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Showing posts from June, 2020

।।गुरु रविदास महाराज बेताज चक्रबर्ती सम्राट।।

।। गुरु रविदास बेताज चक्रवर्ती विश्व सम्राट।। गुरु रविदास जी महाराज, चँवरवंशी सम्राट चँवरसेन के अमीर राजपरिवार में अवतरित हुए थे, जिनका इतिहास, सुशासन की अदभुत मिसाल थी, यही ऐसा राजवँश हुआ, जिसका इतिहास, खून खराबे से लथपथ नहीं हुआ था, इसी वंश ने विश्वबंधुता के सिद्धांतों के अनुसार शासन किया है। इनकी अमन, शांतप्रिय शासन पद्वतियों का युरेशयन लुटेरों ने, अनुचित लाभ उठाया जिससे मूलनिवासी, आज गुलामी की जिंदगी जीते आ रहे। सत्पुरुष हमेशा सत्यप्रिय वंशों में ही अवतरित होते हैं, इसी कड़ी में चँवर वंश में, युरेशयन, तुर्कों, हूणों, डचों, फ्रेंचों, मंगोलों, मुस्लिमों और अंग्रेजों के कुशासन से निजात दिलाने केलिये, शान्ति के मार्ग पर चलने वाले क्रांतिकारी, राजनेता, धार्मिक क्रान्ति के अग्रदूत, सामाजिक परिवर्तन के समाज सुधारक, मूलनिवासी संस्कृति को पुनर्जीवित करने वाले महापुरुष, गुरु रविदास जी ने बनारस की पवित्र धरती पर, सम्मत 1433 में अवतार लिया था। जब से युरेशयन लुटेरों ने भारत भूमि पर पदार्पण किया है, तब से ही भारत भूमि खून से नहाती आ रही है, विदेशी लुटेरों के आगमन का केंद्र बनी हुई है, जितने लु...

।।गुरु रविदास महाराज की धार्मिक क्रान्ति।।

    ।।गुरु रविदास और धार्मिक क्रान्ति।। गुरु रविदास जी महाराज से पूर्व, विश्व में चार महाशक्तियों का आविर्भाव हो चुका था, पहले थे आदिकाल के आरंभ में आदिपुरुष जिनके सपुत्र जुगाद हुए उसी चँवर वंश में सिद्ध चानो के बाद गुरु रविदास जी हुए, दूसरे पच्चीस सौ वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध, तीसरे पैगम्बर मुहम्मदुरसूलुल्लाह, चौथे ईसा मसीह, जिन्होंने भारत, अरब और यूरोप देशों में, धार्मिकता को स्थापित करने केलिये, जीवन कुर्बान किया था, जिनके अवसान के उपरांत, इन्हीं अवतारों को, धर्मों के गाड़ फादर घोषित करके, आदिधर्म, बौद्ध धर्म, इस्लाम धर्म और क्रिश्चन धर्म अस्तित्व में आए। इन चारों धर्मो और इनके मूलाधार अवतारों का यहाँ जिक्र करना इसलिए जरूरी है कि, इन्होंने भी गुरु रविदास जी से पहले आध्यात्मिक सिद्धांतों की शुरुआत की थी। बौद्ध धर्म, इस्लाम धर्म और क्रिश्चियन धर्मो के सिद्धांतों को लेकर इन महापुरुषों ने, जो धार्मिक आंदोलन शुरू किए थे, अपने मतों का जो प्रचार-प्रसार किया, उनके बाद उन्हींके शिष्यों में धार्मिक मतभेदों के कारण जो वैचारिक टकराब हुए उनके परिणाम सन्तोषजनक नहीं निकले। इन विचारधाराओं के ज...

।।गुरु रविदास की तर्कहीन मनुस्मृति क्रान्ति।।

  ।।गुरु रविदास और सामाजिक क्रांति।। ।। भाग तीन।। गुरु रविदास जी महाराज ने, आडंबरवाद का तर्क के आधार पर पोस्टमॉर्टम करना जारी रखा हुआ था, जिसके लिये उन्होंने विश्व स्तर पर क्रांतिकारी अभियान को तेज कर दिया था।उन्होंने बड़ी नजदीक से, हरिद्वार के पंडों को जनता को लूटते हुए देखा था, जिसके कारण उन्हें, उनकी नेचर और कार्य शैली का पूर्ण आभास हो गया था इसीलिए, उनकी कमियों का अहसास करवाते हुए, वे अत्यंत कड़े शव्दों में कहते हैं:---- पांडे ! हरि बीच अन्तर डाढ़ा।। मुंड मुंडावै सेवा पूजा पाठ का भरम बंधन गाड़ा।टेक। माला तिलक मनोहर बाणों, लागो जम की गहो पासी।। कोउ हरि सेती जोड़ियो चाहो, तो जग सो रहो उदासी। भुख ना भाजै त्रिषणा ना जाई, कहो कौन कबन गुण होई।। जो दधि में कांजी कोउ जावण, तो घृत ना काढे कोई।। करनी कथनी ज्ञान अचारा, भगति इनहुँ सों नियारी। दोय घोड़ा चढ़ी कोउ ना पहुँचे, सतगुर कहै पुकारी। जोऊ दासा तण कियो चाहो, आस भगति की होई। तो निरमल सांग मगन हवै, नाचो लाज शर्म सब खोई। कोई दादो कोई साधो, कुटिल कूड़ नीति सह मारिया। कहे रविदास होंउँ ना कहत, होंउँ एकादस्त पुकारिया।। ...

।।गुरु रविदास की आडंबर विरोधी क्रान्ति।।

  ।।गुरु रविदास और सामाजिक क्रांति।। ।। भाग तीन।। गुरु रविदास जी महाराज ने, आडंबरवाद का तर्क के आधार पर पोस्टमॉर्टम करना जारी रखा हुआ था, जिसके लिये उन्होंने विश्व स्तर पर क्रांतिकारी अभियान को तेज कर दिया था।उन्होंने बड़ी नजदीक से, हरिद्वार के पंडों को जनता को लूटते हुए देखा था, जिसके कारण उन्हें, उनकी नेचर और कार्य शैली का पूर्ण आभास हो गया था इसीलिए, उनकी कमियों का अहसास करवाते हुए, वे अत्यंत कड़े शव्दों में कहते हैं:---- पांडे ! हरि बीच अन्तर डाढ़ा।। मुंड मुंडावै सेवा पूजा पाठ का भरम बंधन गाड़ा।टेक। माला तिलक मनोहर बाणों, लागो जम की गहो पासी।। कोउ हरि सेती जोड़ियो चाहो, तो जग सो रहो उदासी। भुख ना भाजै त्रिषणा ना जाई, कहो कौन कबन गुण होई।। जो दधि में कांजी कोउ जावण, तो घृत ना काढे कोई।। करनी कथनी ज्ञान अचारा, भगति इनहुँ सों नियारी। दोय घोड़ा चढ़ी कोउ ना पहुँचे, सतगुर कहै पुकारी। जोऊ दासा तण कियो चाहो, आस भगति की होई। तो निरमल सांग मगन हवै, नाचो लाज शर्म सब खोई। कोई दादो कोई साधो, कुटिल कूड़ नीति सह मारिया। कहे रविदास होंउँ ना कहत, होंउँ एकादस्त पुकारिया।। ...

।।गुरु रविदास जी की जातिपाति खंडन क्रान्ति।।

 ।।गुरु रविदास की जातिपाति खंडन क्रांति ।। गुरु रविदास जी महाराज ने, शांतिपूर्ण, क्रान्ति की कड़ी में जो अत्यंत क्रांतिकारी कदम उठाया, वह था भारतीय जातिपाति का खंडन। गुरु जी का दर्शन प्रकृति के नियमों पर आधारित है। उनका मानना था कि जातियां तो पशुओं, वन्य प्राणियों, जलजीवों की ही हो सकतीं हैं, क्योंकि उनकी बोली, भाषा, अक्ल-शक्ल, रहन-सहन खाना-पीना अलग-अलग है, जबकि मॉनव के शरीर की बनाबट एक जैसी ही है, सभी अंग प्रत्यंग, नयन-नक्श एक समान है, फिर इंसानों की जातियां अलग, अलग क्यों ? अमीर-गरीब क्यों ? ऊंच-नीच क्यों ? छूत-अछूत क्यों ? इसीलिये उन्होंने जातपात का तर्कपूर्ण खंडन करके इंसान को इंसान बनकर रहने केलिये, समरसता का पाठ पढ़ाया:----- ब्राह्मण खत्री वैश सूद रविदास जन्म ते नाहिं। जौ चाहि सुबरन कोउ, पावई करमन माहिं।। गुरु जी फरमाते हैं कि, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, सूद कोई भी जन्म से नहीं है, सभी वर्ण जिस व्यवसाय को अपनाते है, वह उसका भरण पोषण का साधन मात्र ही है, वह उसकी जाति नहीं बन जाती। जातपात मत पूछिए, का है जात अरु पात। रविदास पूत सब प्रभुके,कोउ नहीं जात कुजात। गुरु जी समझात...

।।गुरु रविदास जी और सामाजिक क्रांति।।

    ।।गुरु रविदास और सामाजिक क्रांति।। गुरु रविदास जी ने अनुभव किया था कि, केवल भारत ही नहीं अपितु, समस्त विश्व, जातीय वर्ण- भेद, ऊंच-नीच, काले-गोरे, यूरोप-एशिया के अर्थहीन मूल्यों के कारण, विभाजित है, जिसे एक सूत्र में बांधने केलिये, प्रयास करना चाहिये।गुरु रविदास जी ने, सामाजिक मान्यताओं के विभिन्नताओं को ही मॉनव की एकता के रास्ते मे बाधा समझा। उन्होंने समझा कि, जब तक ये सामाजिक बाधाएं नहीं मिटेंगी तब तक, आपस में एक दूसरे को मॉनव जाति समझकर, सुखी नहीं रह सकेगा और आपस में कटता-फटता ही रहेगा। भारत में इंसान ही इंसान को हेय मानकर, उसके गले में हांडी बांध कर, पीठ के पीछे झाड़ू बांध कर चलने केलिये विवश किए हुए है, धार्मिक ज्ञान सुनने पर, इंसान के कानों में इंसान ही सिक्का भरता जाता है, इंसान की ओर देखने पर, इंसान ही इंसान की आंखें निकाल देता है, ऊंचे स्थान पर बैठने पर कीलें गाड़ी जाती, इंसान ने इंसान को गुलाम बनाकर रखा हुआ है, नंगे भूखे रखकर सारा दिन काम लेकर शाम को, केवल रूखी सुखी रोटी, लस्सी औऱ साग के साथ खाने केलिये दिया जाता है। गुरु रविदास जी ने गुलामी को पाप बताते हुए कहा:-...

।।गुरु रविदास जी क्रांतिकारी महाऋषि।।

    ।।गुरु रविदास क्रांतिकारी महाऋषि।। गुरु रविदास जी महाराज, बेताज विश्व चक्रवर्ती सम्राट हुए हैं, जिसके प्रमाण तत्कालीन राजे, महाराजे और बादशाह हुए हैं। प्रसिद्ध कांशी नरेश नागरमल उर्फ हरदेवसिंह, राजा बघेलसिंह, राणा कुंभसिंह, राणा रॉयमल, राणा संग्रामसिंह, राणा बिकमादित्य, कुंबर भोजराज।।गुरु रविदास और पराधीनता मुक्त क्रान्ति।। गुरु रविदास जी महाराज के, वहुद्देशीय, बहुमुखी क्रांतिकारी आंदोलन का महत्वपूर्ण विषय था, युरेशयन की पराधीनता को नेशतनाबूद करके मूलनिवासियों को स्वतंत्र करवाना था, क्योंकि मूलनिवासियों के ऊपर धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक गुलामियों को थोंप कर, शूद्र वर्ण को केवल सेवादार बनाकर रखा गया है, वे जानते थे, कि वहुजन समाज की सभी समस्याओं का मूल कारण केवल मुसलमान और राजाओँ की दोहरी पराधीनता ही है और वह भी सबसे अधिक क्रूर ब्राह्मणों की। तीनों वर्णों को शिक्षा, शास्त्रविद्या से वंचित रखा गया है, तीनों वर्णों को शिक्षा विहीन रखा गया है क्योंकि वे कहते हैं कि :---- सत विद्या को पढ़े, जउ प्राप्त करै सदा गिआन। रविदास, बिन विद्या के ,नर कु जा...

।।गुरु रविदास क्रांतिकारी विश्व चक्रवर्ती सम्राट।।

     ।।गुरु रविदास विश्व चक्रवर्ती सम्राट। गुरु रविदास जी महाराज, बेताज विश्व चक्रवर्ती सम्राट हुए हैं, जिसके प्रमाण तत्कालीन राजे, महाराजे और बादशाह हुए हैं। प्रसिद्ध कांशी नरेश नागरमल उर्फ हरदेवसिंह, राजा बघेलसिंह, राणा कुंभसिंह, राणा रॉयमल, राणा संग्रामसिंह, राणा बिकमादित्य, कुंबर भोजराज।।गुरु रविदास और पराधीनता मुक्त क्रान्ति।। गुरु रविदास जी महाराज के, वहुद्देशीय, बहुमुखी क्रांतिकारी आंदोलन का महत्वपूर्ण विषय था, युरेशयन की पराधीनता को नेशतनाबूद करके मूलनिवासियों को स्वतंत्र करवाना था, क्योंकि मूलनिवासियों के ऊपर धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक गुलामियों को थोंप कर, शूद्र वर्ण को केवल सेवादार बनाकर रखा गया है, वे जानते थे, कि वहुजन समाज की सभी समस्याओं का मूल कारण केवल मुसलमान और राजाओँ की दोहरी पराधीनता ही है और वह भी सबसे अधिक क्रूर ब्राह्मणों की। तीनों वर्णों को शिक्षा, शास्त्रविद्या से वंचित रखा गया है, तीनों वर्णों को शिक्षा विहीन रखा गया है क्योंकि वे कहते हैं कि :---- सत विद्या को पढ़े, जउ प्राप्त करै सदा गिआन। रविदास, बिन विद्या के ...

।।गुरु रविदास और पराधीनता मुक्त क्रान्ति।

।।गुरु रविदास और पराधीनता मुक्त क्रान्ति।। गुरु रविदास जी महाराज के, वहुद्देशीय, बहुमुखी क्रांतिकारी आंदोलन का महत्वपूर्ण विषय था, युरेशयन की पराधीनता को नेशतनाबूद करके मूलनिवासियों को स्वतंत्र करवाना था, क्योंकि मूलनिवासियों के ऊपर धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक गुलामियों को थोंप कर, शूद्र वर्ण को केवल सेवादार बनाकर रखा गया है, वे जानते थे, कि वहुजन समाज की सभी समस्याओं का मूल कारण केवल मुसलमान और राजाओँ की दोहरी पराधीनता ही है और वह भी सबसे अधिक क्रूर ब्राह्मणों की। तीनों वर्णों को शिक्षा, शास्त्रविद्या से वंचित रखा गया है, तीनों वर्णों को शिक्षा विहीन रखा गया है क्योंकि वे कहते हैं कि :---- सत विद्या को पढ़े, जउ प्राप्त करै सदा गिआन। रविदास, बिन विद्या के ,नर कु जान अनजान।। गुरु रविदास जी जानते थे कि, ब्राह्मणों ने ही, वीर राजपूतों को भी बुरी तरह गुलाम बनाने केलिये शास्त्र विद्या से वंचित रखकर, शस्त्र विद्या तक ही सीमित रखा हुआ है और उनकी जनसंख्या कम करने लिए, उन्हें ही युद्धों में झोंकने की नीति बनाई हुई है। उन्होंने, वाणियों को भी शास्त्रों की शिक्षा प...

।।गुरु रविदास जी और मूलनिवासी शूरवीर।।

।।गुरु रविदास और मूलनिवासी शूरवीर।। गुरु रविदास जी महाराज के समय तक, किसी भी मूलनिवासी शूरवीर की गाथा सुनने केलिये, उपलब्ध नहीं है, होंगी तो सही मगर ब्राह्मण लेखकों ने कहीं भी किसी भी पुस्तक में, उनका जिक्र तक, कभी नहीं किया है, इसी कारण कोरेगांव की घटना का हमें, अभी पता चला, जब उस विराट विजय के दो सौ साल बीत चुके हैं। भारत के लेखकों ने कभी हमारे वीर योद्धाओं औऱ महापुरुषों को लाइमलाइट में लाने का प्रयास नहीं किया जिसके कारण वे भूतकाल के गर्त में डुबो दिए गए। इस का मुख्य कारण यही रहा है कि, मूलनिवासियों के हाथ और कलम मनुस्मृतियों के काले कानूनों के द्वारा चलाना बन्द कर दिए थे। सिंधुघाटी की लिपि छीन ली थी, लिखने, पढ़ने का अधिकार छीन लिया था, जिस अधिकार को, गुरु रविदास जी ने, गुरमुखी लिपि ईजाद कर, खुद लिखकर, खुद पढ़, पढ़ाकर, पुनः स्थापित किया था। उसी कारण मूलनिवासी लेखन की पुनः शुरुआत हुई। गुरु रविदास जी ने, सबसे पहले ही, मनुबाद के खिलाफ़ झंडा उठाया, उसे लेकर, अकेले ही, ब्राह्मणवाद के अत्याचारों के खिलाफ भयानक जंग शुरू की मगर, हमारे आदिधर्मी, आदिवासी, मूलनिवासी, उनके ऐतिहासिक क्रांतिकारी आंद...

।।गुरु रविदास जी और मूलनिवासी साहित्य।।

 ।। गुरु रविदास और मूलनिवासी साहित्य।। ।।भाग दो।। गुरु रविदास जी महाराज से पूर्व, किसी भी मूलनिवासी लेखक, कवि, उपन्यासकार, संगीतकार, एकांकीकार, गद्यकार, नाटककार, आलोचक, का वर्णन नहीं मिलता है, जिसके बारे में हमारा कभी ध्यान नहीं गया। कबीर साहिब के दोहे ही हमें पढ़ने केलिये मिले, गुरु रविदास जी के बारे में तो कभी भी, कुछ भी पढ़ाया ही नहीं गया, शायद साहिवे कलाम मंगूराम मुगोबाल और बाबू जगजीवनराम जी के दबाब में, कांग्रेस सरकारों ने, गुरु रविदास जी बारे में, कुछ आंशिक रूप से पाठ्यक्रमों में, उनकी वाणी डाली थी। डाक्टर हजारीप्रसाद द्विवेदी ने, गुरु रविदास जी के अनुपम, अनूठे, अतुलनीय, आलौकिक, साहित्य के बारे में, लिख कर, अपना नाम कमाने केलिये, गुरु रविदास जी महाराज के, ऊपर थोड़ा वहुत काम किया है, मगर जब मूलनिवासी स्कॉलर गुरु रविदास जी के क्रांतिकारी कार्यों के बारे में खोजबीन करने लगे, तभी कुछ सत्य सामने आने लगे। हिन्दू कुलपतियों और गाइडों ने, मूलनिवासी शोधकर्ताओं की खोज में भी टांग अड़ाकर, उनसे एक आध अंश गलत दर्ज करवाकर ही, उनकी पीएचडी उपाधियां जारी होने दीं अन्यथा उन्...

।।गुरु रविदास जी और मूलनिवासी साहित्य।।

 ।। गुरु रविदास और मूलनिवासी साहित्य।। ।।भाग दो।। गुरु रविदास जी महाराज से पूर्व, किसी भी मूलनिवासी लेखक, कवि, उपन्यासकार, संगीतकार, एकांकीकार, गद्यकार, नाटककार, आलोचक, का वर्णन नहीं मिलता है, जिसके बारे में हमारा कभी ध्यान नहीं गया। कबीर साहिब के दोहे ही हमें पढ़ने केलिये मिले, गुरु रविदास जी के बारे में तो कभी भी, कुछ भी पढ़ाया ही नहीं गया, शायद साहिवे कलाम मंगूराम मुगोबाल और बाबू जगजीवनराम जी के दबाब में, कांग्रेस सरकारों ने, गुरु रविदास जी बारे में, कुछ आंशिक रूप से पाठ्यक्रमों में, उनकी वाणी डाली थी। डाक्टर हजारीप्रसाद द्विवेदी ने, गुरु रविदास जी के अनुपम, अनूठे, अतुलनीय, आलौकिक, साहित्य के बारे में, लिख कर, अपना नाम कमाने केलिये, गुरु रविदास जी महाराज के, ऊपर थोड़ा वहुत काम किया है, मगर जब मूलनिवासी स्कॉलर गुरु रविदास जी के क्रांतिकारी कार्यों के बारे में खोजबीन करने लगे, तभी कुछ सत्य सामने आने लगे। हिन्दू कुलपतियों और गाइडों ने, मूलनिवासी शोधकर्ताओं की खोज में भी टांग अड़ाकर, उनसे एक आध अंश गलत दर्ज करवाकर ही, उनकी पीएचडी उपाधियां जारी होने दीं अन्यथा उन्...

।।गुरु रविदास और मूलनिवासी साहित्य।।

                     ।।भाग एक।। गुरु रविदास जी महाराज से पूर्व, मूलनिवासियों की कोई साहित्यिक रचना मिलना दुर्लभ ही लगती हैं क्योंकि, गुरु जी के समय तक ब्राह्मणों के सिवाए, किसी मूलनिवासी को तो क्या, किसी राजपूत और वानिएं को भी शास्त्र विद्या हासिल करने, पढ़ने और लिखने का अधिकार था ही नहीं। मनुस्मृति के काले कानून के अनुसार, राजपूत केवल शस्त्र चलाना ही सीख सकता था, अक्षर ज्ञान हासिल नहीं कर सकता था, वाणियां भी केवल गिनती और वर्णमाला तक ही सीख सकता था। इसी कारण आज तक कोई भी राजपूत और वाणियां, उच्च कोटि का विद्वान, लेखक, कवि, साहित्यकार नहीं बन सका।आजादी के बाद मौलिक अधिकार मिले मगर राजसत्ता पुनः ब्राह्मणों ने अप्रत्यक्ष रूप से अपने ही हाथ रखी, जिसके कारण केवल भारतेन्दु हरिश्चंद्र, जय शंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामचन्द्र शुक्ल, आदि सभी ब्राह्मण ही उभारे गए। अखबारों के मालिक तो वाणियां ही रहे मगर उनके संपादक ब्राह्मण ही बनते रहे, जो हमारे जैसे अछूतों की रचनाओं को कभी भी अखबारों में नही छापते थे। जो ब्राह्मणों के ...

।।गुरु रविदास और उनकी हत्या लिखना एक षडयंत्र।।

गुरु रविदास जी महाराज,151 साल के वयोवृद्ध हो चुके थे, सम्मत 1583 में जब बाबर गुरु जी के दर्शन करने कांशी आया, उस समय गुरु रविदास जी इतने क्षीण हो चुके थे कि, वे बादशाह बाबर के साथ कोई लंबी चौड़ी वार्ता नहीं कर सके, लगता है कि गुरु जी इतने सक्षम नहीं थे कि, वे अपनी क्रांतिकारी वाणी में बाबर को झिड़कियां दे सकें, वे पानीपत के युद्ध में हुए रक्तप्रवाह से अति विदीर्ण हो गए थे, राणा सांगा और उसके राजपूत सैनिकों को तोप के गोलों से धराशायी करने के कारण, वे वहुत परेशान थे मगर उस समय वे कुछ भी बोलने में असमर्थ थे क्योंकि शरीर कुछ भी बोलने की अनुमती नहीं दे रहा था। इसीलिए जब बाबर उनके दर्शन करने केलिये वहां खड़ा था, उस समय वे बड़े ही अनमने ढंग से, बाबर के साथ पेश आए। गुरु जी ने बाबर के अभिवादन का उत्तर तो दिया, मगर उस पर मेहर भरी नजर नहीं डाली। बाबर के बार बार कुरेदने पर, गुरु जी ने उसे कहा, बाबर आपने पानीपत के युद्ध में जो खून बहाया है, उससे हम खुश नहीं हैं, क्या मिला तुझे बेगुनाहों का रक्तपात करके ? क्या आपको बेगुनाह सैनिकों की चीखें, आपके मन को वेचैन नहीं करतीं ? क्या उन माताओं के विलाप आपकी आत्...

।।गुरु रविदास जी और उन की हत्या का दुष्प्रचार।।

गुरु रविदास जी महाराज, के ज्योति, जोत में ब्रह्मलीन हो जाने को भी ब्राह्मण औऱ उनके टुकड़ों पर पलने वाले अछूत लेखकों ने, उनको दैवीय शक्तिहीन सिद्ध करने में कोई कसर नहीं छोड़ी हुई है, ऐसा लगता है कि ये लोग समझते हैं कि, हमारे जैसे लेखकों के सिवाए औऱ कोई ऐसा बुद्धिमान लेखक है, ही नहीं, जो हमारी गुरु रविदास विरोधी, काली करतूतों को समझ नहीं पाएंगे। कोई इनके लिखे काले चिठ्ठों का आलोचनात्मक अध्ययन करके विश्लेषण ही नहीं कर सकेंगे। जिन जिन लोगों ने हमारी जाति में जन्म लेकर राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ में काम किया है, जिन जिन स्कॉलरों ने अपने थीसिजों में, गुरु रविदास जी की हत्या का वर्णन किया है, मुझे लगता है कि, उन्होंने ब्राह्मणवादी कुलपतियों के परेशान करने पर, गुरु रविदास जी की हत्या का कलंक अपने शोध पत्रों में लिखकर, थिशिज अपरूब करबाए हैं, मगर उन्होंने ये तनिक नहीं सोचा कि, एक सौ इक़ाबन वर्षीय वृद्ध, जिनकी केबल मात्र हड्डियों ही शेष मात्र रह गईं थीं, केवल अस्थिपिंजर रह गया था, जिनके शरीर पर, तलवार चलाने केलिये, रंच मात्र भी मांस शेष नहीं था, उन्हें कत्ल करके दिखाना और लिखना क्या उन्हीं की मूर्खता ...

।गुरु रविदास और पोथीसाहिब, ब्राह्मण, विदेशी हमलाबर।

गुरु रविदास जी महाराज, के समकालीन शासक मुसलमान बादशाह ही थे। बादशाह शहाबुद्दीन गौरी ने सन 1202 में, भारत में गौरी साम्राज्य के शासन की नीँव डाली। सन 1175 ईस्वी में उसने मुलतान को जीता, 1178 ईस्वी में, गुजरात के पाटन पर आक्रमण किया, जिसमे वह बुरी तरह पराजित हुआ। सन 1191 में भी, वह पृथ्वीराज चौहान से हार गया मगर जब गौरी ने 1194 ईस्वी में पुनः, पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण करके उस को हराया और राजसत्ता छीनने के बाद, गोरी ने अपने सेनापतियों और ब्राह्मणों के सहयोग से, भारत के मूलनिवासी बुद्धिष्टों का नरसंहार करके, सारनाथ को मुर्दों का घाट बना दिया, जिसके बाद वह, अपने सेनापतियों को सता सौंप कर गजनी वापस चला गया। बाहरवीं शताव्दी से लेकर, ब्राह्मणों ने मुसलमान शासकों के साथ मिलकर, जो मूलनिवासियों के ऊपर, अत्याचार किए, उनका कत्लेआम किया, उसे सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ब्राह्मणों ने हमेशा राजसत्ता का ही साथ दिया, भले ही वे मुसलमान हों या अंग्रेज, मगर चौहदवीं शदी में, आदिपुरुष ने, जन रक्षक के रूप में गुरु रविदास जी को अपनी शक्तियां देकर, भारतीय जनता को, सुरक्षा प्रदान करने केलिये, अवतरित किया, ज...