गुरु रविदास जी की शिष्या"मीराँबाई"के भाई की मूढ़ता।

।। गुरु रविदास की शिष्या "मीराँ बाई" के भाई की मूढ़ता।।
गुरु रविदास जी महाराज की वीरांगना शिष्या मीरांबाई, जब अपने भाई के तीरों, तलबारों के आतंक से भयभीत नहीं हुई, आदमखोर कुत्तों से नुचवा कर, धरती के बीच गाड़ देने के भय से भी तनिक नहीं डगमगाई, मीराँबाई का गुरु रविदास जी के ऊपर दृढ़ आत्मविश्वासः उसे, अत्यचारियों से मुकाबला करने के लिए विवश करता जा रहा था, वह ब्राह्मणों के, काले कानूनों से युद्ध करती जा रही थी, वह राजपूतों को भी, मनुस्मृतियों के धर्मान्ध कानूनों को तोड़ने के लिए विवश करती जा रही थी, वह अपना क्रांतिकारी विराट रूप राजपूतों को दिखा कर, इंसानियत को समझने के लिए विवश करती जा रही थी, जो मीराँ के भाई के मानस सरोवर में उतरता भी जा रहा था। जिसे समझ कर पश्चाताप करता हुआ मीराँ का भाई, गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ के रचयिता स्वामी ईशरदास महाराज के शब्दों में, पृष्ठ 573-574 पर मीराँ को कहता है:---
                 ।।शब्द कलँगड़ा।।
मीराँ उड़क नूँ मैं दुख के तंवर उठाई ऐ। सभन रहे समझाई। तूँ ना खातर किसे लिआई। हथ जोड़ रहे भैंण भाई। तैं ना कदर पाई ऐ। साडा होर ना जिआदा बैर। कीता इक बड़ा तूँ कहर। पीते धोई रविदास दे पैर। साडी जात गुआई ऐ। साडी छतरी उंच जाति। जाई चमाराँ दे दिन राति। बल बल उठदी अग विच छाती। देवां कतल कराई ऐ। असीं उच्च ओह हन नीच। धोई पैर पीए गलीच। पीते आई ना तैंनूँ मीच। ऐडा जुलम कमाई ऐ।
मीरांबाई की तर्कसंगत बातें सुन कर, उस का भाई, मीरांबाई को कहता है! कि मीराँ दुखी मन से विवश होकर ही मैं ने तलवार उठाई है। तुझे सभी समझा रहे हैं, मगर तूँ किसी का कहना नहीं मान रही है, तेरे सामने सब वहन भाई हाथ जोड़ कर मिन्नतें कर रहे हैं, तूँ ने किसी की भी इज्जत नहीं रखी। हमारा आप से कोई अधिक बैर विरोध नहीं है, तूं ने रविदास के पांव धो कर पीए हैं, यही एक बड़ा जुल्म किया है, जिस से तूँ ने हमारी जाति को धब्बा लगाया है। हमारी तो क्षत्रिय जाति सबसे ऊंची है, तूँ दिन रात चमारों के घर चली जाती हो, जिस को देख देख कर, हमारी छाती जल जाती है, अर्थात हमारे सीने में आग लगती है,  इसलिए हम तुझे कत्ल कर देना चाहते हैं। हम ऊँच जाति के लोग हैं, वे तो नीच जाति के हैं, तूँ ने उन के मैले कुचैले पाँव धो कर पीए हैं, तुझे ऐसा पानी पीती हुई को कोई घृणा नहीं हुई, तूँ ने तो वहुत बड़ा अपराध कर डाला है
                    ।।शब्द मलहार।।
अब ना मानू कोउ प्रमाण मीराँ, पी लै पिआला जहर दा बकत दुपहरदा। मौत सिर आई सिर पर अड़िआँ करदी। ऐथे कोई ना तेरा दरदी। निहचल जावण तेरे प्राण मीराँ वेला कहर दा, बकत ना खैरदा। पीए बटोल ना जे तूँ मीराँ। काटूँ मूंड तेरा शमशीराँ। सभ को हो जाऊगा कान मीराँ। अब ना ठहरदा चढ़िया क्रोध कहरदा। जां तूँ कहि दे रविदास तिआगा। इस बायदे पर तुम को छाडा। बेमुख हो खाहम खाह उदय भान मीराँ पाणी आऊ ठकाणे नहरदा, वेला लँघ जाऊ बैर दा। जे
आखे रविदास दे जाणा। तब ना मिटणा आईयो भाणा। सँहु खावां बैठे प्रधान मीराँ हिलणा रंच पैर दा हो के शहर दा।
गुस्से में तमतमाते हुए, मीराँबाई के भाई ने कहा, मीराँबाई! अब मैं तेरी कोई दलील अपील नहीं सुनूँगा, तेरी कोई भी बात नहीं सुनूँगा, तेरा कोई भी कहना हरगिज नहीं मानूंगा, अब दोहपहर का समय हो चुका है, जहर का प्याला पी ले। तेरे सिर पर मौत आ जाने पर भी तूँ जिद्द करती जा रही है, अब यहाँ पर, तेरा कोई भी हमदर्दी नहीं है, तेरे प्राण निकलना निश्चित हैं, मीराँ ये समय प्रलय का आ चुका है, अब तुझे कोई भी दया की भीख नहीं मिलेगी।
मीराँ यदि तूँ जहर नहीं पिएगी तो, मैं तेरा सिर तलवार से काट दूंगा, तुझे देख कर सभी को कान हो जाएगा, अब मैं और रुक नहीं सकता, मुझे कहर का गुस्सा चढ़ा हुआ है। तूँ या तो कह दे कि, मैं ने रविदास गुरु को छोड़ दिया है, इस इकरार पर मैं तुझ को छोड़ सकता हूँ, रविदास के बिमुख होने की कसम खा ले, तभी पुनः नया सूर्य उदय होगा, नहर का पानी फिर ठिकाने आ जाएगा और ये बैर और दुश्मनी का समय बीत जाएगा। अगर तूँ कहे कि, मैं रविदास जी के ही घर पर ही जाना है, तब ये होनी बिलकुल नहीं हटेगी, ये होनहार नहीं मिटेगी, मीरां यहाँ प्रधान बैठे हैं, मैं सौगन्ध खाता हूं, कि इस शहर में, तेरा एक भी कदम रंच मात्र हिलने नहीं दूंगा। 
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
नबंबर 02,2020।

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