गुरु रविदास महाराज द्वारा ढोंगियों की पोल खोल।।
।।गुरु रविदास महाराज द्वारा ढोंगियों की पोल खोल।।
गुरु रविदास जी ने, ढोंग रच कर, पेट भरने वाले ढोंग रचने वाले साधु, सन्तों और भिखारियों के ढोंगों की खूब पोल खोली हुई है। कुछ निठठले, कामचोरों ने, आडंबरों, पाखण्डों, की खोज कर के, परजीवी बन कर, अपना और अपने परिवार का पेट भरने का धंधा शुरू किया हुआ है। कुछ लोगों ने, काले, पीले, नीले, हरे और गेरुए वस्त्र पहन कर, लोगों को भरमाया हुआ है। कोई सिर मुंडा कर, कोई वालों की जटाएं बढ़ा कर, कोई आधे मुंह के वाल कटवा कर, कोई आधी दाढ़ी कटवा कर, कोई दाढ़ी बढ़ा कर रूप कुरूप बना कर सँगत को ठगने का काम करता आ रहा है। ऐसे इंसान से धूर्त पाखण्डी बनने वालों को, गुरु रविदास जी महाराज ने, बुरी तरह से आड़े हाथों लिया है और उन की पोल खोली हुई है। स्वामी ईशरदास जी महाराज के शब्दों में गुरु जी, गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 787-788 के ऊपर फरमाते हैं कि:-----
।।शब्द सीरी।।
करनी का ढंग निराला साधो, करनी का ढंग निराला। कोई वनवासी नगन फरासी कोई परने डाल दुशाला। कोई भेखधारी जटा रखवारी कोई शंख बजाई घड़ियाला। कोई पोस्ती चरासी अरू अफीमी कोई चंडू पीए भंग पिआला। कोई मूंड मुंडिआँ भवूति लगीआँ कोई चके मिरग शाला। कोई जलधारी कंन पुड़ाआरी, कोई ताड़ी इंद्री कटाला। दास कहे इक सार शब्द बिन इन भेखाँ दा मुंह काला।
स्वामी ईशरदास जी महाराज फरमाते हैं कि, हे साधो! कर्म करने का तरीका निराला अर्थात अदभुत ही होता है। कोई साध वनों में निवास करता है, कोई नँगा हो कर गले में दुपट्टा, शाल, परना डाल कर घूमता है, कोई सिर पर लंबे लंबे वालों की जटाएं बना कर घूमता है। कोई शंख बजाता फिरता है तो कोई घँटे, घण्टियाँ बजाता फिरता है। कोई पोस्त तो कोई अफीम खाकर मतवाला होकर झूमता है, कोई चिलम में भांग डाल कर कस लेता रहता है। किसी ने सिर के वाल मुंडवा रखे हैं, किसी ने धूने की राख शरीर में लेप कर ली है, कोई मृगशाला को कंधे पर लटका कर घूमता फिरता है। कोई जल पी कर ही घूमता है, तो कोई कानों को चीर कर कुंडल डाल कर फिर रहा है, कोई अपनी जननेंद्रि को बेंध कर उसे ताला लगा कर घूमता है। गुरु जी फरमाते हैं कि इन भेषधारियों को शब्द के गूढ़ रहस्य का कोई ज्ञान नहीं है, इन भेषधारियों का और वहुरंगियों, बहुरूपियों का मुंह काला होता है अर्थात ये लोग साध तो बन जाते हैं मगर साधु संतों के गुणों को धारण नहीं करते हैं, केवल रंग विरंगे पहरावे पहन कर और रंग रूप बना कर साधों के नाटक करते है, जिस के कारण, इन्हें भटकने के अतिरिक्त कुछ हासिल नहीं होता है, अंत में, इन पाखंडियों का केवल मुंह ही काला होता है।
।।शलोक।।
साध होई मन साधा नाहिं, की करना भेख लगाई। दास कहे स्वांग है पूरा, पूरे के गुण क्यों ना गाई। जटा जूट तन कपड़े गेरू बेखन मैं तो साधु आई। दास कहे जे अंदर कपटी तउ भेख लगाऊंना बिरथा जाई। घर बार छोडा जे कपट ना छाड़ा आंखीं मीट वन बैठा घुग्गा। दास कहे तन का है योगी बामी मारे ना मुआ गुगा। भेख लगा कर तीर्थ नहाया मन की मैल रहि मन माहिं समाई। दास कहे औराँ को रहि बतलावैं हम तो अठसठ तीर्थ नहाई। सिर मुंह मुन बन गया रोडा कहे मैं दमड़ी चमड़ी तिआगि। लुट छिप के तउ दुगणा तिगना संचरे गिआन की चोट ना मंद बरागी। आए गए को निकट ना लावे भुखे को देवे ना अन्न पाणी। संक संचरे अंदर छल भरिआ मुखों कहे मुकि आऊँणी जाणी।
साधु सन्त हो कर भी अगर अपने मन को नहीं समझा अर्थात मन की अच्छाइयों और बुराईयों को नहीं पहचाना, तो रंगीन भेष बनाने का क्या लाभ। स्वामी जी फरमाते हैं कि, ये भेष बनाना तो केवल स्वांग ही है, साध बन कर उस सम्पूर्ण आदपुरुष का गुण क्यों नही गाते हो। सिर पर जटा जूट , शरीर पर गेरुए, भगवे रंग के वस्त्र पहनने से तो साधु ही नजर आते हैं। स्वामी जी कहते हैं कि, यदि शरीर अंदर से छली कपटी है, तो भगवां रंग बनाना व्यर्थ है। घर बार छोड़ कर साध बन गए और कपट नहीं छोड़ा और आंखों को बंद कर के ठगी करते रहे तो वह साधु घुघे पक्षी की तरह कपटी ही नजर आता है। स्वामी जी कहते हैं कि, ये साध केवल मात्र शरीर के ही योगी है, अर्थात केवल गेरुए रंग के वस्त्र धारण कर के साध नजर आते हैं मगर अंदर से मिट्टी से बना हुआ बामी की तरह गुगा ही है। गेरूए रंग से कपड़े तो रंग लिए जाते हैं और तीर्थ में नहा धो कर, पहन लिए जाते हैं मगर मन की मेल मन में ही समाई हुई रहती है, ऐसे साध दूसरों को ही बताते हैं कि, हम ने अठाहसठ तीर्थों का स्नान किया हुआ है। सिर और मुंह के बालों को मुंडवा कर तो रोड़ा बन कर कहता है कि, मैंने सारा धन दौलत और चमड़ी दमड़ी को भी त्याग दिया है। मगर साध-सन्त बन कर, साध भेष में छिप कर, दोगुना तीनगुना ठग कर संग्रह करता है, मगर ये कपटी वैरागी मन को, ज्ञान की मार नहीं मारता। ये आने जाने वाले नङ्गे भूखे और भिखारी तक को भी रोटी पानी नहीं देता है। ऐसे कपटी साधु संतों के मन के अंदर, केवलमात्र शंकाएँ ही भरी रहती हैं, शंकाओं को ही इकठ्ठी करता रहंता है, मगर दूसरों को कहता फिरता है कि, मेरा संसार में आना जाना खत्म हो चुका है।
रामसिंह आदवंशी।
गुरु रविदास सेवक।
नबंबर 10, 2020।
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