गुरु रविदास जी की शिष्या "मीराँबाई" का श्रृंगार।

।।गुरु रविदास जी की शिष्या "मीरांबाई" का श्रृंगार।।
गुरु रविदास महाराज ने अपनी प्रिय वीरांगना शिष्या, मीरांबाई के जहर को अमृत बना कर जो इतिहास रचा है, वह विश्व में किसी भी अवतार ने नहीं रचा है। जब मीरांबाई गटागट जहर पी कर, अपनी परीक्षा में सफल हो गई, तो सारा मनुबाद, मुंह की खा कर, मिट्टी में मिल गया। राज परिवार का जातीय घमंड भी बुरी तरह से चकनाचूर हो गया, जिन्हें चमार कर कह कह कर नीच कहा जाता था, वे मनुवादियों के तेती करोड़ देवी देवताओं को धूल धूलधूरित कर गए। मीराँ भी परीक्षा में सफल हो कर, अजर अमर हो गई। मीरांबाई के लिए गुरु रविदास जी, प्रभु से भी बढ़ कर, आदर्श गुरु बन गए। मीरांबाई औरतों को आभूषण के बारे में, समझाती है कि, औरतों को किस प्रकार के आभूषण पहनने चाहिए? किस प्रकार का श्रृंगार करना चाहिए? जिस का वर्णन स्वामी ईशरदास जी महाराज, गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 595-596 पर पर लिखते इस प्रकार करते हैं:---
           ।।शब्द मालकौंस।।
गहिने सचे गुरां वाले पावों जी। चोंक चतराई पावों। चुप दे तां फुल लावो। जुगनी जगत गुरां दी कमावो। टिका टेक गुरां दी करो। बिंद बिंद पर  हक रखो। जिल जिल जाल चरासी गुआवो जी। वाले दिल दे वल्ल गुआवो। डंडिआं ना डंड पावो। सोहम शब्द में सुरत लगावो जी। लौंग गुर की लिव लावो। नथ मन नूँ नथ पावो। तीहली तेजी ते हट जावो जी। गोखड़ू गिआन पावो। बुध दे तां बन्द पावो। चूड़ा चित दी चिंता गुआवो जी। छल्ले दिल दे छल कढ़ावो। गूठी गुर गिआन गुर गुर गुर गुर गुआवो। चोंकी चोर पंज तां हटावो जी। पंजा दी पंजेब पावां। तीनां दी हवेल लावां। माला पच्ची परकृतां सजावो जी। लगन दा में लंहगा पावां। निरमल नाल चाहवां। मीरांबाई शिंगार सुनावो जी। सचे इह शिंगार लाके। गुरां दे दुआरे जाके। शीशा मूरत गुरां दी देख आबो जी।
मीरांबाई, गुरु रविदास जी की अग्निपरीक्षा में सफल हो कर, महानायिका बन कर समूचे विश्व के लिए आदर्श साध्वी बन गई थी। उसे संसार में आभूषण डालकर सुंदर बनने संवरने वाली नारी, आभूषणों की गुलाम मात्र नजर आने लगी, मीराँ को आभूषणों से सुसज्जित नारी, आभूषणों की बेड़ियों से जकड़ी हुई प्रतीत होने लगी इसीलिए, उसने नारी को आभूषणों का महत्व समझाते हुए कहा है कि, गहने, असली तो गुरु होते हैं, वही नारी को धारण करने चाहिए, और वही डालने चाहिए। सिर में लगाया जाने गोल चक, नारी की चतराई होती है। वालों में लगाए जाने सुंदर फूल चुपचाप रहने वाली चुप होती है। जुगनी विश्व की गुरुओं की सेवा होती है। गुरुओं का ध्यान मात्थे पर सजने वाला टिक्का होता है। बिंदिया पराए अधिकारों को खत्म करने वाली, शून्य के समान होती है। जिल जिल नामक आभूषण भी जन्म मरण के बंधन को काटने का नाम है।कानों के वाले दिल के बुरे विचार होते हैं जिन्हें दिल से निकाल देना चाहिए। डंडियां गलती करने करने पर दण्ड स्वरूप हैं। सोहम शब्द का ध्यान लगाने से ही मन के टेढ़े मेढ़े वल खत्म होते हैं। नाक का लौंग गुरु की लगन है। नथ मन को नकेल डालने वाली होती है। नाक की तीहली भी मन की तेजी अर्थात क्रोध है, जिस से दूर हो जाना चाहिए। ज्ञान गोखड़ू होता है। बुद्धि भी कलाईयों में डाला जाने वाला बन्द होता है। चिंता को खत्म करने वाला चूड़ा होता है। दिल के टेढ़े मेढ़े विचारों को छल्ले कहते हैं। अगूंठी केवल गुरु गुरु गुरु ही है। पांच प्रकार के चोरों अर्थात काम, क्रोध, लोभ मोह, अहंकार को चौकी कहते हैं, जिन्हें मन से दूर कर देना चाहिए। इन पांचों की पंजेब नामक आभूषण होता है, तीन की हवेल होती है। पच्ची प्रकृतियों को माला कहते हैं। लंहगे को भक्ति की लगन कहते हैं। मन के चाव स्वच्छता के प्रतीक हैं। मीरांबाई इन श्रृंगारों का वर्णन करती है कि नारी को यही श्रृंगार करने चाहिए। गुरु के दरबार में जा कर, गुरु रविदास जी की मूर्ति रूपी शीशा ही देखना चाहिए।
मीरांबाई जी का फरमान है कि, अगर मेरा कोई दिव्य आभूषण हैं, तो अच्छे विचार ही हैं और कोई अच्छी मूर्ति है, जो देखने योग्य है तो वह हैं, गुरु रविदास जी महाराज। 
रामसिंह आदवंशी।
गुरु रविदास सेवक।
नबंबर 05, 2020।

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