गुरु रविदास जी महाराज और आठ अबगुण।।
।।गुरु रविदास जी महाराज और आठ अबगुण।।
गुरु रविदास जी महाराज ने मानव कल्याण के लिए, वहुमुखी वहुआयामी लेखनी चलाई हुई है। जब मानव जाति का आविर्भाव हुआ था, तब धरती पर, कोई भी बुराई नहीं थी। सभी बुराईयां मनुष्यों के साथ जन्मी थी मगर आदमी जन्म के बाद जब समाज में जीवन बसर करने लगा था, तब काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार के वश में पड़ कर, इन पांचों चन्डालों के चक्रव्यूह में फंस कर, अमानवीय कार्य करने लग पड़ा। गुरु रविदास जी महाराज ने, इन्हीं बुराइयों को अबगुण कहा है। ये भी आठ प्रकार के घोषित किये गए हैं, जो बाद में एक आदर्श जीवन के लिए, घातक और अभिशाप बन गए है, इंसान को हैवान इन्हीं आठ अबगुणों ने बना दिया है। नर हो या नारी हो, जिस किसी के भीतर ये आठ अबगुण समा जाते हैं, वे सभी नर और नारी ना रह कर, राक्षस राक्षसी बन जाते हैं, जिन के बारे में गुरु रविदास जी महाराज के भावों को, स्वामी ईशरदास जी महाराज, गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 628-629 पर लिखते हैं:----
।।शलोक।।
रूधर मदीन नर बिंद ते भियो पलद की गंठ।
खाए जो कर साजड़े रविदास नरक सो सँठ।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, नर अर्थात पुरूष के वीर्य, खून, हड्डियों और मांस की शरीर रूपी गांठ बनी हुई है, जिस पांच तत्वों से बनी हुई गांठ में वह जो कुछ खा पी कर, उसे सजा संवार कर रखता है, गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, वह अबगुणों को धारण करने के कारण, नरक में रहने वाला केवल मूर्ख ही कहलाता है।
।।शब्द देव गांधारी।।
स्वपच जोउन पड़ा आठ अबगुण संचरे जोई नरा। तिह नर गीध खर बिआल सम मानस नाहे तोई नरा। अबगुण छाड़त राम लिव लागत देव अवतारों भोई नरा। सुरत शब्द की करहि कमाई मोखस के घर ओहि नरा। रविदास रसना जिस राम नाम का आन रस चकोई नरा।
गुरु रविदास जी नर (मर्द) के बारे में फरमाते है कि, स्वपच जूनी में जो पड़ जाता है वही पुरुष आठ अबगुणों को संग्रह करता है। वह आदमी भी गिद्ध, बन्दर और बिल्ला, आदि जानवरों के समान होता है और जो अबगुणों को छोड़ कर आदपुरुष से लग्न लगा लेते हैं, वे देवता और अबतार कहलाते हैं। जो शब्द और सुरत की कमाई करते हैं, वे पुरूष ही मोक्ष प्राप्त करते हैं। गुरु रविदास की फरमाते हैं कि, जिस पुरूष की जिह्वा पर राम नाम रहता है, उसे दूसरा कोई भी रस नहीं भाता है अर्थात उसे किसी अन्य रस का स्वाद अच्छा नही लगता है।
।।शब्द जिला।।
गुणा अबगुणा वाली नारी, कटारी पटारी ऐ तां हुन्दी ऐ। सुत लाल उपजा ऐ कलैह दुवारी हुन्दी ऐ। भूप मंत्री नूँ आखे चार पुरुष लिआवीं ऐह विचारी हुन्दी ऐ। शूरा डरदा शर्म बेशर्म लिआवो इस्त्री, चारों गुणा वाली हुन्दी ऐ। शूरवीर डरदी सरब निधतर कोप पुरुष बैह अंतर डरारी हुन्दी ऐ। गई सोहरड़े शर्म नींवें नैनन रही रिधिया में जा बेशर्म भारी हुन्दी ऐ। शुभ अशुभ दोहां में पूरन मनो नारी हुन्दी ऐ। रविदास मिले गुणवंतीया नेक सोई जे अउगुण छुटारी हुन्दी ऐ।
स्वामी ईशरदास जी महाराज, गुरु रविदास जी को समर्पित करते हुए, शब्द लिखते हैं कि, गुणों और अबगुणों की पिटारी नारी होती है, अर्थात अच्छे गुणों और ज्ञान वाली नारी तो परिवार के लिए, सौभाग्य की पिटारी होती है अर्थात अच्छे परिवार की समृद्धि का प्रतीक होती हैं, मगर बुरे गुणों वाली, व्याभिचारिणी नारी, अबगुणों की ही खान होती है, ऐसी नारी हीरे लालों जैसे पुत्रों को जन्म देकर भी, कलह पैदा करने वाली होती है। राजाओँ और मंत्रियों का शोषण करने के लिए, ठगने के लिए चार चार पुरुषों को चाहने वाली भी यही अबगुणों से भरी नारी होती है। डरता हुआ शूरवीर और बलशाली नर भी, शर्म बेशर्म नारी लाने के लिए कहता है, ऐसी व्याभिचारी नारी होती है। शूरवीर और सर्वगुण संपन्न नारी पुरुष के लिए, कई प्रकार के कोपों का भंडार होती हैं, पुरुष को डराने वाली भी होती है। जब सुसराल जाती तो नजरें कुछ समय के लिए, तो नीची रख कर, मगर बाद में बड़ी बेशर्म हो जाती है। नारी अच्छे और बुरे अर्थात शुभ अशुभ दोनों ही अवसरों पर, मानसिक रूप से पूर्ण होती है। गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, गुणवंती नारी ही नेक चाल चलन वाली होती है, जो सब अबगुणों को छोड़ कर उन से दूर रहती है।
रामसिंह आदवंशी।
गुरु रविदास सेवक।
नबंबर 12, 2020।
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