गुरु रविदास जी महाराज और तपस्वी का तप।।
।।गुरु रविदास जी महाराज और तपस्वी का तप।।
गुरु रविदास जी महाराज ने, स्वयं साधारण भेष में, जीवन व्यतीत करते हुए, साधारण वाणी में, भूली भटकी जनता को जो ज्ञान दिया है, वैसा किसी भी साध ने नहीं दिया। गुरु जी के साथ हिंदुओं और मुसलमानों ने जो व्यवहार किया था जिस ढंग से उन्हें परेशान किया, उन के सामने जिस जिस प्रकार की मुशीबतों को खड़ा किया, जो जो परीक्षाएं ली, जो जो उनके ऊपर मुकद्दमें कर के राजाओं और बादशाहों के पास पेशियां डलबाईं, उन से वे कभी भी विचलित नहीं हुए थे और ना ही विराट रूप धारण किया था, ना ही उन से आहत होकर, किसी को बददुआ तक दी। अगर कहीं कोई भी ब्राह्मण साध होता तो, ऋषि दुर्वासा की तरह जगह जगह अभिशाप ही देते फिरते। गुरु रविदास जी ने अपनी वाणी से ही ऐसे पाखंडियों, ढोंगियों, छलियों, बहुरूपियों को नँगा कर के, उनकी सत्यता को जगजाहिर किया था, जिस का वर्णन स्वामी ईशरदास महाराज ने, गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 792-793 पर बड़े ही तीक्ष्ण शब्दों में किया है:-----
।।चौपाई।।
करत तपस्या जंगल जा के। घर बार छोड वन नकेवल बैठ के। ये तप कई किस्म का अखावे। मन निरमल लई जुगत वणावै। पंच अगन जल धार करवाई। तरवर नाल बन्ध सँगल लटकाई। काठी मेच कई मेख लगावन। कहे रविदास तिस उरध बठावन। अगनी जाले पानी गाले। कोट कोट ऐसे ऐसे करम कराले। घर बार तिआग गया वन माहें। ऐ मन सुद्ध बिंना, शब्द ना होवे। कोट कोट तप कर वन सोबे। निस दिन कर ले कमाई। रविदास विकार तज रह घर भाई। तूँ लख लख जतन करे ना मन माने। अंकुश गुर का शब्द चलाने। रविदास तपोवन तप करावे। सुरत शब्द बिन मोख ना पावे।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, तपस्वी व साध जंगल में तपस्या करने के लिए चले जाते हैं। अपने घर बार को असहाय अवस्था में छोड़ कर, नकेवल (एकांत) स्थान पर बैठ जाते हैं। ये तपस्या अनेकों प्रकार की करते आए है। मन को स्वच्छ, पवित्र करने के लिए, कई कई प्रकार की युक्तियां व तरीके बनाते हैं, कई प्रकार के आसन लगाते हैं। पांच प्रकार की अग्नि को शांत करने के लिए, जलधार की तरह, आत्मा में शांति पैदा करते हैं। शरीर को सँगलों से बॉन्ध लेते हैं और लटके रहते हैं। अपनी लंबाई के अनुसार, लकड़ी के तख्त बनवा कर, तन को कीलें गड़वा लेते हैं। गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, ये तपस्वी अपने शरीर को उलटा कर लेते हैं। कई तो आग में भी जल गए, कई तो उबलते हुए पानी में उबल गए, फिर करोड़ों, करोड़ों ने, कठोर तपस्या करने के लिए, ऐसे ऐसे सितम सहन कर लिए, जालिमों को, ऐसे ऐसे क्रूर कार्य करने दिये जिन्हें वे सहन करते रहे। घर बार, परिवार सब कुछ त्याग दिया और जंगल में जा बसे, मगर पांचों ही प्रकार के विकार व बुराईयाँ मन और शरीर में ही निवास करती रहीं, ये मन सोहम शब्द के बिना, कभी शुद्ध नहीं होता हैं। चाहे तपस्वी करोड़ों साधनाएं करने के लिए जंगलों में सोते रहे। गुरु रविदास जी समझाते हैं कि, दिन रात सोहम शब्द की कमाई कर लो, गुरु जी आडंबरों का खंडन करते हुए, तपस्वियों और साधों को समझाते हैं कि, हे तपस्वियो! मन की बुराइयों को छोड़ दो, घर पर ही रह कर शब्द का सिमरन करो, आप लाखों प्रयत्न करते रहो, चाहे लाखों यातनाएँ दे कर शरीर को दुखी करते रहो, अगर मन शुद्ध नहीं करते हो, अगर मन ना माने, तो सर्वस्व बेकार और व्यर्थ ही है। तुम, चाहे गुरु के बताए गए, कितने ही अंकुश मार लो, चाहे तपोवनों में कितने ही कठोर तप कर लो, मगर शब्द और सुरत के, मणिकांचन योग के बिना कोई सुख व शान्ति प्राप्त नहीं कर सकते हो। शब्द सुरत के मिलन से ही, दुखों से मुक्ति मिल सकती है।
।। शब्द हिंडोल।।
तपीआ तप तूँ ऐसा फर लै तपदा मन शीतल कर लै। काम क्रोध मोह लोभ अहंकारा। इन सब से तपीआ कर तूँ कनारा। मूरत गुर की धिआन धर लै। गिआन की गोदड़ी खिमा की खिंथा। शांत करणा दोई झोली रहंथा। तागा शब्द सुरत सूई चर लै। धंनि धिआन शब्द धनेऊ वरागण विराग दसवें चर लै। बाहर ते उलट अंतर बर लै। ऊअँग मुंदरा सोहम तोप को लगाई। भंवर गुफा जा ताड़ी जमाई। रविदास सतिनाम सच खंड घर लै।
गुरु रविदास जी समझाते हैं कि, हे तपस्वी! तूँ ऐसा तप पकड़ ले, जिस से तेरा जलता हुआ मन और शरीर शीतल हो जाए। तुम अपने आप को, काम,क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार पांचों अगन वाणों से किनारा कर लो। तूँ ज्ञान का बिस्तर और क्षमा की रजाई ओढ़ ले, तेरे मन में हमेशा शान्ति और तेरी झोली में दया धर्म रहने चाहिए, अपने मन की सूई में, शब्द के धागे को पिरो ले, अपने ध्येय अर्थात आदिपुरुख के ध्यान के साथ, शब्द के जनेऊ और वैरागण के सहारे, विराग को लेकर दसवें दरवाजे में प्रवेश कर ले। अपने आप को उलटा कर के, दसवें दरवाजे से अंदर घुस जा, उस के अंदर चले जा, ऊअँग की मुद्रा बना कर, सोहम की बंदूक को तान कर, भँवर गुफ़ा में जा कर, ताड़ी लगा ले और समाधी जमा ले। गुरु रविदास जी समझाते हैं कि, तपसिया तूँ सतनाम के रास्ते पर चलता हुआ, सचखंड को, अपना घर बना ले।
गुरु रविदास जी ने, तपियों, साधकों के आडंबरों का तर्कसंगत पोस्टमार्टम किया है, जिन लोगों ने, शरीर को दुख दिलाए और अति अमानवीय यातनाएँ दिलाईं, अमानवीय दुखों को बर्दाश्त किया, वे उन्हें समझाते हैं, कि, शब्द सुरति के मेल के बिना, सभी आत्मिक दुख सहन करना व्यर्थ है। गुरुजी ने, शासकों, तिलकधारियों, पंडों मुल्लों को, बुरी तरह से परास्त किया मगर अपने ज्ञान से ही किया था, गुरु जी ने अपने शरीर को खुद ही कष्ट नहीं दिलाए, वास्तव में ही, यदि हम जिंदा रहेंगे, तभी कोई भी क्रांतिकारी परिवर्तन कर सकते हैं, अगर मर जाएँ और जेलों में बंद हो कर बैठ जाएं तो, क्रान्ति रूक जाती है।
रामसिंह आदवंशी।
गुरु रविदास सेवक।
नबंबर 14, 2020।
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