तत्त सिद्धांत। भाग दो।।

।। तत्त सिद्धांत भाग दो।। इन दोनों सिद्धांतों को गुरु रविदास जी ने दो दृष्टांत देकर और भी स्पष्ट कर दिया है, जिस प्रकार: सोना (सो) सोने का ही अंश है (हं), अहं का ही संक्षेप) से बने गहने हैं: जब सोने के आभूषणों को ढाल (समेट) लिया जाता है, तब वे सोना ही बन जाते हैं। जिस प्रकार पानी सो और पानी अंश (हं) लहरें हैं: जब लहरें मिट जाती हैं तब वे पानी ही बन जाती हैं। उसी प्रकार पारब्रह्म (सो) और पारब्रह्म की अंश आत्मा (हं) सृष्टि के बीच निरूपित है: जब सृष्टि समेटी जाती है, तब पारब्रह्म की अंश आत्मा (हं) पारब्रह्म सो के बीच समा जाती है। स्पष्ट है कि तोहि (सो) और मोहि (हं) एक ही हैं। इन के बीच कोई भी अंतर नहीं है। इस तरह परिपक्व हो गया है कि:--- सो-वह भाव पारब्रह्म तोहि -उ हैं-अंश भाव पारब्रह्म की अंश, मोहि -अं उ, वह का संक्षेप है और अं, अंश का संक्षेप है। सो " सोहम "सिद्धांत की स्थापना के साथ ही साथ ओम की स्थापना भी सिद्ध हो गई है और सोहम ओम से सृष्टि के सृजन का संकल्प भी दृढ़ हो गया है। इस की परिपक्वता गुरु नानक देव जी के निम्नलिखित लिखे गए शब्द से हो जाती है। उअंकारी ब्रह्मा उतपत्ति।। उअंकारी कीआ जिनी चिति।। सो अर्थात वो, परमात्मा ही सृष्टि का सृजनहार है। सो ओम इक ओम ही है। इस से ये भी दृढ़ हो जाता हैं कि सोहम के बीच ओम व्यापक है। सो गुरु रविदास जी ने शलोक के बीच निरूपित किये गए अपने सोहम के सिद्धांत की अपनी वाणी के बीच भी सचेत हो कर बड़ी दृढ़ता और परिपक्वता के साथ प्रौढ़ता की है। बस यही नहीं, गुरु रविदास जी ने सोहम सिद्धांत की बुनियाद, पारब्रह्म एक ही है, उस की प्रमुख शक्तियां देहधारी भगवानों का खंडन आद की बारीकी के साथ खोल कर दिखाया है। शलोक के बीच आए शब्द हरि की अपनी वाणी के बीच दिखा कर वे स्पष्ट करते हैं कि हरि पारब्रह्म केवल और केवल एक हो। ब्रह्मा विष्णु महेश तीनों उस के भगतों के बराबर नहीं हैं। इसी विचार ने भविष्य में इक ओम के सिद्धांतक रूप को प्रकट किया है। सन्त हीरा दास जी गांव चक हकीमा (फगवाड़ा) लिखते हैं:--- "हे सिख सर्व वर्ण जो अंछर हैं, उन में सोहम दोनों अछर व्यापक हैं सो के उच्चारण से ओम होता है हं के उच्चारण से ओम होता हैं, ऐसे ही सोहम से मैं ओम व्यापक है" सो "सोहम" के बीच ओम व्यापक है। सोहम के इस गुप्त रूप ओम को प्रकट कर के विश्व व्यापी विचारधारा के आधार ओम को इक ओंकार का स्वरूप दिया है। इस तरह सोहम ओम और इक़ ओंकार तीनों शब्दों के अर्थों के बीच कोई अंतर नहीं है। हरि जपत तेऊ जन वाले शब्द के बीच गुरु रविदास जी ने सोहम ओम की और व्यापक अर्थों के बीच खोल कर व्याख्या की है। इस व्याख्या के साथ सोहम ओम का स्वरूप बदल कर इक ओंकार बन गया है। सो उन्होंने सोहम को एक ओंकार का स्वरूप देकर विश्व व्यापी विचारधारा को परिपक्वता और दृढ़ता प्रदान की है। क्रमशः। रामसिंह आदवंशी। अध्यक्ष। विश्व अधर्म मंडल। मई 11,2021।

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