गुरु रविदास जी की शिष्या "मीराँ" ने जहर पी लिया।।

।।गुरु रविदास जी की शिष्या "मीराँ" ने जहर पी लिया।।
गुरु रविदास जी महाराज की परीक्षा चल रही थी, मीरांबाई परीक्षा दे रही थी, भाई कातिल बन कर, अपने जातीय अहंकार को बता कर मीराँ की ब्लैकमेलिंग करताँम जा रहा था, गुरु जी अपने तीसरे नेत्र से, सारे दृष्यों को देख रहे थे। जब मीरांबाई अपने गुरु जी से बेमुख नहीं हुई और पिता के सामने, भाई को अति कड़े शब्दों में कहती है कि, भाई मैं सच कहती हूँ कि, मैं अपने गुरु को नहीं त्यागूंगी, मैं तेरा विष का प्याला उठा रही हूँ जिस का चित्रण, स्वामी ईशरदास जी महाराज गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 575- 576 पर करते हैं:---
            ।। शब्द पहाड़ी डूगर।।
गुर ते बेमुख होंणा ना, मैं सच सच कहिनियाँ। भर दे पिआला जहर दा, पिता मैं चक चक पीनिआँ। अलीक नाते अलीक मापे अलीक गन संसार जो। देश बेगाने रहीऐ ऐथे जाईऐ सच बजार जो। की लैंणा ऐथे रहि के दुखड़े हन अनतोल। बोल कुबोल तुहाडे मंदे बच बच सहिनिआँ। जे देवें तू जहर पिता जी, लख लख सुकर मनावां मैं। मरने ते परिथम मरना तांहि दर्श गुरु का पावां मैं। इस पिआले बिच बैठा सतगुर सच दा सौदा तोले। जिस दी मूरत नूँ जी अगे रख रख बहिनिआँ। फेर वी इक दिन मौत पिआला सुणो पिता जी, पीणा है। इह दुनिआँ सभ फानी दिसदी कितना कु चिर जीणा है। उड़क कूच नगाड़ा बजणा आ तेरे ही कोले। छड़णा तेरा देश इह बाबुल जच जच रहिनिआँ। तुसीं आखो अछूत सतगुर आछूतां दर ना जाणा ई। रविदास गुर दे गुण नूँ गाइये चार पदार्थ पाणा ई। उथे सच दे दर जा के कोई जात पात ना टोले । ईशरदास कहे, तउ गुर बिन मीराँ कच कच बेचैनिआँ।
मीरांबाई के भाई और पिता सहित सभी परिवार के सदस्य मीराँ को मनाने के लिए, जहर का भय पिला कर, गुरु रविदास जी से बिमुख करने का मानसिक दबाब बनाते रहे, तब भी मीराँ अपने हठ, ईमान और निर्णय से नहीं हिली और कहती है कि, मैं सच कहती हूँ कि मैं गुरु रविदास जी से बिमुख नहीं हूँगी। पिताजी आप जहर का प्याला भर कर दे दो, मैं फटाफट उठा कर पी लूंगी। ये सगे संबधी माता-पिता और संसार सब झूठ है, इस पराए देश में रह कर फिर भी, मुझे जो सत्य का बाजार है वहीं जाना पड़ेगा। यहाँ रह कर दुख ही मिलते हैं, आप की अच्छी बुरी बातें सुन सुन कर बचती फिरती हूँ और सहन करती रहती हूँ। यदि पिता जी आप मुझे जहर दे दें, तो मैं आप का लाख लाख धन्यवाद करूंगी। मरने से पहले मरूंगी तभी गुरु रविदास जी महाराज के दर्शन कर सकूंगी। इस जहर के प्याले में सच्चे सतगुरु रविदास बैठे हुए हैं वे सत्य का सौदा तोल रहे हैं, जिन की मूर्ति मुंह के आगे रख कर मैं बैठती हूँ। सुनो पिता जी, फिर भी मौत का प्याला पीना ही तो है, ये सारी दुनिया नश्वर ही लगती है, कितने दिनों तक जीवित रहना है, ये देश छोड़ना तो है ही। अंत में मरने वाला नगारा बजना तो आप के पास है ही, पिता जी जो जो अच्छा लग रहा है, वही मैं कह रही हूँ क्योंकि आप कहते हो कि, गुरु रविदास जी अछूत हैं उनके दरबार में मत जाओ मगर जो उन के दरबार में जाता है उन्हें चारों पदार्थ मिलते हैं। मर जाने के बाद सच के दरबार में कोई जातपात नहीं ढूंढता है, ईशरदास जी के शब्दों में मीरांबाई, गुरु रविदास महाराज के बिना अधूरी अधूरी हो कर परेशान है।
                  ।। शब्द पीलो।।
मेरा अखीरी अज प्रणाम गुरुआ। होंणा चांहूंदी ना बेमुख गुरां वल्लों पी लँऊ नाम तेरा लैके जाम गुरुआ। जीन्दी रही तां मिलूँगी कल परसों नहीं मिलांगे दरगाह दे धाम गुरुआ। जींदे दर तेरे मोई दर तेरे सभ सरवँस मेरा है दाम गुरुआ। पिआला विख दा रखिआ रीस कीती सरहा जग दी करे बदनाम गुरुआ। जिहनूँ लगे चिंनग प्रेम वाली नहीं बुझदी सुबह ते शाम गुरुआ। आह लै पी लिआ पिआला अज तेरे नाम दा जपूँ रविदास रविदास नाम गुरुआ।
मीरांबाई अपने पिता और भाई को कहती है कि, भगवान के दरबार में कोई भी जातपात को नहीं पूछता है। आज भी पिता जी और कल भी मरना ही है, तो आज ही क्यों ना मर जाऊं। अपने गुरु रविदास जी को अंतिम प्रणाम करती हुई मीराँ कहती है, कि गुरु जी आज मेरा अंतिम परिणाम स्वीकार कर लो। मैं आप से बिलकुल भी बिमुख तो होना नहीं चाहती थी मगर मुझे मरने के लिए विवश कर दिया है, जिस के कारण मैं, आप का नाम लेकर, आप के नाम का जाम, गुरुआ पी रही हूँ। अगर जीवित रही तो कल, परसों तक आप से मिलूँगी। अन्यथा गुरु जी हम दरगाह में बने महल में मिलेंगे। मैं जीवित भी और मर कर भी तेरे ही दर पर आ कर रहूंगी, गुरु जी मेरा सर्वस्व तेरा ही है। मेरे सामने जहर का प्याला भर कर रख दिया है, इन्होंने संसार के नियमों के रिवाजों पर चलना मन्जूर कर के, गुरुओं और शिष्यों के पवित्र रिश्तों को बदनाम कर दिया है। जिस को आत्मा में प्रेम की चिन्गारी लग जाती है गुरु जी, वह सुबह से शाम तक कभी भी बुझ नहीं पाती है। ये लो गुरुआ! मैं ने आप के नाम का जहर प्याला ले लिया! मैंने गुरु रविदास, गुरु रविदास जपते जपते पी लिआ है। 
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
नबंबर 03, 2020।

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