गुरु रविदास जी की कृपा से "मीराँबाई"का जहर अमृत बन गया।।
।।गुरु रविदास जी की कृपा से "मीराँबाई" का जहर अमृत बन गया।।
गुरु रविदास जी की वीरांगना शिष्या, ने परिवार के खूनी ही नहीं निर्मोही लोगों के सामने वहुत विलाप किये, मीराँ ने, सब के आगे हाथ जोड़ कर अनुनय विनय कर के भक्ति की शक्ति को बताया, गुरु रविदास जी को सर्वोच्च गुरु सिद्ध किया, गुरु जी को सच्ची मानवता का मसीहा बताया, गुरु जी को पानी के ऊपर पत्थर तारने वाला अवतार बताया, दुःखियों के दुखों को दूर करने वाला पैगंबर बताया, कोहड़ियों के कोहड़ दूर करने वाला भगवान बताया मगर, जात पात के अभिमानियों ने एक नहीं सुनी, उन के पत्थर दिलों पर किसी भी तर्क का कोई भी असर नहीं हुआ। वह बार बार फरियाद करती रही कि, मुझे गुरु रविदास जी के दर्शनों से मत रोको, मगर मनुस्मृतियों ने राजपूतों और वाणियों में भी छुआ छूत का जहर घोल रखा है, जिस के कारण वे जातीय अभिमान के सागर में डूबकर, वाप, बेटी भाई और बहन के पवित्र रिश्तों को भी भुला कर बिलकुल खत्म कर बैठे। मीरांबाई भी जातपात, छुआछूत, पुरूष स्त्री की, ब्राह्मणों द्वारा निर्मित कच्ची दीवारों को ध्वस्त करती हुई, जहर का भरा प्याला गटागट पी गई। स्वामी ईशरदास जी महाराज, गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 577-578 पर, इस अमानवीय घटना का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि:----
।।शब्द पीलो।।
पीता पिआला जां मीरांबाई अमृत होया जहिर दा। हैरों हैरों करें सभ लोगन सिथा भयो तउ राणा उतरिआ क्रोध कहर दा। छड पिंड अंड ज्योतिर्मंडल में वासा सुरति सुंन दवारे लै गई जिथै असर ना जहर दा। जिन पर कृपा गुर की तिन के हिरदै भीतर जा कर विख क्यों ठहरदा। विष तों अमृत होई तिन्हां दा जिन्हां इस जगत माहें पला ना फ़ड़िआ गैरदा। मुआ कुसुता पुनर मारे सुघड़ सुजान हारे जोर ला आठो पहरदा। ईशरदास अंकुर धान किआ होवन जोई चावल उतों भुस को उतार डारदा।
जब सारे राज परिवार ने, मीरांबाई को, जातीय अभिमान के कारण,अकाल मरने के लिए विवश कर दिया, तब मीरांबाई ने जहर पी ही लिया। जहर मीराँ के शरीर में जाते ही अमृत बन गया है और उपस्थित लोग हैरान हो कर अपनी बोली में हैरों हैरों कहने लगे। मीराँ के निर्णय से परेशान राणा के होश उड़ गए, उसका प्रलंयकारी क्रोध उतर गया, मीराँबाई ने, तुरन्त अपने पिंड अर्थात शरीर को त्यागकर, अपनी नश्वर सुरति को ले कर, ज्योतिर्मंडल में निवास करने के लिए, सुंन दुआरे से चढ़ा कर ले गई, जहाँ जहर का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। जिस पर गुरु रविदास जी महाराज की कृपा होती है, उन के भीतर जा कर विष किस प्रकार और क्यों ठहर सकता है? विष से अमृत उन का होता है, जिन्होंने संसार में बुरे आदमी का साथ कभी नहीं किया हो। कुमार्ग पर चलने वाला मूर्ख चाहे आठों पहर जोर लगा ले, मगर उस के जोर लगाने से वह सत्पुरुष को को कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकता है। स्वामी ईशरदास जी फरमाते हैं कि, जो चावलों को लगी फफूंदी को मिटा सकता है, उसके धान के अंकुर को कोई भी बर्बाद नहीं कर सकता है।
रामसिंह आदवंशी।
गुरु रविदास सेवक।
हिमाचल प्रदेश। भारत।
नबंबर 04, 2020।
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