गुरु रविदास जी महाराज ही "मीराँबाई" के रक्षक।।

।। गुरु रविदास जी महाराज ही "मीराँबाई" के रक्षक।।
गुरु रविदास जी ने अपनी शिष्या मीरांबाई के सिर पर अपना हाथ रख कर, उसे तनिक भी आंच आने नहीं दी थी। जब भी मीराँ को मारने की योजनाएं बनाई गईं, वे सारी की सारी धरी रह गईं। गुरु जी ने उसे शहीद नहीं होने दिया। मौत के मुंह से वापस आने के कारण, मीराँबाई समझ गई कि, गुरु रविदास जी के वरदहस्त से ही, उसे कोई आंच नहीं आती है। उन से बड़ा विश्व में कोई भी शक्ति संपन्न गुरु नहीं है। दुनियाँ को स्वार्थी और निर्मोही समझ कर, मीराँबाई जी सन्यासिन बन गई। मीरांबाई की मनःस्थिति का, स्वामी ईशरदास जी महाराज, गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या, 597-598 पर वर्णन करते हैं:-----
               ।।शब्द देव गांधारी।।
राम नाम गुरु जपदे उन्हां भै ना तेज कटारिआं। जहर पलाऐ चाहे अगनी सताऐ सिर पर फेरदे आरिआं। परवतां तों साटन, बन्द बन्द काटन खोपड़िआँ सिर तों उतारिआँ। खलड़ी लहाऐ चाहे सूली ते चढ़ाए, गिर पये शिखरों चढ़ कर अटारिआँ। ईशरदास कहे जो राम के पिआरे सागर तों लंघे लाके तारिआँ।।
स्वामी ईशरदास जी महाराज फरमाते हैं कि, जो गुरु रविदास जी के नाम का जाप करते हैं, उन्हें तेज धार कटारों, तलबारों, हथियारों का कोई भी भय नहीं होता है। चाहे कोई जहर पिला दे, चाहे कोई आग में फेंक दे, चाहे सिर के ऊपर आरियाँ चला दें। चाहे कोई पर्वतों से गिरा दें, खोपड़ींयों को सिर से उतार दें, चाहे कोई शरीर से चमड़ी उतार दें, चाहे फांसी पर चढ़ा दें, चाहे कोई ऊंची अटारियों की चोटियों से गिरा दे, स्वामी ईशर दास फरमाते हैं कि जो आदपुरुष को प्यारे होते हैं, वे तो सागर में भी तेज धारों औऱ लहरों की रफ्तारों के बीच भी तारियाँ लगा कर पार हो ही जाते हैं।
                ।। शब्द जिला।।
केहड़ा है मारन वाला उस नूँ जहान उत्ते। रक्षा प्रभ की होवे जिस इनसान उत्ते। जहर पिआला आया। मीराँ नूँ आप पलाआ। राणा फेर हथीं आया मारन मकान उत्ते। बेहोश गिरदा। बीमार ज्यों होया चिरदा। राणा सी मारू फिरदा। मीराँ उत्ते। कीता सी अपना पाया। राज भाग गुआया। हरि जी का सी नाम भुलाया। बैठा अभियान उत्ते। भगतां दे होवन दोषी। जन्म चंडाल होशी। बिअर्थ उम्र होशी। 
मीरांबाई की रक्षा करने वाले, गुरु रविदास जी महाराज की अपरम्पार दिव्य शक्ति जिस किसी के साथ हो, उसे संसार में मारने वाला कौन हो सकता है? जिस के ऊपर गुरु जी की दिव्य दृष्टि हो उस का कोई भी बाल बांका नहीं कर सकता है। राणा ने, आप मीराँबाई को जहर का प्याला पिलाया मगर गुरु जी ने, उस जहर को भी अमृत बना दिया, विक्रमादित्य राणा फिर उन के हाथ चढ़ गया, जो मीराँ को मिटाने पर उतरा था। गुरु रविदास जी महाराज की टेढ़ी नजर के कारण, राणा विक्रमादित्य बेहोश होकर धरती पर गिर पड़ा, ऐसा प्रतीत हो रहा था कि, वह चिरकाल से ही बीमार हो, वह भगवान को भी पीछे धकेल कर, मीराँबाई को मारने के लिए, घूम फिर रहा था, मगर राणा ने अपने कर्मों का फल पा कर, अपना राजपाठ भी खो दिया, अभिमान के तख्त पर बैठ कर, वह भगवान का नाम तक भी भुला बैठा, प्रभु के प्यारों की निंदा कर के, बुरे कर्मों के कारण, वह भगवान का अपराधी हो गया और उस का जन्म भी चाण्डालों का ही हो गया, निंदा करने के कारण, अपनी जिंदगी भी व्यर्थ ही गंवा कर बर्बाद कर दी।
रामसिंह आदवंशी।
गुरु रविदास सेवक।
नबंबर 07, 2020।

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