।।गुरु रविदास की तर्कहीन मनुस्मृति क्रान्ति।।

  ।।गुरु रविदास और सामाजिक क्रांति।।
।। भाग तीन।।
गुरु रविदास जी महाराज ने, आडंबरवाद का तर्क के आधार पर पोस्टमॉर्टम करना जारी रखा हुआ था, जिसके लिये उन्होंने विश्व स्तर पर क्रांतिकारी अभियान को तेज कर दिया था।उन्होंने बड़ी नजदीक से, हरिद्वार के पंडों को जनता को लूटते हुए देखा था, जिसके कारण उन्हें, उनकी नेचर और कार्य शैली का पूर्ण आभास हो गया था इसीलिए, उनकी कमियों का अहसास करवाते हुए, वे अत्यंत कड़े शव्दों में कहते हैं:----
पांडे ! हरि बीच अन्तर डाढ़ा।।
मुंड मुंडावै सेवा पूजा पाठ का भरम बंधन गाड़ा।टेक।
माला तिलक मनोहर बाणों, लागो जम की गहो पासी।।
कोउ हरि सेती जोड़ियो चाहो, तो जग सो रहो उदासी।
भुख ना भाजै त्रिषणा ना जाई, कहो कौन कबन गुण होई।।
जो दधि में कांजी कोउ जावण, तो घृत ना काढे कोई।।
करनी कथनी ज्ञान अचारा, भगति इनहुँ सों नियारी।
दोय घोड़ा चढ़ी कोउ ना पहुँचे, सतगुर कहै पुकारी।
जोऊ दासा तण कियो चाहो, आस भगति की होई।
तो निरमल सांग मगन हवै, नाचो लाज शर्म सब खोई।
कोई दादो कोई साधो, कुटिल कूड़ नीति सह मारिया।
कहे रविदास होंउँ ना कहत, होंउँ एकादस्त पुकारिया।।
गुरु रविदास जी ने, पंडों और भगवान के बीच वहुत बड़ा अंतर बताया है, उन्होंने मुंड मुंड़ाने, जपमाला, तिलक आदि को गले की फास ही बताया है, जिससे केवल सँगत को मूर्ख बनाकर, ये लोग अपना पेट पालने का काम ही करते हैं। गुरु रविदास जी ने इन्हीं बुराइयों पर कुठाराघात करके, पंडों के शोषण से सँगत को बचाने का प्रयास किया है, जिसके समर्थन में, डाक्टर मीना मिश्रा जी अपने रिसर्च थिसिज "सन्त साहित्य में मॉनव मूल्य पृष्ठ-12"पर लिखतीं हैं कि, सन्तों ने रूढ़िग्रस्त सामाजिक मान्यताओं पर तीव्र प्रहार किया है। धर्माचरण संबन्धी अन्यायों के विरुद्ध जोरदार आवाज, केवल सन्तों ने ही उठाई और सामाजिक रूढ़ियों को दूर करने का उपदेश भी सन्तों ने ही दिया। विसंगतियों के प्रति आज समाज की, जिस प्रकार राजनीतिक श्रमिक नेता, धर्म चिन्तक आवाज उठाते हैं, उसी प्रकार सभी सन्तों ने भी समाज को भ्रमजाल में फंसा देखकर, बारम्बार अनीतियों पर प्रहार किया था औऱ सामाजिक बुराइयों की निंदा की है, निर्गुणी सन्तों ने जो समाज में समन्वय स्थापित करने के लिए भावना प्रस्तुत की, कि वह सही दिशा में प्रशंसनीय औऱ सराहनीय है। इसी के पृष्ठ चार पर वे आगे लिखतीं हैं "सन्त कवियों की वाणी में वहुत ही अधिक निर्भीकता थी।उस निर्भीकता में स्वानुभूति और सत्य की वह प्रखरता थी कि परस्पर सँघर्ष औऱ द्वैष की अनल में दग्ध हिंदू और मुसलमान दोनों ने, इन कवियों को श्रद्धा एवं प्रेम के साथ अपना पथप्रदर्शक मॉन लिया।सन्तों द्वारा प्रस्तुत सामाजिक आदर्शों को पाकर निष्प्राण होता हुआ मध्ययुगीन भारतीय समाज एक बार पुनः नवजीवन औऱ नवज्योति से जगमगा उठा।
डाक्टर मीना जी ने, सन्त शिरोमणि गुरु रविदास जी के सामाजिक जीवन का सत्य उजागर किया है। गुरु रविदास जी ने सचमुच, अपना सम्पूर्ण जीवन पुराणपंथी रूढ़ियों को गंगा में प्रवाहित करने केलिये लगा दिया। जातिवाद, छुआछूत की कैद से अगर मूलनिवासी समाज को बाहर निकाला है, तो केवल गुरु रविदास, गुरु कबीर साहिब की जोड़ी ने ही निकाला है मगर कबीर साहिब लठ लेकर जोरदार प्रहार किया करते थे जबकि गुरु रविदास जी मार्मिक भावों में, अपनी मार्मिक वाणी के तीर छोड़कर, कातिल राजाओँ और बादशाहों को जख्मी किया करते थे, जो चित होते समय पानी तक नहीं मांगते थे। मीराबाई के कातिल मायके और सुसराल के लोग, रिश्तेदार सत्संग में छुरे तलबारें लेकर, घात लगाकर, सत्संग सुन रहे थे मगर जव पूज्य गुरु रविदास जी, कीर्तन के शव्द रूपी, वाण चलाने लगे, तो वे सभी कातिल आत्मविस्मृत हो गए, लयात्मक गायन में इतने खो गए कि उनके कंबलों में छुपे हथियार छूटकर धरा पर गिर पड़े, जिनकी टंकार (जोरदार आवाज) ने सभी के होश उड़ा दिए थे, मगर गुरु रविदास जी ने सभी को माफ करते हुए, उनके शुभ की ही कामना ही की। मीराबाई के कातिल भाई-बन्धु और देवर निष्प्राण होकर, गुरु रविदास जी के चरणकमलों पर गिर पड़े और गुरु दीक्षा लेकर ही अपने पाप कर्मों को मिटाया। सन्नाटे के बीच सत्संग समाप्त हुआ औऱ सभी गुरु जी की जय जयकार करते हुए विदा ही गए। थोथा ज्ञान रखने वाले द्वैषी, अज्ञानी लेखकों ने, गुरु रविदास जी को चर्मकार के रूप में ही पेश किया है और उन्होंने साहित्य में, लेखनी से लिखकर और गायकों ने लयात्मक धुन में गाकर अपनी जातीय भड़ास निकाली हुई हैं। फटे पुराने वस्त्र पहने हुए गुरु जी को कंगाल के रूप में दर्शाते आए हैं, कुछ ईर्ष्यालु लोग गुरु रविदास जी को अत्यंत निर्धन और अति गरीब बताकर अपनी नीचता प्रकट करते आए हैं मगर जब उनके गुणों का लाभ उठाना हो, तो यही महामूर्ख अंधभक्त उन्हें महात्मा बुद्ध ही कहते हैं, गुरु रविदास जी के आदर्शों औऱ सिद्धांतों को बुद्ध के ही आदर्श और सिद्धान्त सिद्ध करते नहीं थकते हैं, मगर वे ये भूल जाते है कि गुरु रविदास जी ने बुद्ध की सारी थ्यूरी को एक शव्द के माध्यम से बुरी तरह नकार दिया था, कि ईश्वर को देखे बिना इच्छा ही पैदा नहीं होती है जबकि बुद्ध ईश्वरीय शक्ति को नकारते हैं मगर सन्त शिरोमणि गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं:-----
बिन देखे ऊपजै नाहिं आसा।
जो दीसे सोई होई बनासा।।
बरन सहित नो जपै नामु।
सो जोगी केवल निहकामु।।
परचै रामु रवै जऊ कोई।
पारसु परसै दुविधा ना होई।।रहाउ।।
सो मुनि मन की दुविधा खाई।
बिनु दुआरे त्रे लोक समाई।
मन का सुभाऊ सभु कोई करै।
करता होई सु अनभै रहै।।
फल कारण फूली वनराई।
फलु लागि तबहुँ फूल बिलाई।।
गिआने कारन कर्म अभियासु।
गिआनु भया तह करमुंह नासु।।
घृत कारन दधि मथै सियान।
जीवित मुकत सदा निरबान।।
कही रविदास परम वैराग ।
हिरदै रामु की ना जपसी अभाग।।
गुरु रविदास जी ने इन्हीं पंक्तियों की तलवार से ही, सभी अनीश्वरवादी (जी ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानते) मतों को कत्ल कर दिया है, फिर ये लोग किस मुंह से गुरु रविदास जी की बराबरी करते हुए, गौतम बुद्ध से तुलना करते हैं। मेरा विचार है कि, ये लोग अपनी निराधार थ्यूरी को सत्य सिद्ध करने केलिये, गुरु रविदास जी की आध्यात्मिक शक्ति को भुना कर, अपनी बेतुकी काल्पनिक कथाओं को प्रमाणित करते हैं।
।।सोहम।।जय गुरुदेव।।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।

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