।।गुरु रविदास और मूलनिवासी साहित्य।।
।।भाग एक।।
गुरु रविदास जी महाराज से पूर्व, मूलनिवासियों की कोई साहित्यिक रचना मिलना दुर्लभ ही लगती हैं क्योंकि, गुरु जी के समय तक ब्राह्मणों के सिवाए, किसी मूलनिवासी को तो क्या, किसी राजपूत और वानिएं को भी शास्त्र विद्या हासिल करने, पढ़ने और लिखने का अधिकार था ही नहीं। मनुस्मृति के काले कानून के अनुसार, राजपूत केवल शस्त्र चलाना ही सीख सकता था, अक्षर ज्ञान हासिल नहीं कर सकता था, वाणियां भी केवल गिनती और वर्णमाला तक ही सीख सकता था। इसी कारण आज तक कोई भी राजपूत और वाणियां, उच्च कोटि का विद्वान, लेखक, कवि, साहित्यकार नहीं बन सका।आजादी के बाद मौलिक अधिकार मिले मगर राजसत्ता पुनः ब्राह्मणों ने अप्रत्यक्ष रूप से अपने ही हाथ रखी, जिसके कारण केवल भारतेन्दु हरिश्चंद्र, जय शंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामचन्द्र शुक्ल, आदि सभी ब्राह्मण ही उभारे गए। अखबारों के मालिक तो वाणियां ही रहे मगर उनके संपादक ब्राह्मण ही बनते रहे, जो हमारे जैसे अछूतों की रचनाओं को कभी भी अखबारों में नही छापते थे। जो ब्राह्मणों के दलाल अछूत, गुरु रविदास जी, कबीर साहिब की क्रांतिकारी वाणी के खिलाफ कोई कमेंट करते थे, उन्हीं को वे उभारते रहे। उन्होंने ही गुरु रविदास जी को चर्मकार के रूप में लिखा और चित्रित किया।उन्हीं को ही सम्मानित किया, जो गुरु रविदास जी की हत्या सिद्ध करते रहे, उन्हें ही मीडिया में प्रचारित करते रहे।
अछूत ब्राह्मणवादी दलाल लेखकों ने, कभी भी ये खोज नहीं की, कि क्या कारण है, कि पचासी प्रतिशत मूल भारतीयों में से कोई भी उच्च कोटि का साहित्यकार क्यों नहीं हुआ ? बस इन सभी ब्राह्मणवादी दलालों की पुस्तकों को छपाने केलिये, ब्राह्मणवाद धन उपलब्ध करवाता रहा और उन्हीं की तर्ज पर लिखकर अपने ही गुरूओं, महापुरुषों के खिलाफ लिखकर, उनको मिट्टी में मिलाते रहे। सीएल चुंबर, लहोरी राम बाली आदि चंद साहित्यकारों ने मनुवाद की चीरफाड़ की, गुरूओं की क्रांतिकारी वाणी, और उनके साहित्य को अछूतों तक पहुंचाने का प्रयास किया, जिसके कारण उन्हें कई प्रकार की मुशीबतों का सामना करना पड़ा। कुछ वहुजन समाज के साहित्यकार जो स्वाभिमानी निकले, उन्हें दलित साहित्य अकादमी बनानी पड़ी, जिस मंच से वे अपनी आवाज बुलंद करने लगे मगर वे भी सरकारी सहायता के बिना अपना लक्ष्य पूर्ण नहीं कर सके। ऐसा केवल साहित्य के क्षेत्र में नहीं हुआ, खेल जगत में, सांस्कृतिक जगत में, विज्ञान जगत में, रोजगार क्षेत्र में ब्राह्मणों ने अछूतों को उभरने ही नहीं दिया।
कबीर साहिब मुसलमान परिवार से लिंक हो गए थे, जिन्हें मुसलमानों का प्रश्रय मिलता रहा, जिसके कारण उन्हें थोड़ा वहुत उभरने दिया गया, उनके साहित्य को जलाया नहीं गया, ना ही बर्बाद किया गया बल्कि उनकी वाणी को स्कूली पाठ्यक्रमों में भी शामिल किया जाता रहा मगर गुरु रविदास जी महाराज के पीछे किसी भी मनुबादी शासक का वरदहस्त नहीं था, जिसके कारण उनके समृद्ध साहित्य को नष्ट कर दिया गया, स्कूली पाठ्यक्रमों में तो नाममात्र का ही उनका परिचय दिया गया, जबकि गुरु रविदास जी ही भक्तिकाल के सर्वश्रेष्ठ, सन्त, गुरु, समाज सुधारक और क्रांतिकारी राजनेता, धार्मिक नेता, समाज सुधारक नेता थे। ब्राह्मणों ने उनके साथ अति अमानवीय व्यवहार किया। हर क़दम कदम पर उनके क्रांतिकारी आंदोलन के मार्ग में रोड़ा अटकाया। बेचारे नामदेव, सेन जी तो मॉनसिक और शारीरिक रूप से, इतने सक्षम नहीं थे, कि वे ब्राह्मणवाद का सामना कर सकते, इसीलिए वे अधिक उग्र नहीं हो सकें। गुरु रविदास जी साधन संपन्न, अमीर परिवार से संबध रखते थे, वे अपनी आय से निर्वाह कर लेते थे, जिस कारण उन्हें ब्राह्मणवाद के ऊपर निर्भर नहीं होना पड़ा। गुरु रविदास जी थे भी, आध्यात्मिक शक्ति संपन्न, जिसके कारण भी, ब्राह्मणवाद उनसे भयभीत हो चुका था। गुरु जी ने ब्राह्मणों की जो बखियाँ उधेड़ीं, उससे ब्राह्मण एकजुट होकर उनके खिलाफ लामबंद हो गए थे, मगर बाबजूद इसके इन्होंने, गुरु जी से हर क्षेत्र में बुरी तरह से मुंह की खाई, परन्तु फिर भी ये गुरु रविदास जी के खिलाफ बड़ी बेशर्मी से डटे रहे और बार बार गुरु जी से पंगे लेते रहे, राजे, महाराजे, राजपूत, वानिएं और मुस्लिम बादशाह भी ब्राह्मणों की मक्कारी को अच्छी तरह से समझते थे और उन का दिमागी दिवाला निकालने केलिये, गुरु रविदास जी महाराज का सहारा लेते रहे। जब भी ब्राह्मण, गुरु रविदास जी के खिलाफ, राजाओं, बादशाहों की अदालत में उजर करते, फरियादें करते, शासक तत्काल गुरु जी को दरवारों में हाजर होने केलिये आदेश दिया करते थे। वे गुरु रविदास जी को बड़े ही आदर, सत्कार, सम्मान से, बुलाकर कड़ी से कड़ी परीक्षा में उलझा देते, ताकि ब्राह्मण भी उन समस्याओं को प्रमाणित करके दिखाएं। जब ये प्रकांड पँडित प्रमाणित नहीं कर पाते थे तब सभी उल्लुओं की तरह मुंह लटकाए हुए, राज दरबारों से भाग जाया करते।
इन्हीं परीक्षाओं के समय, जो जो रचनाऐं गुरु रविदास जी रचते और तत्काल वहीं उन्हीं शव्दों को अत्यंत सुरीली आवाज में गाया भी करते थे, उससे वे एक सशक्त गीतकार, कवि, लेखक और साहित्यकार बनकर उभरते गए। गुरु जी ने साहित्य की हर विधा पर अपनी लेखनी चलाकर, अपनी तीव्र बुद्धि और पांडित्य भी सिद्ध किया, अपनी आध्यात्मिक शक्ति भी दिखाई, अपनी कुशाग्र बुद्धि भी दिखाई मगर ब्राह्मण पिछले गुजरे समय के, पिछले अनपढ़ अछूतों के भुलाबे में, गुरु रविदास जी से पंगे लेकर, ये ब्राह्मण भरी सभाओं और राजदरबारों में जलील होते रहे, बुरी तरह अपमानित होते रहे, बुरी तरह पराजित होते रहे मगर अपनी मक्कारी ना तब त्यागी, ना ही अब त्याग रहे। ब्राह्मणों का सारा इतिहास, गुरु रविदास जी से खाई हुए हारों से भरा पड़ा है परंतु, ये आज तक भी नहीं सुधरे और ना ही अपने आपको परिवर्तित कर रहे। आज पढ़-लिख कर भी ये लोग जातपात को बढ़ाबा देते ही जा रहे, प्रधानमंत्री इदिरा गांधी, उपप्रधानमंत्री जगजीवनराम, रास्ट्रपति रामनाथ कोविंद को भी, इन लोगों ने मदिरों में प्रवेश करने नहीं दिया मगर ये शक्तिमान राजनेता बोट की राजनीति के कारण अपने साथ हुए, अपमान को निगलते गए मगर कोई कड़ा कदम नहीं उठा सके। आज कोरोना वायरस ने संसार को निगलना शुरू किया हुआ है, चीन, अमेरिका, स्पेन, इटली, भारत, जर्मन, पाकिस्तान, लंका, में लाखों लोगों को मौत के घाट उतार चुका है, करोड़ों इसकी चपेट में हैं मगर फिर भी ये मदिराधीश मठाधीश भगवान से डर कर, होश में नही आ रहे। मदिरों से भागकर, नाकों में मास्क बांध कर अपने अपने घरों में लाकडाउन हो गए हैं और देवता मदिरों में अकेले बैठकर, नंगे भूखे पड़े हुए हैं, जिनका कोई भी बाली वारिश नजर नहीं आ रहा और ना ही वे भी कोरोना वायरस को रोक रहे, रोकें भी क्यों, क्योंकि वे भी बेचारे एक जाति के होकर गुलाम बनकर रह गए थे।
।।सोहम।।जय गुरुदेव।।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
गुरु रविदास जी महाराज से पूर्व, मूलनिवासियों की कोई साहित्यिक रचना मिलना दुर्लभ ही लगती हैं क्योंकि, गुरु जी के समय तक ब्राह्मणों के सिवाए, किसी मूलनिवासी को तो क्या, किसी राजपूत और वानिएं को भी शास्त्र विद्या हासिल करने, पढ़ने और लिखने का अधिकार था ही नहीं। मनुस्मृति के काले कानून के अनुसार, राजपूत केवल शस्त्र चलाना ही सीख सकता था, अक्षर ज्ञान हासिल नहीं कर सकता था, वाणियां भी केवल गिनती और वर्णमाला तक ही सीख सकता था। इसी कारण आज तक कोई भी राजपूत और वाणियां, उच्च कोटि का विद्वान, लेखक, कवि, साहित्यकार नहीं बन सका।आजादी के बाद मौलिक अधिकार मिले मगर राजसत्ता पुनः ब्राह्मणों ने अप्रत्यक्ष रूप से अपने ही हाथ रखी, जिसके कारण केवल भारतेन्दु हरिश्चंद्र, जय शंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामचन्द्र शुक्ल, आदि सभी ब्राह्मण ही उभारे गए। अखबारों के मालिक तो वाणियां ही रहे मगर उनके संपादक ब्राह्मण ही बनते रहे, जो हमारे जैसे अछूतों की रचनाओं को कभी भी अखबारों में नही छापते थे। जो ब्राह्मणों के दलाल अछूत, गुरु रविदास जी, कबीर साहिब की क्रांतिकारी वाणी के खिलाफ कोई कमेंट करते थे, उन्हीं को वे उभारते रहे। उन्होंने ही गुरु रविदास जी को चर्मकार के रूप में लिखा और चित्रित किया।उन्हीं को ही सम्मानित किया, जो गुरु रविदास जी की हत्या सिद्ध करते रहे, उन्हें ही मीडिया में प्रचारित करते रहे।
अछूत ब्राह्मणवादी दलाल लेखकों ने, कभी भी ये खोज नहीं की, कि क्या कारण है, कि पचासी प्रतिशत मूल भारतीयों में से कोई भी उच्च कोटि का साहित्यकार क्यों नहीं हुआ ? बस इन सभी ब्राह्मणवादी दलालों की पुस्तकों को छपाने केलिये, ब्राह्मणवाद धन उपलब्ध करवाता रहा और उन्हीं की तर्ज पर लिखकर अपने ही गुरूओं, महापुरुषों के खिलाफ लिखकर, उनको मिट्टी में मिलाते रहे। सीएल चुंबर, लहोरी राम बाली आदि चंद साहित्यकारों ने मनुवाद की चीरफाड़ की, गुरूओं की क्रांतिकारी वाणी, और उनके साहित्य को अछूतों तक पहुंचाने का प्रयास किया, जिसके कारण उन्हें कई प्रकार की मुशीबतों का सामना करना पड़ा। कुछ वहुजन समाज के साहित्यकार जो स्वाभिमानी निकले, उन्हें दलित साहित्य अकादमी बनानी पड़ी, जिस मंच से वे अपनी आवाज बुलंद करने लगे मगर वे भी सरकारी सहायता के बिना अपना लक्ष्य पूर्ण नहीं कर सके। ऐसा केवल साहित्य के क्षेत्र में नहीं हुआ, खेल जगत में, सांस्कृतिक जगत में, विज्ञान जगत में, रोजगार क्षेत्र में ब्राह्मणों ने अछूतों को उभरने ही नहीं दिया।
कबीर साहिब मुसलमान परिवार से लिंक हो गए थे, जिन्हें मुसलमानों का प्रश्रय मिलता रहा, जिसके कारण उन्हें थोड़ा वहुत उभरने दिया गया, उनके साहित्य को जलाया नहीं गया, ना ही बर्बाद किया गया बल्कि उनकी वाणी को स्कूली पाठ्यक्रमों में भी शामिल किया जाता रहा मगर गुरु रविदास जी महाराज के पीछे किसी भी मनुबादी शासक का वरदहस्त नहीं था, जिसके कारण उनके समृद्ध साहित्य को नष्ट कर दिया गया, स्कूली पाठ्यक्रमों में तो नाममात्र का ही उनका परिचय दिया गया, जबकि गुरु रविदास जी ही भक्तिकाल के सर्वश्रेष्ठ, सन्त, गुरु, समाज सुधारक और क्रांतिकारी राजनेता, धार्मिक नेता, समाज सुधारक नेता थे। ब्राह्मणों ने उनके साथ अति अमानवीय व्यवहार किया। हर क़दम कदम पर उनके क्रांतिकारी आंदोलन के मार्ग में रोड़ा अटकाया। बेचारे नामदेव, सेन जी तो मॉनसिक और शारीरिक रूप से, इतने सक्षम नहीं थे, कि वे ब्राह्मणवाद का सामना कर सकते, इसीलिए वे अधिक उग्र नहीं हो सकें। गुरु रविदास जी साधन संपन्न, अमीर परिवार से संबध रखते थे, वे अपनी आय से निर्वाह कर लेते थे, जिस कारण उन्हें ब्राह्मणवाद के ऊपर निर्भर नहीं होना पड़ा। गुरु रविदास जी थे भी, आध्यात्मिक शक्ति संपन्न, जिसके कारण भी, ब्राह्मणवाद उनसे भयभीत हो चुका था। गुरु जी ने ब्राह्मणों की जो बखियाँ उधेड़ीं, उससे ब्राह्मण एकजुट होकर उनके खिलाफ लामबंद हो गए थे, मगर बाबजूद इसके इन्होंने, गुरु जी से हर क्षेत्र में बुरी तरह से मुंह की खाई, परन्तु फिर भी ये गुरु रविदास जी के खिलाफ बड़ी बेशर्मी से डटे रहे और बार बार गुरु जी से पंगे लेते रहे, राजे, महाराजे, राजपूत, वानिएं और मुस्लिम बादशाह भी ब्राह्मणों की मक्कारी को अच्छी तरह से समझते थे और उन का दिमागी दिवाला निकालने केलिये, गुरु रविदास जी महाराज का सहारा लेते रहे। जब भी ब्राह्मण, गुरु रविदास जी के खिलाफ, राजाओं, बादशाहों की अदालत में उजर करते, फरियादें करते, शासक तत्काल गुरु जी को दरवारों में हाजर होने केलिये आदेश दिया करते थे। वे गुरु रविदास जी को बड़े ही आदर, सत्कार, सम्मान से, बुलाकर कड़ी से कड़ी परीक्षा में उलझा देते, ताकि ब्राह्मण भी उन समस्याओं को प्रमाणित करके दिखाएं। जब ये प्रकांड पँडित प्रमाणित नहीं कर पाते थे तब सभी उल्लुओं की तरह मुंह लटकाए हुए, राज दरबारों से भाग जाया करते।
इन्हीं परीक्षाओं के समय, जो जो रचनाऐं गुरु रविदास जी रचते और तत्काल वहीं उन्हीं शव्दों को अत्यंत सुरीली आवाज में गाया भी करते थे, उससे वे एक सशक्त गीतकार, कवि, लेखक और साहित्यकार बनकर उभरते गए। गुरु जी ने साहित्य की हर विधा पर अपनी लेखनी चलाकर, अपनी तीव्र बुद्धि और पांडित्य भी सिद्ध किया, अपनी आध्यात्मिक शक्ति भी दिखाई, अपनी कुशाग्र बुद्धि भी दिखाई मगर ब्राह्मण पिछले गुजरे समय के, पिछले अनपढ़ अछूतों के भुलाबे में, गुरु रविदास जी से पंगे लेकर, ये ब्राह्मण भरी सभाओं और राजदरबारों में जलील होते रहे, बुरी तरह अपमानित होते रहे, बुरी तरह पराजित होते रहे मगर अपनी मक्कारी ना तब त्यागी, ना ही अब त्याग रहे। ब्राह्मणों का सारा इतिहास, गुरु रविदास जी से खाई हुए हारों से भरा पड़ा है परंतु, ये आज तक भी नहीं सुधरे और ना ही अपने आपको परिवर्तित कर रहे। आज पढ़-लिख कर भी ये लोग जातपात को बढ़ाबा देते ही जा रहे, प्रधानमंत्री इदिरा गांधी, उपप्रधानमंत्री जगजीवनराम, रास्ट्रपति रामनाथ कोविंद को भी, इन लोगों ने मदिरों में प्रवेश करने नहीं दिया मगर ये शक्तिमान राजनेता बोट की राजनीति के कारण अपने साथ हुए, अपमान को निगलते गए मगर कोई कड़ा कदम नहीं उठा सके। आज कोरोना वायरस ने संसार को निगलना शुरू किया हुआ है, चीन, अमेरिका, स्पेन, इटली, भारत, जर्मन, पाकिस्तान, लंका, में लाखों लोगों को मौत के घाट उतार चुका है, करोड़ों इसकी चपेट में हैं मगर फिर भी ये मदिराधीश मठाधीश भगवान से डर कर, होश में नही आ रहे। मदिरों से भागकर, नाकों में मास्क बांध कर अपने अपने घरों में लाकडाउन हो गए हैं और देवता मदिरों में अकेले बैठकर, नंगे भूखे पड़े हुए हैं, जिनका कोई भी बाली वारिश नजर नहीं आ रहा और ना ही वे भी कोरोना वायरस को रोक रहे, रोकें भी क्यों, क्योंकि वे भी बेचारे एक जाति के होकर गुलाम बनकर रह गए थे।
।।सोहम।।जय गुरुदेव।।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
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