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Showing posts from November, 2020

गुरु रविदास जी महाराज का मुक्ति सन्देश मन्त्र।।

।।गुरु रविदास जी महाराज का मुक्ति सन्देश मन्त्र।। गुरु रविदास जी महाराज ने, विश्व को केवल नाम मात्र के उपदेश ही नही दिए हैं, धोती तिलक, जप माला केस बढ़ा कर, गेरुए वस्त्र पहन कर, कमंडल हाथ मेँ ले कर, भ्रमण नहीं किया। घर घर अलख नहीं जगाया, खप्पर ले कर भीख नहीं मांगी, हाथ की रेखाएं देख कर लोगों को सच झूठ कह कर, नहीं लूटा, उलटी सीधी भविष्यवाणी कर के सँगत का धन नहीं ठगा। उन्होंने जगह जगह जा कर, अपना आश्रय स्थल बना कर, एक ही जगह पर महीनों रुक कर, सँगत को क्रान्ति के पथ पर चल कर, राजनैतिक क्रान्ति का आह्वान किया, धार्मिक क्रान्ति के लिए, राम नाम का सिमरन सिखाया, पांच हजार वर्षों की भटकी हुई, भक्ति भावना को जिंदा किया, ब्राह्मणों के आतंकवाद को नेशतनाबूद किया, जनता को आडंबरों और ढोंगों से अवगत कराया, भक्ति करना सब का जन्मसिद्ध अधिकार बताया, जो जो काँटे रास्ते रोके हुए थे, उन्हें काट कर, रास्ता साफ कर के आगे बढ़ना सिखाया, धर्म के रास्ते में आने वाली अड़चनों को हटाने के लिए, धर्म के लिये मर मिटने का संदेश दिया, कॉयर, भीरू बनने से बेहतर है, कि धर्म की रक्षा करते, करते शहीद हो जाएं। जीवन को श्रेष्ठ बन...

गुरु रविदास जी महाराज और तपस्वी का तप।।

।।गुरु रविदास जी महाराज और तपस्वी का तप।। गुरु रविदास जी महाराज ने, स्वयं साधारण भेष में, जीवन व्यतीत करते हुए, साधारण वाणी में, भूली भटकी जनता को जो ज्ञान दिया है, वैसा किसी भी साध ने नहीं दिया। गुरु जी के साथ हिंदुओं और मुसलमानों ने जो व्यवहार किया था जिस ढंग से उन्हें परेशान किया, उन के सामने जिस जिस प्रकार की मुशीबतों को खड़ा किया, जो जो परीक्षाएं ली, जो जो उनके ऊपर मुकद्दमें कर के राजाओं और बादशाहों के पास पेशियां डलबाईं, उन से वे कभी भी विचलित नहीं हुए थे और ना ही विराट रूप धारण किया था, ना ही उन से आहत होकर, किसी को बददुआ तक दी। अगर कहीं कोई भी ब्राह्मण साध होता तो, ऋषि दुर्वासा की तरह जगह जगह अभिशाप ही देते फिरते। गुरु रविदास जी ने अपनी वाणी से ही ऐसे पाखंडियों, ढोंगियों, छलियों, बहुरूपियों को नँगा कर के, उनकी सत्यता को जगजाहिर किया था, जिस का वर्णन स्वामी ईशरदास महाराज ने, गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 792-793 पर बड़े ही तीक्ष्ण शब्दों में किया है:-----                  ।।चौपाई।। करत तपस्या जंगल जा के। घर बार छोड वन नकेवल बैठ क...

गुरु रविदास जी महाराज और तीव्र वैरागी।।

।।गुरु रविदास जी महाराज और तीव्र वैरागी।। गुरु रविदास जी महाराज, घर बार त्याग कर, सिर में झटा जूट रख कर, राख डाल कर, दर दर, भटकने वाले लोगों को वैरागी नहीं मानते हैं। गुरु जी उसी को वैरागी मानते हैं, जिस ने, सांसारिक विरह को त्याग कर, केवल एक आद पुरूष ही से अनुराग किया हो। सांसारिक माया और मोह के जंजाल से मुक्ति प्राप्त कर ली हो, अपना पराया त्याग दिया हो, मैं और मेरी की त्रिषणा खत्म कर ली हो, सुख-दुख सम अर्थात बराबर कर लिया  हो, जिस के मन में ये भाव जन्म ले चुके हों, वही सच्चा सुच्चा वैरागी होता है। अकसर ये गुण कहीं भी, किसी भी व्यक्ति में देखने को नहीं मिलता है, केवल पाखण्ड, ढोंग और षड़यंत्र रच कर, वैरागियों का स्वांग मात्र रच कर, जनता को मूर्ख बनाने का ही, काम किया जाता है। ये ढोंगी लोग तो वैरागियों का ही नाटक करते हैं, विश्व में कोई बिरला ही व्यक्ति सत्य के मार्ग पर, चलने वाला वैरागी मिलता है। इसीलिए स्वामी ईशरदास जी ने, गुरु रविदास जी महाराज के भावों को, गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 793-794 पर, बड़े ही वैज्ञानिक ढंग से अंकित किया है कि:----         ...

गुरु रविदास जी महाराज और आठ अबगुण।।

।।गुरु रविदास जी महाराज और आठ अबगुण।। गुरु रविदास जी महाराज ने मानव कल्याण के लिए, वहुमुखी वहुआयामी लेखनी चलाई हुई है। जब मानव जाति का आविर्भाव हुआ था, तब धरती पर, कोई भी बुराई नहीं थी। सभी बुराईयां मनुष्यों के साथ जन्मी थी मगर आदमी जन्म के बाद जब समाज में जीवन बसर करने लगा था, तब काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार के वश में पड़ कर, इन पांचों चन्डालों के चक्रव्यूह में फंस कर, अमानवीय कार्य करने लग पड़ा। गुरु रविदास जी महाराज ने, इन्हीं बुराइयों को अबगुण कहा है। ये भी आठ प्रकार के घोषित किये गए हैं, जो बाद में एक आदर्श जीवन के लिए, घातक और अभिशाप बन गए है, इंसान को हैवान इन्हीं आठ अबगुणों ने बना दिया है। नर हो या नारी हो, जिस किसी के भीतर ये आठ अबगुण समा जाते हैं, वे सभी नर और नारी ना रह कर, राक्षस राक्षसी बन जाते हैं, जिन के बारे में गुरु रविदास जी महाराज के भावों को, स्वामी ईशरदास जी महाराज, गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 628-629 पर लिखते हैं:----                     ।।शलोक।। रूधर मदीन नर बिंद ते भियो पलद की गंठ। खाए जो कर साजड़े रविदास...

गुरु रविदास जी महाराज और विश्वासघाती लोग।।

।।गुरु रविदास जी महाराज और विश्वासघाती लोग।। गुरु रविदास जी, ऐसे अवतारी सत्पुरुष हुए हैं, जिन्होंने कभी भी, ये नहीं देखा कि कौन हमारा साथ दे रहा है? कौन नहीं दे रहा है? वे अन्याय, अनाचार, अत्याचार के खिलाफ जंग लड़ते रहे। उन्होंनें कभी भी पीछे मुड़ कर, ये नहीं देखा कि, किस ने उन की टांगे खींचीं? किस किस ने उन के साथ छल किया? किस किसने कपट किया? किस ने उन्हें जान से मरवाने की कोशिश की? वे निरन्तर, अच्छे मार्ग पर चलते हुए अच्छे कर्म करते गए। कृतघ्नों की कृतघ्नता को भी अच्छी तरह जानते थे, वे जानते थे कि दुष्टात्मा कभी भी सुधरती नहीं हैं मगर जो सुधर जाते थे, उन्हें गुरु जी माफ भी कर देते थे, जो सुधर नहीं पाते थे, वे अपने पाप कर्मों के भार से ही प्राणों से हाथ धो बैठते थे। गुरु रविदास जी महाराज ने, आजीवन जनकल्याण के लिए क्रांतिकारी संघर्ष और आंदोलन ही किये मगर कुछ एक धोखेबाज लोगों द्वारा छलकपट करने के कारण, उन्हें भी कई परेशानियों का सामना करना पड़ा था, जिस अनुभव के कारण, उन्होंने अपने मन के भावों को स्वामी ईशरदास जी के शब्दों में, गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 656-657 पर वर्णन किया है:...

गुरु रविदास महाराज द्वारा ढोंगियों की पोल खोल।।

।।गुरु रविदास महाराज द्वारा ढोंगियों की पोल खोल।। गुरु रविदास जी ने, ढोंग रच कर, पेट भरने वाले ढोंग रचने वाले साधु, सन्तों और भिखारियों के ढोंगों की खूब पोल खोली हुई है। कुछ निठठले, कामचोरों ने, आडंबरों, पाखण्डों, की खोज कर के, परजीवी बन कर, अपना और अपने परिवार का पेट भरने का धंधा शुरू किया हुआ है। कुछ लोगों ने, काले, पीले, नीले, हरे और गेरुए वस्त्र पहन कर, लोगों को भरमाया हुआ है। कोई सिर मुंडा कर, कोई वालों की जटाएं बढ़ा कर, कोई आधे मुंह के वाल कटवा कर, कोई आधी दाढ़ी कटवा कर, कोई दाढ़ी बढ़ा कर रूप कुरूप बना कर सँगत को ठगने का काम करता आ रहा है। ऐसे इंसान से धूर्त पाखण्डी बनने वालों को, गुरु रविदास जी महाराज ने, बुरी तरह से आड़े हाथों लिया है और उन की पोल खोली हुई है। स्वामी ईशरदास जी महाराज के शब्दों में गुरु जी, गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 787-788 के ऊपर फरमाते हैं कि:-----                     ।।शब्द सीरी।। करनी का ढंग निराला साधो, करनी का ढंग निराला। कोई वनवासी नगन फरासी कोई परने डाल दुशाला। कोई भेखधारी जटा रखवारी कोई शंख बजाई घड़...

गुरु रविदास जी महाराज के अनुसार धर्मी कौन?

।।गुरु रविदास जी महाराज के अनुसार धर्मी कौन।। गुरु रविदास जी ने धर्मों को त्याग कर, धर्म का पालन किया है और सँगत को भी ऐसा ही करने के लिए उपदेश दिए हैं। आद का बेटा जुगाद हुआ है, जिससे स्पष्ट होता है, कि आदिकाल से ही आदधर्म चलता आ रहा है, गुरु रविदास जी महाराज ने इसी आदधर्म को मानवीय धर्म कहा है। संसार में, आदधर्म के उपरांत कई मजहब (उपधर्म) जन्म ले चुके हैं, जिन्होंने मॉनवता को खण्ड खण्ड ही किया है, एक दूसरे के जानी ही नहीं कट्टर दुश्मन बना कर, दुश्मनी को ही जन्म दिया है। धर्म तो, इंसानियत, भाईचारा, प्यार, प्रेम, सामंजस्य और समरसता ही सिखाता है, धर्म कभी भी किसी की हत्या करने की अनुमति नहीं देता, किसी को भी, किसी के शोषण की अनुमति नहीं देता और ना ही किसी को, किसी की आत्मा को दुख देने की वकालत ही करता है, मगर जितने उपधर्म हैं, वे आपस में धर्मों के नाम पर खून की नदियाँ बहाते आ रहे है और हैवानियत का नँगा नाच करते जा रहे, जिस का साक्षात प्रमाण, अजरबेजान और आर्मीनिया का युद्ध, ईसाई धर्म और इस्लाम धर्म का युद्ध बना हुआ है। गुरु रविदास जी महाराज ने, आदधर्म और आदधर्मी के बारे में, स्वामी ईशरदास...

गुरु रविदास जी महाराज और साधु संतों के कष्ट।।

।।गुरु रविदास जी महाराज और साधु-संतों के कष्ट।। गुरु रविदास जी ने आजीवन कष्टों को गले लगा कर रखा मगर मूर्खों और दुर्जनों को होश नहीं आई कि, हम नीच हरकतें कर के अपने ही पांवों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। दुर्जन कभी नहीं सोचते कि जो नीच कर्म मैं कर रहा हूँ, जो छलकपट मैं कर रहा हूँ, जो कत्लोगारद मैं कर कर रहा हूँ, जो पशुता मैं कर रहा हूँ, एक ना एक दिन उस का परिणाम भी मुझे भुगतना पड़ेगा। आदिकाल से ही ये, अच्छाई और बुराई नामक दो ध्रुव साथ साथ चलते आए हैं, मगर बुरा कर्म करने वाले जहान से चलती बार रोते, चिल्लाते हुए, तड़फ तड़फ कर, वर्षों चारपाई पर पड़े रह कर, सड़ सड़, कर मरते देखे गए हैं मगर जिन्होंने, किसी की आत्मा को कष्ट नहीं पहुँचाया औऱ भगवान की रजा में रह कर ही, जीवन जिया वे ऐसे दुख कभी प्राप्त नही करते है। गुरु रविदास जी ने ऐसे ही पापियों के कल्याण के लिए ही अपना सारा जीवन दुखों में डाले रखा था। स्वामी ईशरदास जी महाराज गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 631-632 पर सन्तों और गुरुओं को दिए गये कष्टों के बारे में फरमाते हैं कि:----           ...

गुरु रविदास जी महाराज ही "मीराँबाई" के रक्षक।।

।। गुरु रविदास जी महाराज ही "मीराँबाई" के रक्षक।। गुरु रविदास जी ने अपनी शिष्या मीरांबाई के सिर पर अपना हाथ रख कर, उसे तनिक भी आंच आने नहीं दी थी। जब भी मीराँ को मारने की योजनाएं बनाई गईं, वे सारी की सारी धरी रह गईं। गुरु जी ने उसे शहीद नहीं होने दिया। मौत के मुंह से वापस आने के कारण, मीराँबाई समझ गई कि, गुरु रविदास जी के वरदहस्त से ही, उसे कोई आंच नहीं आती है। उन से बड़ा विश्व में कोई भी शक्ति संपन्न गुरु नहीं है। दुनियाँ को स्वार्थी और निर्मोही समझ कर, मीराँबाई जी सन्यासिन बन गई। मीरांबाई की मनःस्थिति का, स्वामी ईशरदास जी महाराज, गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या, 597-598 पर वर्णन करते हैं:-----                ।।शब्द देव गांधारी।। राम नाम गुरु जपदे उन्हां भै ना तेज कटारिआं। जहर पलाऐ चाहे अगनी सताऐ सिर पर फेरदे आरिआं। परवतां तों साटन, बन्द बन्द काटन खोपड़िआँ सिर तों उतारिआँ। खलड़ी लहाऐ चाहे सूली ते चढ़ाए, गिर पये शिखरों चढ़ कर अटारिआँ। ईशरदास कहे जो राम के पिआरे सागर तों लंघे लाके तारिआँ।। स्वामी ईशरदास जी महाराज फरमाते हैं कि, जो गुरु रविदास जी क...

गुरु रविदास जी ने मीराँ को कमली दीवानी बना दिया था।

।।गुरु रविदास जी ने मीराँ को कमली दीवानी बना दिया था।। गुरु रविदास जी ने, मीरांबाई को अपनी शिष्या, इसीलिए बनाया था कि, वह उन के आध्यात्मिक विचारों को समझती थी। सात वर्ष की आयु में ही वह उन के गाए गए शब्दों को कंठस्थ कर के प्रातः काल ही सुरीली धुंन में  गाऐ जा रही थी। गुरु जी, मीराँबाई की बौद्धिक क्षमता और धैर्य को भी जान चुके थे, यही कारण था कि, मीराँ को गुरु जी ने अपनी शिष्या के रूप में अंगीकार कर लिया था। गुरु जी ने एक तीर से कई निशाने किए थे, एक तो मीराँबाई सत्य को पहचानने में कुशल थी, कुरीतियों से युद्ध करने के लिए तैयार थी, जातीय अहंकार और घमंड उसे छू तक नहीं पाए थे। उस में नारी जाति को भी सँवल देने की हिम्मत, साहस और धैर्य भी था। मीराँ में बुराईयों से टक्कर लेने की भी शक्ति थी, जिस का प्रमाण मीरांबाई को पीने के लिए, विष का प्याला दिया गया, बन्द पिटारी में नाग भेजा गया, तलबारों से लैस मायके और सुसराल वालों ने, कत्ल करने का कुप्रयास किया था, मगर गुरु रविदास जी महाराज के आंचल के सुरक्षा कबच ने, उसे हाथ देकर बाल बांका होने नहीं दिया था। मीरांबाई अपने सुसराल का हाल, स्वामी ईशरदास ...

गुरु रविदास जी की शिष्या "मीराँबाई" का श्रृंगार।

।।गुरु रविदास जी की शिष्या "मीरांबाई" का श्रृंगार।। गुरु रविदास महाराज ने अपनी प्रिय वीरांगना शिष्या, मीरांबाई के जहर को अमृत बना कर जो इतिहास रचा है, वह विश्व में किसी भी अवतार ने नहीं रचा है। जब मीरांबाई गटागट जहर पी कर, अपनी परीक्षा में सफल हो गई, तो सारा मनुबाद, मुंह की खा कर, मिट्टी में मिल गया। राज परिवार का जातीय घमंड भी बुरी तरह से चकनाचूर हो गया, जिन्हें चमार कर कह कह कर नीच कहा जाता था, वे मनुवादियों के तेती करोड़ देवी देवताओं को धूल धूलधूरित कर गए। मीराँ भी परीक्षा में सफल हो कर, अजर अमर हो गई। मीरांबाई के लिए गुरु रविदास जी, प्रभु से भी बढ़ कर, आदर्श गुरु बन गए। मीरांबाई औरतों को आभूषण के बारे में, समझाती है कि, औरतों को किस प्रकार के आभूषण पहनने चाहिए? किस प्रकार का श्रृंगार करना चाहिए? जिस का वर्णन स्वामी ईशरदास जी महाराज, गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 595-596 पर पर लिखते इस प्रकार करते हैं:---            ।।शब्द मालकौंस।। गहिने सचे गुरां वाले पावों जी। चोंक चतराई पावों। चुप दे तां फुल लावो। जुगनी जगत गुरां दी कमावो। टिका टेक गुरां दी करो...

गुरु रविदास जी की कृपा से "मीराँबाई"का जहर अमृत बन गया।।

।।गुरु रविदास जी की कृपा से "मीराँबाई" का जहर अमृत बन गया।। गुरु रविदास जी की वीरांगना शिष्या, ने परिवार के खूनी ही नहीं निर्मोही लोगों के सामने वहुत विलाप किये, मीराँ ने, सब के आगे हाथ जोड़ कर अनुनय विनय कर के भक्ति की शक्ति को बताया, गुरु रविदास जी को सर्वोच्च गुरु सिद्ध किया, गुरु जी को सच्ची मानवता का मसीहा बताया, गुरु जी को पानी के ऊपर पत्थर तारने वाला अवतार बताया, दुःखियों के दुखों को दूर करने वाला पैगंबर बताया, कोहड़ियों के कोहड़ दूर करने वाला भगवान बताया मगर, जात पात के अभिमानियों ने एक नहीं सुनी, उन के पत्थर दिलों पर किसी भी तर्क का कोई भी असर नहीं हुआ। वह बार बार फरियाद करती रही कि, मुझे गुरु रविदास जी के दर्शनों से मत रोको, मगर मनुस्मृतियों ने राजपूतों और वाणियों में भी छुआ छूत का जहर घोल रखा है, जिस के कारण वे जातीय अभिमान के सागर में डूबकर, वाप, बेटी भाई और बहन के पवित्र रिश्तों को भी भुला कर बिलकुल खत्म कर बैठे। मीरांबाई भी जातपात, छुआछूत, पुरूष स्त्री की, ब्राह्मणों द्वारा निर्मित कच्ची दीवारों को ध्वस्त करती हुई, जहर का भरा प्याला गटागट पी गई। स्वामी ईशरदास जी मह...

गुरु रविदास जी की शिष्या"मीराँबाई"के भाई की मूढ़ता।

।। गुरु रविदास की शिष्या "मीराँ बाई" के भाई की मूढ़ता।। गुरु रविदास जी महाराज की वीरांगना शिष्या मीरांबाई, जब अपने भाई के तीरों, तलबारों के आतंक से भयभीत नहीं हुई, आदमखोर कुत्तों से नुचवा कर, धरती के बीच गाड़ देने के भय से भी तनिक नहीं डगमगाई, मीराँबाई का गुरु रविदास जी के ऊपर दृढ़ आत्मविश्वासः उसे, अत्यचारियों से मुकाबला करने के लिए विवश करता जा रहा था, वह ब्राह्मणों के, काले कानूनों से युद्ध करती जा रही थी, वह राजपूतों को भी, मनुस्मृतियों के धर्मान्ध कानूनों को तोड़ने के लिए विवश करती जा रही थी, वह अपना क्रांतिकारी विराट रूप राजपूतों को दिखा कर, इंसानियत को समझने के लिए विवश करती जा रही थी, जो मीराँ के भाई के मानस सरोवर में उतरता भी जा रहा था। जिसे समझ कर पश्चाताप करता हुआ मीराँ का भाई, गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ के रचयिता स्वामी ईशरदास महाराज के शब्दों में, पृष्ठ 573-574 पर मीराँ को कहता है:---                  ।।शब्द कलँगड़ा।। मीराँ उड़क नूँ मैं दुख के तंवर उठाई ऐ। सभन रहे समझाई। तूँ ना खातर किसे लिआई। हथ जोड़ रहे भैंण भाई। तैं ना कदर पाई ऐ। साडा होर...

गुरु रविदास जी की शिष्या "मीराँ" ने जहर पी लिया।।

।।गुरु रविदास जी की शिष्या "मीराँ" ने जहर पी लिया।। गुरु रविदास जी महाराज की परीक्षा चल रही थी, मीरांबाई परीक्षा दे रही थी, भाई कातिल बन कर, अपने जातीय अहंकार को बता कर मीराँ की ब्लैकमेलिंग करताँम जा रहा था, गुरु जी अपने तीसरे नेत्र से, सारे दृष्यों को देख रहे थे। जब मीरांबाई अपने गुरु जी से बेमुख नहीं हुई और पिता के सामने, भाई को अति कड़े शब्दों में कहती है कि, भाई मैं सच कहती हूँ कि, मैं अपने गुरु को नहीं त्यागूंगी, मैं तेरा विष का प्याला उठा रही हूँ जिस का चित्रण, स्वामी ईशरदास जी महाराज गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 575- 576 पर करते हैं:---             ।। शब्द पहाड़ी डूगर।। गुर ते बेमुख होंणा ना, मैं सच सच कहिनियाँ। भर दे पिआला जहर दा, पिता मैं चक चक पीनिआँ। अलीक नाते अलीक मापे अलीक गन संसार जो। देश बेगाने रहीऐ ऐथे जाईऐ सच बजार जो। की लैंणा ऐथे रहि के दुखड़े हन अनतोल। बोल कुबोल तुहाडे मंदे बच बच सहिनिआँ। जे देवें तू जहर पिता जी, लख लख सुकर मनावां मैं। मरने ते परिथम मरना तांहि दर्श गुरु का पावां मैं। इस पिआले बिच बैठा सतगुर सच दा सौदा तोले। जिस दी म...

गुरु रविदास जी की शिष्या"मीराँबाई"के भाई की मूढ़ता।

।। गुरु रविदास की शिष्या "मीराँ बाई" के भाई की मूढ़ता।। गुरु रविदास जी महाराज की वीरांगना शिष्या मीरांबाई, जब अपने भाई के तीरों, तलबारों के आतंक से भयभीत नहीं हुई, आदमखोर कुत्तों से नुचवा कर, धरती के बीच गाड़ देने के भय से भी तनिक नहीं डगमगाई, मीराँबाई का गुरु रविदास जी के ऊपर दृढ़ आत्मविश्वासः उसे, अत्यचारियों से मुकाबला करने के लिए विवश करता जा रहा था, वह ब्राह्मणों के, काले कानूनों से युद्ध करती जा रही थी, वह राजपूतों को भी, मनुस्मृतियों के धर्मान्ध कानूनों को तोड़ने के लिए विवश करती जा रही थी, वह अपना क्रांतिकारी विराट रूप राजपूतों को दिखा कर, इंसानियत को समझने के लिए विवश करती जा रही थी, जो मीराँ के भाई के मानस सरोवर में उतरता भी जा रहा था। जिसे समझ कर पश्चाताप करता हुआ मीराँ का भाई, गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ के रचयिता स्वामी ईशरदास महाराज के शब्दों में, पृष्ठ 573-574 पर मीराँ को कहता है:---                  ।।शब्द कलँगड़ा।। मीराँ उड़क नूँ मैं दुख के तंवर उठाई ऐ। सभन रहे समझाई। तूँ ना खातर किसे लिआई। हथ जोड़ रहे भैंण भाई। तैं ना कदर पाई ऐ। साडा होर...