गुरु रविदास जी महाराज और विश्वासघाती लोग।।
।।गुरु रविदास जी महाराज और विश्वासघाती लोग।।
गुरु रविदास जी, ऐसे अवतारी सत्पुरुष हुए हैं, जिन्होंने कभी भी, ये नहीं देखा कि कौन हमारा साथ दे रहा है? कौन नहीं दे रहा है? वे अन्याय, अनाचार, अत्याचार के खिलाफ जंग लड़ते रहे। उन्होंनें कभी भी पीछे मुड़ कर, ये नहीं देखा कि, किस ने उन की टांगे खींचीं? किस किस ने उन के साथ छल किया? किस किसने कपट किया? किस ने उन्हें जान से मरवाने की कोशिश की? वे निरन्तर, अच्छे मार्ग पर चलते हुए अच्छे कर्म करते गए। कृतघ्नों की कृतघ्नता को भी अच्छी तरह जानते थे, वे जानते थे कि दुष्टात्मा कभी भी सुधरती नहीं हैं मगर जो सुधर जाते थे, उन्हें गुरु जी माफ भी कर देते थे, जो सुधर नहीं पाते थे, वे अपने पाप कर्मों के भार से ही प्राणों से हाथ धो बैठते थे। गुरु रविदास जी महाराज ने, आजीवन जनकल्याण के लिए क्रांतिकारी संघर्ष और आंदोलन ही किये मगर कुछ एक धोखेबाज लोगों द्वारा छलकपट करने के कारण, उन्हें भी कई परेशानियों का सामना करना पड़ा था, जिस अनुभव के कारण, उन्होंने अपने मन के भावों को स्वामी ईशरदास जी के शब्दों में, गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 656-657 पर वर्णन किया है:----
।।शब्द पहाड़ी।।
मतलब दी दुनिआँ कोई मित्र नहीं हैं तेरे। जब तक मतलब कैंहदे पिता पिता, गिआ मतलब दुश्मन फेरे। जब सी मतलब छिन छिन बंदना कढ मतलब बड़े ना फेर डेरे। जिन्हां दी खातर बदीआँ झलिआँ निकले पापी मन के चेरे। मैं कहाँ इह सिदकी सिखऐ दास तिन्हां दे धरकेरे।
गुरु रविदास जी महाराज, सांसारिक जीवोँ के बारे में फरमाते हैं कि, ये सभी स्वार्थी जीव हैं, कोई भी आप का मित्र और सज्जन नहीं है। जब तक स्वार्थ होता है, तब तक सभी वाप कहते हैं मगर जब स्वार्थ सिद्ध हो जाता है फिर कभी भी वापस, उस घर में नहीं आते हैं, सब दुश्मन बन जाते हैं। जब तक मतलब होता है, तब तक तो क्षण क्षण बाद नमन करते रहते हैं, लेकिन जब मतलब निकल जाता है, तब कोई भी नजदीक नहीं आता है। जिन लोगों के लिए कई प्रकार की मुश्किलें सहन कीं जातीं हैं, सभी मन, मस्तिष्क के चोर निकलते हैं। कहां हम हैं और कहां जिद्दी हठ्ठी और ईर्ष्या से घिरे हुए शिष्य हैं, जिन सब के नाम को धिक्कार है।
।।शब्द।।
लूंण हरामी अकृतघन जो बसाह ना इन्हां दा। कूकर सूकर गरधब काऊं। इनसे जून भली ऐह कहाऊ। पवित्र करदा गाऊं। शराब, मांस, जूऐ बाजी । गनका गरहिं निसदिन जाजी। इनसे पापी दोई कहाजी।
जो नमक खा कर, नमकहराम करते हैं अर्थात गद्दारी करते है, जो लोग अच्छे किये हुए कार्यो के बदले में, दूसरों का बुरा करते हैं, ऐसे लोगों का कभी भी, क्षण भर के लिए भी विश्वास नहीं करना चाहिए, कुत्ते, सूअर, गधे और कौए आदि पक्षियों और जानबरों की योनि इन स्वार्थी लोगों से अच्छी होती है, क्योंकि कुत्ते, सुअर, गधे और कौए गाँव में पड़ी हुई गन्दगी को साफ करते हैं, उन के इस कार्य से सारा गांव पवित्र हो जाता हैं। मगर धोखेवाज, दगेदार, स्वार्थी और कृतघ्न लोग, मास, शराब और जूऐ बाजी करते हैं, ये लोग प्रतिदिन, वैश्यों के घर पर भी जाते हैं, ये लोग तो दुगने पापी कहलाते हैं।
गुरु रविदास जी महाराज, स्वामी ईशरदास जी के शब्दों में, स्वार्थी, दगेदारों की वास्तविकता का वर्णन करते हुए कहते हैं कि, इन लोगों से तो जानबर भी, हजार गुना लाभदायक होते हैं, जो हमारे कई अच्छे कार्य करते हैं। गुरु रविदास जी समझाते हैं कि, ऐसे धोखेबाज किसी के कभी नहीं बनते हैं, और ना ही ये विश्वासपात्र नहीं होते हैं, इन से संभल कर ही रहना चाहिए।
रामसिंह आदवंशी।
गुरु रविदास सेवक।
नबंबर 11,2020।
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