविदास जी का चित्र भी अपने घरों और मठों में नहीं लगा रखा है मगर अपना बुद्ध धर्म प्रसारित करने के लिए चमारों के पीछे हाथ धो कर पड़े रहते हैं। गुरु जी ने भी कभी कहीं बुद्ध को घास नहीं डाली ,कभी बुद्ध का अपनी वाणी में जिक्र तक नहीं किया है इतना जरूर है कि गुरु जी ने लोगों को इस धर्म की अनीश्वरवादी विचारधारा से बाहर निकालने का प्रयास किया है। अहिंसा का जाप करने से रोका है ताकि जिस प्रकार अहिंसा का गीत गाने वाले भारतीय बुद्धिष्टों का बड़ी बेरहमी से भारत के ब्राह्मणों ने कत्ल किया था उसे रोकने के लिए हिंसा को आवश्यक बताया हुआ है इसीलिए गुरु रविदास जी लिखते हैं:---
"सत्संगत मिलि रहियो माधो जस मधुप मखीरा" अर्थात सँगत को मधुमक्खियों की तरह मिल कर रहना चाहिए, मगर जब कोई उन को छेड़ता तो सभी मधुमक्खियां तुरंत दुश्मन पर टूट पड़ती हैं, हिंसा का जबाब हिंसा से देकर दुश्मन को मार देतीं है। वे आगे भी इसी तर्ज पर लिखते है "बेगमपुरा शहर को नांऊँ"
गुरु रविदास जी सिंधुघाटी सभ्यता की तरह ही बेगमपुरा बसाना चाहते हैं मगर जिस प्रकार यूरेशियन आक्रांताओं ने अहिंसक मूलनिवासियों का कत्ल किया था, उस तरह दुबारा ना हो, उस के लिए, गुरु महाराज जैसे को तैसा करने की हिदायत देते हैं। यदि कोई भी बेगमपुरा बसने नहीं देता है तो वे सीधा फरमान जारी करते हैं कि रोकने वाले का कत्ल कर दो, तभी बेगमपुरा बसाया जा सकता है। ऐसे हुए हैं क्रांतिकारी वीर सतगुरु रविदास जी महाराज।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
मई 09, 2021।
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