।गुरु रविदास और पोथीसाहिब, ब्राह्मण, विदेशी हमलाबर।

गुरु रविदास जी महाराज, के समकालीन शासक मुसलमान बादशाह ही थे। बादशाह शहाबुद्दीन गौरी ने सन 1202 में, भारत में गौरी साम्राज्य के शासन की नीँव डाली। सन 1175 ईस्वी में उसने मुलतान को जीता, 1178 ईस्वी में, गुजरात के पाटन पर आक्रमण किया, जिसमे वह बुरी तरह पराजित हुआ। सन 1191 में भी, वह पृथ्वीराज चौहान से हार गया मगर जब गौरी ने 1194 ईस्वी में पुनः, पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण करके उस को हराया और राजसत्ता छीनने के बाद, गोरी ने अपने सेनापतियों और ब्राह्मणों के सहयोग से, भारत के मूलनिवासी बुद्धिष्टों का नरसंहार करके, सारनाथ को मुर्दों का घाट बना दिया, जिसके बाद वह, अपने सेनापतियों को सता सौंप कर गजनी वापस चला गया।
बाहरवीं शताव्दी से लेकर, ब्राह्मणों ने मुसलमान शासकों के साथ मिलकर, जो मूलनिवासियों के ऊपर, अत्याचार किए, उनका कत्लेआम किया, उसे सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ब्राह्मणों ने हमेशा राजसत्ता का ही साथ दिया, भले ही वे मुसलमान हों या अंग्रेज, मगर चौहदवीं शदी में, आदिपुरुष ने, जन रक्षक के रूप में गुरु रविदास जी को अपनी शक्तियां देकर, भारतीय जनता को, सुरक्षा प्रदान करने केलिये, अवतरित किया, जिन्होंने ब्राह्मणवाद और मनुवाद के कफ़न में कीलें मारना शुरू कर दीं, जिससे बौखला कर, ब्राह्मण गुरु रविदास जी को अपना, नंबर एक दुश्मन मानने लगे। गुरु जी ब्राह्मणों के मानवता विरोधी धर्म ग्रँथों को रद्द करते जा रहे थे, अपनी तर्कशीलता से रचित वाणी रचते जा रहे थे, अपनी दैवीय शक्ति से ब्राह्मणवाद के षडयन्त्रों को बेनकाब करते जा रहे थे, जिससे भारत ही नहीं विश्व में, उथल पुथल शुरू हो गई। ब्राह्मणवाद ही नहीं मुसलमानवाद भी डगमगा गया। गुरु रविदास जी ने अपनी दैवीय क्रांतिकारी वाणी और बिना तीर तलवार, के ही मानव जाति को, सन्मार्ग पर लाने केलिये, शांतिपूर्ण क्रान्ति का आह्वान किया हुआ था। किसी के भी मन को कोई तर्कहीन सन्देश और उपदेश ना देकर, समानता विश्वबंधुता का ही मिजायल छोड़ा, जिससे केवल मात्र ब्राह्मण ही आहत हुए बाकी सभी गुरु रविदास जी के क्रांतिकारी आंदोलन का समर्थन करते जा रहे थे। अलग थलग पड़े हुए ब्राह्मण गुरु रविदास जी को अपना दुश्मन नंबर एक मॉन कर, उनके साथ गुंडागर्दी करते जा रहे थे।
मगर गुरु रविदास जी मस्त हाथी की चाल चलते हुए, सभी को मॉनवता का संदेश देकर, आपस मे प्यार बना कर, विश्व के हिन्दू, मुसलमानों, ईसाइयों को समन्वयवादी उपदेश देकर, समरस होकर, जीने केलिये प्रेरित करते जा रहे थे, जिसका लाभ ब्राह्मणों ने नहीं उठाया और गुरु जी की वाणी को ही मिटाने पर तूल गए।
गुरु रविदास जी की क्रांतिकारी वाणी ने विश्व में जो हाहाकार, तरथल और हलचल मचा रखी थी, उसके बारे में इतिहासकार सतीश मिश्रा अपनी पुस्तक "जोशरे खुलनार इतिहास" के पृष्ठ, 449 के ऊपर जी लिखते हैं कि :-----
Earlier majority of the people of this country were Budhists, Budhism was an universal faith. The Brahminism was inflicted so intensive, atrocities on the nethilist Budhists.The people dare not uttering name of Budha.The remant was wipes out by the Pathans. Brahmins and Pathans in collaboration accomplished it very efficiently.
भावार्थ कि, पहले इस देश मे बहुतायत लोग बोद्धि थे, बुद्ध मत विश्व धर्म था। ब्राह्मणों ने बौद्धियों के ऊपर इतने अमानवीय, बहिशियों की तरह खूंखार होकर जुल्म ढाए कि, लोग बुध का नाम लेने से भी करतराते ही नहीं थे अपितु नाम लेने की हिम्मत भी नहीं करते थे। जो कुछ शेष बचा खुचा बुद्धिष्ट समाज रहा, उसका सफाया पठानों ने कर दिया। इस प्रकार घर के भेदियों ने दुश्मनों के साथ मिलकर, मूलनिवासी लोगों का बड़ी ही चतुराई से, अपनी योजना को अंजाम दिया। इतिहासकार सतीश मिश्रा जी पुनः स्पष्ट करते हैं कि, ब्राह्मणों और पठानों में संयुक्त रूप से अछूतों का अमानवीय विध्वंस किया था। ब्राह्मणों का तो सबसे बढ़कर, बड़ा खतरनाक, दुश्मन गुरु रविदास जी निकला, क्योंकि, गुरु रविदास जी ने, मूलनिवासी समाज को शान्ति और मुक्ति का पाठ पढ़ाते हुए, मूलनिवासियों को ब्राह्मणवादी ही नहीं विदेशी गुलामी से छुटकारा पाने केलिये प्रेरित किया, उन्होंने मूलनिवासियों को स्वाभिमानी बनने का उपदेश दिया, लाल रंग के चोले पहनना, गेरुए रंग के वस्त्र पहनने, बुत पूजा करनी, भिक्षु बन कर घर घर घूमकर भिक्षा अर्जित करके गुजारा करना, मॉनवता के मात्थे पर कलंक बताया। अति अहिंसा को भी हानिकारक बताया:----
पराधीनता पाप है, जान लियो रे मीत।
रविदास पराधीन से, करै ना कोई प्रीत।।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, गुलामी महापाप है, गुलाम से कोई भी प्यार नहीं करता है। वे जानते थे कि, अति अहिंसा ने सम्राट अशोक को, कायर बनाया और अपना राजधर्म यद्ध करना त्याग दिया, इसी रास्ते पर चलकर उसके बेटे वृहद्रथ ने भी विलासिता के समंदर में अंधे होकर, ब्राह्मणी से, शादी करके, राजधर्म को त्यागकर, अहिंसा के रास्ते पर चलकर, अपने प्राण तो गंवाए साथ ही, वहुजन राज भी गंवा कर, भारत के मूलनिवासी बुद्धिष्टों का बुरी तरह से कत्लेआम करने का, पुष्यमित्र शुंग को कुअवसर दिया।
बृहद्रथ ने अपनी मूर्खता और पूर्ण हिंसा को त्याग कर, असंख्य बौद्ध भिक्षुओं, शूद्रों और मूलनिवासियों को काल का ग्रास बनाया। गुरु रविदास जी ने जब शंख बजाया तो क्या उन्हें ये ज्ञात नहीं था कि, हिंसा नहीं होगी, मारकाट नहीं होगी, उनके ऊपर घातक हमले नहीं होंगे, आपराधिक केस नहीं बनेंगे। धोती तिलक लगाने के क्या परिणाम निकलेंगे, पूजापाठ करने के क्या परिणाम निकलेंगे, क्या ये सब ज्ञात नहीं था, क्या वे कोई मजाक का खेल रहे थे, क्या वे सारे राजतंत्र, ब्राह्मणतंत्र को चैलेंज नहीं करते जा रहे थे, इस चैलेंज के क्या दुष्परिणाम निकलने वाले थे, उनका उन्हें आभास नहीं था। "था" मगर केवल ब्राह्मणों को ही रहा था।
गुरु रविदास जी महाराज की समग्र क्रान्ति की चिंनगारियां भारत के कोने कोने में सुलगती जा रही थी, जिससे सारा ब्राह्मणवाद भष्म होता जा रहा था। गुरु रविदास जी की क्रांतिकारी अग्नि की लहर का कहर मनुवाद को ग्रहण लगा हुआ था। चारों ओर गुरु जी की अजेय वाणी का आतंक फैला हुआ था, राजाओँ और बादशाहों ने गुरु रविदास जी के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया, जिससे घबरा कर ब्राह्मणों ने अपने पैंतरे बदल लिए और गुरु जी के विजयी साम्राज्य के ऊपर, ब्राह्मणी मुलम्मा, (आवरण) चढ़ाने का षडयंत्र शुरू कर दिया। कहीं लिख दिया, कि, गुरु रविदास जी ने गंगा में पत्थर तारे, कहीं लिखा छाती चीर कर ब्राह्मणों के चार युगों के जनेऊ निकाले, कहीं लिखा कि गुरु रविदास पिछले जन्म में ब्राह्मण ही थे, कहीं लिखा कि वे अपना चर्मकार का काम बड़ी ईमानदारी से करते हुए भोजन खाते थे, कहीं लिख दिया कि उन्हें घर से, पिता ने निकाल दिया, अगर तर्क से चिन्तन किया जाए, खोज की जाए कि, चार युग अमेरिका, जापान, चीन, यानि कहीं भारत के बाहर भी हैं। उतर मिलेगा नहीं, फिर इनका संबध गुरु रविदास जी के साथ ही क्यों जोड़ा गया ? ऐसा इसलिए किया कि, केवल अपने ब्राह्मणी धर्म को विश्वशनीय बनाया जा सके और गुरु रविदास जी शक्तियों को ब्राह्मण हित में भुनाया जा सके, इसीलिए हमें जरूरत है कि गुरु जी के चरित्र को मनोविज्ञान और तर्क की कसौटी पर कस कर ही ब्राह्मणों की लिखी गाथाओं पर विश्वास करें। अंधाधुंध, उन्हें चर्मकार के रूप में ना तो दिखाएं और ना ही गायक गाएं।
।।सोहम।। जय गुरुदेव।।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।

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