गुरु रविदास जी महाराज और तीव्र वैरागी।।
।।गुरु रविदास जी महाराज और तीव्र वैरागी।।
गुरु रविदास जी महाराज, घर बार त्याग कर, सिर में झटा जूट रख कर, राख डाल कर, दर दर, भटकने वाले लोगों को वैरागी नहीं मानते हैं। गुरु जी उसी को वैरागी मानते हैं, जिस ने, सांसारिक विरह को त्याग कर, केवल एक आद पुरूष ही से अनुराग किया हो। सांसारिक माया और मोह के जंजाल से मुक्ति प्राप्त कर ली हो, अपना पराया त्याग दिया हो, मैं और मेरी की त्रिषणा खत्म कर ली हो, सुख-दुख सम अर्थात बराबर कर लिया हो, जिस के मन में ये भाव जन्म ले चुके हों, वही सच्चा सुच्चा वैरागी होता है। अकसर ये गुण कहीं भी, किसी भी व्यक्ति में देखने को नहीं मिलता है, केवल पाखण्ड, ढोंग और षड़यंत्र रच कर, वैरागियों का स्वांग मात्र रच कर, जनता को मूर्ख बनाने का ही, काम किया जाता है। ये ढोंगी लोग तो वैरागियों का ही नाटक करते हैं, विश्व में कोई बिरला ही व्यक्ति सत्य के मार्ग पर, चलने वाला वैरागी मिलता है। इसीलिए स्वामी ईशरदास जी ने, गुरु रविदास जी महाराज के भावों को, गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 793-794 पर, बड़े ही वैज्ञानिक ढंग से अंकित किया है कि:----
।।दोहा।।
नाम वैरागी आखी है ऐ, विराग हिरदै विच नाई। कहे रविदास बैंघि चक फिरे वैरागी ना सदाई। लक्षण सुणो वैरागिआं शुभ कुशुभ कहाई। उत्तम वैरागी लक्षण रविदास आख सुणाई। अनक वैरागी नाम मात्र रामानंद बनावत। कहे रविदास उत्तम वैरागी सो ही है मध नाहिं आवत। भव पदार्थ राम नाम है, वैरागी भरपूर। पुत्र कलत्र माया, मोह, तज आदपुरुष का करे जाप। कहे रविदास वैरागी भया कोट कोट हत पाप। सुरत शब्द का भिआ वैरागी आन तजे अभ आस। कहे रविदास ऐसा वैरागी तिस घट हरि प्रगाश। राज भाग वसुधा हाटक ममता सभी तिआग। कहे रविदास तीव्र वैरागी राम नाम लिव लागा। विराग भिआ हरि मिलन का अवघट मारग साफ। कह रविदास अरध उरध डूंगर सिंध मुआफ़। जोई जगत की कल्पना सभ से भये उदास। कहे रविदास उदासी सोई सुरत शब्द गुर पास। जगत की भटकना छोड के गुर से करे प्रीत। कहे रविदास उदासी सोई गिआ जगत में जीत। जैसे अंभ पुरवन पत सपरस तिस नाऊ। कहे रविदास वैरागी जगत में विमल कहाऊ।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, हे बहरूपिये! तूँ ने अपना नाम तो वैरागी रख लिया है, मगर तेरे कपटी हिरदय में विराग तो रंच मात्र नहीं है। गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, हे ढोंगी! तूँ तो वैराग की बैंघी उठा कर तो चारों ओर घूमता फिरता है, जिस से तुझे कोई भी वैरागी नहीं पुकारता है। गुरु जी कहते हैं कि, हम आप को वैरागियों के लक्षण बताते हैं, ये लक्षण शुभ और अशुभ दोनों ही प्रकार के होते हैं। हम आप को श्रेष्ठ वैरागी के लक्षण कह कर सुना देते हैं। पंडित रामानंद जैसे लोग, नाम मात्र के ही अनेकों वैरागी बनाते हैं। गुरु रविदास जी कहते हैं कि, श्रेष्ठ वैरागी वही होते हैं जिन में अहंकार नहीं आता है। संसार में, राम नाम का सर्वश्रेष्ठ पदार्थ जिस के अन्दर है, वही परिपूर्ण वैरागी है। गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, जो लोग पुत्र, पत्नी, मोह और माया को त्याग कर, तपस्या करते हैं, वही वैरागी करोड़ों करोड़ों पापों का शमन करते हैं। जो सुरत शब्द में लीन रहंता है, वही सच्चा वैरागी होता है। गुरु रविदास जी कहते हैं कि, जो व्यक्ति सब प्रकार की आशाओं, तृष्णाओं को त्याग देता है, जिस किसी के घट अर्थात मन आत्मा में परम पिता परमेश्वर का प्रकाश होता है, वही वैरागी होता है। जो राजपाठ, धरती, शहर, बाजार, मोह और ममता को त्याग कर, राम नाम से लगन लगा लेता है, गुरु रविदास जी कहते हैं कि, वही तीव्र वैरागी होता है। जिस के मन में, भगवान से साक्षात्कार करने के लिए वैराग होता है, उस के लिए रास्ते, कुरास्ते सभी नगण्य ही होते हैं, गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, उस वैरागी के लिए ऊबड़ खाबड़ सब कुछ तुच्छ ही होते हैं अर्थात उसे कोई भी रास्ता कुरस्ता रोक नहीं सकता है। जितनी संसार की इच्छाएं होती हैं, उन से सच्चा वैरागी उदास रहंता है, गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, असली उदासी का मालिक वही होता है, जिस के पास सुरत, शब्द और गुरु का मेल होता है। सांसारिक आकर्षणों को त्याग कर, उन में भटकना छोड़ कर, जो गुरु से प्रेम करता है, उसी की उदासी मिटती है, वही विश्व में इच्छाओं और विजय हासिल करते हैं। जिस प्रकार कचालू के पत्ते के ऊपर पानी होता है, जो सूर्य के प्रकाश के स्पर्श से ही मोक्ष को पा लेता है, वैसा ही राम नाम है। गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, संसार में जिसे वास्तविक उदासी होती है, उस की ही उदासी स्वछ व पवित्र कहलाती है।
गुरु रविदास जी महाराज के अनुसार, वही लोग असली वैरागी होते हैं, जो सांसारिक आकर्षणों से भ्रमित नहीं होते है, सांसारिक मोह, माया के फंदों के बन्धनों से दूर रहते हैं, जिन के मन में केवल शब्द और सुरत के संयोग का, निरन्तर धारावाहिक प्रवाह चलता रहता है, वही वैरागी कहलाने के अधिकारी हैं, बाकी के सब ढोंगी, पाखण्डी, आडंबरबाज और धोखेवाज ही हैं, जिन से सभी को सावधान रहने की जरूरत है।
रामसिंह आदवंशी।
गुरु रविदास सेवक।
नबंबर 13, 2020।
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