।।तत्त सिद्धांत भाग दो।
।।सोहम/इक ओंकार के सिद्धांत का निरूपण।।
गुरु ग्रँथ साहिब के बीच दर्ज भगतों की वाणी के बीच आज तक किसी भी विद्वान ने मूलमंत्र का तत्त सिद्धांत ढूंढने की कोशिश नहीं की।पलेठा सिद्धांतात्मक अध्ययन होने के कारण भगतों की वाणी के बीच मूलमंत्र के सिद्धांतात्मक विचारों की खोज कर के सिद्धांत स्थापित करना एक कठिन कार्य बन गया है। ये इस कारण बन गया है, क्योंकि पहले ऐसा कोई मॉडल उपलब्ध नहीं है, चाहे वाणी की खास कर के जपु जी की चर्चा करते हुए विद्वानों ने सिद्धांतक मॉडल स्थापित किये हैं। शलोक हरि सो हीरा छाँड़ि करी----के बीच सोहम इक ओम का सिद्धांत उपलब्ध है। सोहम से ही सृष्टि का सृजन हुआ है। इस की पुष्टि के लिए नीचे अध्ययन करते हैं।
इस शलोक के आरंभिक तीनों शब्दों का अर्थ पार ब्रह्म प्रभु बनता है। "हरि" का अर्थ पारब्रह्म है, "सो" का अर्थ पारब्रह्म है और हीरा का अर्थ भी करतार अर्थात पारब्रह्म ही है। इस के साथ एक और महत्त्वपूर्ण विचार स्पष्ट होता है---- "हरि" एक वचन हैं, "सो" एक वचन है और "हीरा" भी एक वचन है। इस से बड़ी परिपक्वता के साथ दृढ़ हो जाता है, कि पारब्रह्म एक है। इस तरह गुरु रविदास जी का पारब्रह्म करतार को तीन बार प्रकट करने का मंतव्य उस के महानतम गुण की पारब्रह्म केवल और केवल एक ही है कि तथ्य के अस्तित्व को परिपक्वता के साथ दृढ़ कर के इस शलोक के पिछोकड़ (पृष्ठभूमि) के बीच विचर रहे उस के अंश जीवों का बोध करवा कर, और दूसरी तुक के बीच "ते" नर के रूप को प्रकट रूप में स्पष्ट के उस की सृजित सृष्टि की अटल सच्चाई का बोध करवाता है, इस से एक महान सिद्धांत का सृजन होता है।
सो-(एक वचन) वह पार ब्रह्म एक है।
ते नर- (बहुवचन) ज्योति, अंश हिस्सा सारे ही पार ब्रह्म की ज्योति हैं।
नर-(एक वचन) जीव,मैं प्रभु की ज्योति, अंश हूँ।
मैं-अहं।
हं-अहं का संक्षेप।
इस तरह पिछोकड़ के बीच विचर रहा जीव उस से (पारब्रह्म) की ही अंश है। दोनों के बीच कोई अंतर नहीं है। दोनों का अटूट संबंध है।इस संबंध को दिखाने के लिए ही "छाड़ि" के शब्दों का सृजन किया गया है। इस तरह सिद्ध हो गया है कि "सो" (पारब्रह्म) की अंश पिछोकड़ के बीच विचर रहा अहं (जीव) है। "सो" समास बन गया है--सोहम। "सोहम" का अर्थ है--वह मैं हूँ। दोनों के बीच कोई अंतर नहीं है। सो "सोहम" एक सिद्धांत है। सोहम से ही सृष्टि का सृजन हुआ है, जिस की गुरु रविदास जी ने अपनी वाणी के बीच सिद्धांत की परिपक्वता को दृढ़ करते हुए संकेत रूप में बड़ी स्पष्टता के साथ निरूपित किया है। इस सिद्धांत की परिपक्वता करते हुए गुरु जी फरमाते हैं कि:---
तोहि मोहि मोहि तोहि
अंतरू कैसा।।
कनक कटिक
जल तरंग जैसा।।
तोहि मोहि और मोहि तोहि दोनों शब्दों के स्थानों की अदला बदली कर के गुरु जी ने पूर्ण रूप से स्पष्ट किया है कि "तूँ" और "मैं" और "मैं" और "तूँ" दोनों एक ही हैं, दोनों के बीच कोई अंतर नहीं है। अंतर केवल दृष्टि के भेद का ही है।
सो-तोहि-पारब्रह्म।
अहं-मोहि-पारब्रह्म की अंश।
सृष्टि के सृजन के समय "तोहि" ने ही "मोहि" का सृजन किया है सो "तोहि" से ही "मोहि" का जन्म हुआ है और पीछे सृष्टि को समेटने के समय "मोहि" "तोहि" के बीच ही समय समाप्त हो जाता है। गुरु रविदास जी पारब्रह्म के सृष्टि सृजन और फिर उसे समेटने की प्रक्रिया की ओर संकेत करते हैं। इस संकेत का आधार ”तोहि" और "मोहि" के स्थान की अदला बदली है। जिस के साथ उह मैं हूँ और "मैं उह हूँ", भाव सोहम का सिद्धांत तो सिद्ध होता ही है, इस से सृष्टि सृजन का सिद्धांत भी सिद्ध हो जाता है।
क्रमशः
अनुवादक।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
मई 10, 2021।
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