गुरु रविदास जी ने मीराँ को कमली दीवानी बना दिया था।

।।गुरु रविदास जी ने मीराँ को कमली दीवानी बना दिया था।।
गुरु रविदास जी ने, मीरांबाई को अपनी शिष्या, इसीलिए बनाया था कि, वह उन के आध्यात्मिक विचारों को समझती थी। सात वर्ष की आयु में ही वह उन के गाए गए शब्दों को कंठस्थ कर के प्रातः काल ही सुरीली धुंन में  गाऐ जा रही थी। गुरु जी, मीराँबाई की बौद्धिक क्षमता और धैर्य को भी जान चुके थे, यही कारण था कि, मीराँ को गुरु जी ने अपनी शिष्या के रूप में अंगीकार कर लिया था। गुरु जी ने एक तीर से कई निशाने किए थे, एक तो मीराँबाई सत्य को पहचानने में कुशल थी, कुरीतियों से युद्ध करने के लिए तैयार थी, जातीय अहंकार और घमंड उसे छू तक नहीं पाए थे। उस में नारी जाति को भी सँवल देने की हिम्मत, साहस और धैर्य भी था। मीराँ में बुराईयों से टक्कर लेने की भी शक्ति थी, जिस का प्रमाण मीरांबाई को पीने के लिए, विष का प्याला दिया गया, बन्द पिटारी में नाग भेजा गया, तलबारों से लैस मायके और सुसराल वालों ने, कत्ल करने का कुप्रयास किया था, मगर गुरु रविदास जी महाराज के आंचल के सुरक्षा कबच ने, उसे हाथ देकर बाल बांका होने नहीं दिया था। मीरांबाई अपने सुसराल का हाल, स्वामी ईशरदास जी महाराज के शब्दों में वर्णन करती है, जिस का मार्मिक उल्लेख गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 596-597 पर किया गया है:----
               ।। शब्द कान्हड़ा।।
तेरे प्रेम ने पिया दिआ मोहे कमली दीवानी बना दिया। पीता पिआला जब काई। खुल गिआ था बजर तब काई। जहिर अमृत बना कर भेजे नाग पटारी राणे। ठाकुर गल में फूल जो पाणे। मैं नूँ उथे भी लीना बचाअ। मेरे गुरां ने भेजे फूलों के हार हार। पटराणी को हम वेखे उघार उघार उघार। गुर के जो हैं तोहफे। वेखेंगे हम बैठ के गोशे। मैं चक चक मात्थे लांवां जी। बार बार बार उठावां। इह पटारी नहीं गुरु रविदास की उपहारी है। जिस विच है शक्ति भारी है। जिस दे गल्ल पावां फूलों के हार हार हार।
मीरांबाई, गुरु रविदास जी को कहती है कि, गुरु जी आप के अलौकिक स्नेह के जाम पीने से मैं पागल दीवानी हो गई हूँ। जब से मैं ने प्रेम प्याला पी लिया तभी से मेरा दसवें दर का बजर कबाड़ भी खुल गया। आप ने मेरे जहर को अमृत बना दिया। जब राणा विक्रमदित्य ने पिटारी में नाग भेजा था तब वही आप ने मेरे गले का हार बना दिया था, मुझे उस से भी बचा लिया था। वह नाग ना हो कर फूल बन गए थे जिन्हें मैं बार बार खोल कर देखती रही। जो मेरे गुरु द्वारा तोहफे भेजे गए थे उन्हें मैं बैठ कर देखती ही रहती हूँ। जब मुझे इन की याद आती है, तो बार बार उठा उठा कर, गुरु जी मैं मात्थे से लगा लेती हूँ। गुरु जी ये विषियर नाग की पिटारी नहीं है, ये तो आप के अमूल्य उपहार हैं, जिस में वहुत बड़ी आध्यात्मिक शक्ति छुपी हुई है, जिस को मैं फूलों के हार समझ कर, गले में डालती हूँ।
               ।।शब्द देव गांधारी।।
भिक्षा पावो दासी नूँ, अज दर दर अलख जगाई। मैं ने जनम लिआ भी राजन के, करम फकीरी लिखवाई। पेवकड़े घर कष्ट वहु उठाए सो लेख सोहरड़े भी आई।  जहर पिलावन मैंनूँ झिड़कां दलावन नागां दी पीटारी भिजवाई। हे! नारायण किआ अपराध हुआ मुझ से, मीराँ पर है क्रोध बधाई।
गुरु रविदास जी महाराज की भठ्ठी में जल कर, मीराँ कुंदन बन गई थी। वह सन्यासिन बन कर, लोगों से कहती कि, मुझ दासी को भिक्षा दे दो, मैं ने घर घर अलख जगाई है। मैं ने जन्म तो राज घराने में लिया था मगर कर्मों में फकीरी लिखाई हुई थी। मायके में वहुत दुख उठाए मगर सुसराल में भी वही लेख साथ चले आए और उन से भी अधिक दुख पा रही हूँ। जहर पिलाया गया, गुरु अपनाने के कारण खूब झिड़कियां सुनी, नागों की पिटारी आई, हे मेरे रब्बा! मुझ से क्या क्या अपराध हुए थे कि, आप ने मुझ पर इतना क्रोध बढ़ाया हुआ है।
रामसिंह आदवंशी। 
गुरु रविदास सेवक।
नबंबर 06, 2020।

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