सिंधुघाटी सभ्यता और आदधर्म की स्थापना।।
।सिंधुघाटी सभ्यता और आदधर्म की स्थापना।।
भले ही आद जमा मी दो वाक्यांशों को जोड़ कर आदमी शब्द की उतपत्ति की गई है, मगर की तो आद के ही बेटों ने की है। जब आद शब्द से ही विश्व की शुरुआत हुई है, तो आदधर्म भी इसी शब्द को आधार बना कर तैयार किया गया है, क्योंकि जिस प्रकार यूरेशियन आर्य घुसपैठियों ने अपने नायक ब्रह्मा के नाम पर ब्रह्म, ब्रह्मण्ड, ब्रह्मपुत्र, ब्रह्मज्ञान, ब्रह्मगिरि, ब्राह्मण, ब्रह्मगुप्त, ब्रह्मानंद, ब्रह्मर्षि, ब्रह्मपुत्री, ब्रह्मचर्य, ब्रह्मचारी, ब्रह्मपुखर, वराह ना जाने कितने शब्द आद शब्द की नकल कर के ही ढूंढे और निर्मित किए हुए हैं मगर जब से भारत को छलबल से इन्हीं आर्यों ने मूलनिवासियों से छीना है, तब से ही ये दिनरात आदधर्म को मिटाने का कार्य करते आ रहे है। मूलनिवासियों के महापुरुषों का नाम मिटाने का काम आज भी जारी है, जिसे रोकने का कार्य केवल आदधर्म के प्रचार प्रसार से ही किया जा सकता है।
गुरु रविदास जी महाराज ने, पुनः मूलनिवासियों को नया रास्ता बताते हुए कहा है कि:---
आद से प्रगट भयो जा को ना कोऊ अंत
आदधर्म रविदास का जाने बिरला सन्त।
इन दो पंक्तियों से साफ साफ ज्ञात हो ही जाता है कि, विश्व में एक ही आदधर्म था, जिसे पुनः गुरु रविदास जी महाराज ने सुरजीत किया है। प्रोफेसर लालसिंह जी भी अपनी पुस्तक "गुरु रविदास जी दा धर्म सिंधुघाटी दे आदिवासी आछूतां दा धर्म" के पृष्ठ संख्या 13 पर लिखते हैं कि, हजारों सालों से ही सदी दर सदी, पीढ़ी दर पीढ़ी, चली आ रही आदिवासी अछूत चमाराँ दी इह कुल /वंश ही गुरु रविदास जी दी वंश/कुल है। इस आदधर्म दी वंश/कुल बिच ही उन्हा दा जन्म होया है। गुरु रविदास जी अछूत चमार हैं और उन का पेशा, व्यवसाय हर सबूत सिंधुघाटी "मोहन जोदड़ो हड़प्पा" के आदधर्म, सभ्यता राजाओं और महाराजाओं का ही सबूत है।
गुरु रविदास जी महाराज की स्पष्टवादिता और शब्दों के प्रयोग की निरंकुशता से साफ साफ जाहिर होता है कि, वे किसी भी यूरेशियन नेता ज्योतिर्ज्ञानी महाज्ञानी को मान्यता नही देते हैं। वे केवल भारत के मूलनिवासियों को एक सूत्र में पिरोते हुए केवल एक अर्बाचीन धर्म "आदधर्म" में इकठ्ठा करते हुए इंसानीयता का सत्संग देते हैं। भारतवर्ष के आदिवासी, मूलनिवासियों को चमार जाति की महत्ता समझाते हुए निःसंकोच फरमाते हैं कि, चमार ही मेरा वंश है, जिस का सीधा सीधा संबंध केवल सिंधुघाटी की समृद्ध सभ्यता और संस्कृति से ही है। यही वह सभ्यता हुई है, जिस का यश समूचे मंडलों, उपमंडलों, ग्रहों, नक्षत्रों, ज्योतिरमण्डलों में व्याप्त था और आज भी है, यही विचारधारा है जिस में सरलता, समरसता, मानवता, सहिष्णुता, प्रेम-प्यार और सदभावना छुपी हुई है, इसीलिए प्रोफेसर लाल सिंह जी, इसी पुस्तक के पृष्ठ संख्या 18 के उपर लिखते हैं कि गुरु रविदास जी महाराज ने, भारत के मूलनिवासी आदिवासी शूद्रों, अछूतों और समूची मॉनवता को आपस में प्यार करने वाला धर्म "आदधर्म" सुरजीत किया है, वे लिखते हैं कि, क्या आर्य ब्राह्मणों का हिंदू धर्म गुरु रविदास जी का धर्म है? क्या मूल आदिवासियों को आर्य ब्राह्मणों ने शूद्र और अछूत बना कर अपने आर्य ब्राह्मणों के हिंदू धर्म का अंग बनाया है? या इसे तृस्कृत कर के घृणात्मक बनाने का ऐलान किया हुआ है? हम जान चुके हैं कि, आर्य ब्राह्मणों ने, अपने घिनौने, पक्षपाती मानवता विरोधी गैर कुदरती तौर तरीकों के साथ गुरु रविदास जी की कुल/वंश के सिंधुघाटी सभ्यता के आदिवासियों को शूद्र अछूत बनाया है। इस के साथ ही साथ ये भी सावित हो गया है कि, गुरु रविदास जी के वंश/कुल वाले आदिवासियों का धर्म "आदधर्म" है। अब हम अध्ययन करते हैं कि, आर्य हिंदुओं के धर्म ग्रन्थों वेद शास्त्रों के अनुसार शूद्र अछूत कौन हैं?
पांच हजार साल से ही विदेशी आर्य ब्राह्मणों ने, अर्बाचीन इतिहास को नष्ट कर के हिन्दू धर्म को बनाया, जिस ने भारत के मूलनिवासियों को छः हजार जातियों उपजातियों में बांट कर जातपात छुआछूत, शूद्र और अछूत नामक कोहड़ तैयार किया है। उन के तीन ही वर्ण थे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वाणियाँ। चौथा वर्ण भारत के वास्तविक मूलनिवासियों के गुलाम बनाए जाने पर ही शूद्र बनाया है, जिस ने सब से पहले आदिकालीन आद पुरुष के वंशजों का इतिहास मिटाया हुआ है, मन्दिरों पूजाघरों पर कब्जा करने के बाद ही सर्वशक्तिमान सम्राट चानो जी महाराज और उन की साम्राज्ञी लोना उर्फ कामाख्या देवी के पूजा घर गिराए और अपने कल्पित देवी-देवता उन के ही पूजाघरों में स्थापित किये है।
बुद्ध, हिन्दू, क्रिश्चियन, पारसी, यहूदी आदि सभी आदधर्म की स्थापना के बाद ही जन्में हैं, जिस का एहसास हमें सिंधुघाटी की सभ्यता से ज्ञात हो रहा है, क्योंकि पांच हजार वर्ष पूर्व इन धर्मों का कोई भी अता पता सिंधुघाटी सभ्यता में नहीं मिलता है, जिससे सावित होता है कि, धरती पर केवल एक ही धर्म था और वह है आदधर्म।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
मई 04, 2021।
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