।।गुरु रविदास जी और मूलनिवासी साहित्य।।

 ।। गुरु रविदास और मूलनिवासी साहित्य।।
।।भाग दो।।
गुरु रविदास जी महाराज से पूर्व, किसी भी मूलनिवासी लेखक, कवि, उपन्यासकार, संगीतकार, एकांकीकार, गद्यकार, नाटककार, आलोचक, का वर्णन नहीं मिलता है, जिसके बारे में हमारा कभी ध्यान नहीं गया। कबीर साहिब के दोहे ही हमें पढ़ने केलिये मिले, गुरु रविदास जी के बारे में तो कभी भी, कुछ भी पढ़ाया ही नहीं गया, शायद साहिवे कलाम मंगूराम मुगोबाल और बाबू जगजीवनराम जी के दबाब में, कांग्रेस सरकारों ने, गुरु रविदास जी बारे में, कुछ आंशिक रूप से पाठ्यक्रमों में, उनकी वाणी डाली थी। डाक्टर हजारीप्रसाद द्विवेदी ने, गुरु रविदास जी के अनुपम, अनूठे, अतुलनीय, आलौकिक, साहित्य के बारे में, लिख कर, अपना नाम कमाने केलिये, गुरु रविदास जी महाराज के, ऊपर थोड़ा वहुत काम किया है, मगर जब मूलनिवासी स्कॉलर गुरु रविदास जी के क्रांतिकारी कार्यों के बारे में खोजबीन करने लगे, तभी कुछ सत्य सामने आने लगे। हिन्दू कुलपतियों और गाइडों ने, मूलनिवासी शोधकर्ताओं की खोज में भी टांग अड़ाकर, उनसे एक आध अंश गलत दर्ज करवाकर ही, उनकी पीएचडी उपाधियां जारी होने दीं अन्यथा उन्हें, डिग्री देने में वहुत परेशान किया जाता रहा। वेद, पुराण, गीता, रामायण, संविधान, गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ सभी वहुजन समाज के योग्य लेखकों ने ही लिखे। मनुवादियों ने तो केवल मनुस्मृतियां और ब्राह्मण ग्रँथ ही लिखे, जिनमें, छुआछूत, ऊंच नीच, जातीयता और अमानवीयता को ही महत्व दिया गया है, जिन्हें पढ़ कर हैवान ही पैदा होते है, इंसान को इंसान का दुश्मन ही बनाने केलिये मार्गदर्शन किया गया है। जब तक भारत में यूरेशियन नहीं आए थे, भारत, साहित्य सांस्कृतिक, कलात्मक, आध्यात्मिक, कारीगरी, बढ़ईगिरी, इंजीनियरिंग, मेडिकल क्षेत्र में सर्वोच्च स्थान पर था, बड़ी हैरानी की बात तो ये है, कि एक चमारी नारी नें राँबी से, प्रसव वेदना से चीखती, चिल्लाती हुई, गर्भवती ब्राह्मणी का पेट चीर कर, वच्चे को बाहर निकालकर, पुनः टांके लगाकर, सबसे पहले सर्जरी की शुरुआत की थी। मगर जबसे छलबल से युरेशयन ने सत्ता छीनी है, तब से ही वहुजन समाज को अपंग करने केलिये, शिक्षा के ही द्वार बंद करके, वहुजन समाज की क्रीम को ही मिट्टी में मिला दिया है। वहुजन समाज पढ़ ही ना सके, जिसके लिये मनुबाद ने वहुजनो को शिक्षा के सभी दरवाजे ही बन्द कर दिए। गुरु रविदास जी ने पढ़ने का प्रयास किया तो उन्हें भी स्कूल जाने ही नहीं दिया, यहाँ तक खुद भी पढ़ने लिखने के लिए, उन्हें देवनागरी लिपि का प्रयोग करने पर भी परेशान किया गया। गुरु रविदास जी तो आए ही इसलिए थे, कि ब्राह्मणों के धार्मिक और राजनीतिक एकाधिकार और अधिपत्य को खत्म किया जाए।
जब गुरु रविदास जी को, देवनागरी लिपि में लिखने नहीं दिया गया तो, उन्होंने गुरमुखी लिपि का ही अविष्कार कर दिया। पैंतीस अखरी गुरमुखी लिपि के माध्यम से गुरु रविदास जी ने अपनी क्रान्ति की ज्वाला से संसार को आलोकित किया। गुरु रविदास जी ने साहित्य की कोई ऐसी विधा नहीं छोड़ी, जिस पर अपनी लेखनी नहीं चलाई। डाक्टर धर्मपाल जी अपनी रचना " रैदास, पृष्ठ 12" पर लिखते हैं, कि ऐसी राजनैतिक विश्रृंखलता, धार्मिक अनास्था, सामाजिक अव्यवस्था तथा आर्थिक दरिद्रता के युग में सन्तशिरोमणि रैदास(सतगुर रविदास जी) आविर्भूत हुए थे। इस काले युग को अपनी नैतिक चेतना का, मूलनिवासियों को संबल देकर आध्यात्मिक ज्योति से आलोकित करने का श्रेय सन्त शिरोमणि रैदास को ही जाता है। भारतीय संस्कृति को विकृत अधोमुखी वृत्तियों से बचाकर जीवित और जागृत रखने का गौरव रैदास(रविदास जी) एवं उस युग के सन्तों को दिया जा सकता है, इसीलिए हमने इसे भारतीय संस्कृति के पुनर्जागरण का काल स्वीकार किया है। मध्य युग के प्रतिभा संपन्न सशक्त सन्तों में ऐसा ही गरिमामय व्यक्तित्व था, सन्त रैदास(रविदास जी) जी का। आप पृष्ठ 57 पर लिखते हैं "रैदास (रविदास जी) एक ऐसे युग पुरूष थे, जिन्होंने अपने युग की सभी मान्यताओं का समन्वय, सामान्य जनता को एक सहज और सरल साधन पद्वति, कवि सुलभ सहिर्दयता के साथ किया। आपने कविता के आनंद के साथ-साथ आध्यात्मिक-आनंद भी दिया, दीन-दलित जनता को ऊपर उठाया। क्योंकि वे मध्ययुगीन सन्त चेतना के जगमगाते माणिक्य थे।" धार्मिक जगत में गुरु और ब्रह्म को एक समझा जाने लगा। सन्तों ने भी गुरु को इसी रूप में देखा और भगवान के समान सभी गुरूओं का अभिनन्दन किया। डाक्टर धर्मपाल के अनुसार "गुरु रविदास जी, अपने भक्तिकाल की निर्गुण शाखा के मुख्य, शिरोमणि, शिरोधार्य वहुजन क्रान्ति के नेता, कवि, लेखक, और गुरु भी थे। गुरु रविदास जी से ही सवर्ण अवर्ण और विशेष रूप से मूलनिवासी साहित्य की रचना की शुरुआत मानी जा सकती है"।
मुसलमान शासन के बाद, 1857 में जब अंग्रेज शासक बने, तभी उन्होंने सिकन्दर लोधी के बेगमपुरा की तर्ज पर, स्वतंत्र भारत में शासन शुरू किया गया। गुरु रविदास जी महाराज की मान्यताओं के अनुसार ही, मानवीय मूल्यों के आधार पर, आरक्षण सहित सभी समतामूलक कानून बनाए गए और लागू किये गए, जिसके कारण, भारत के मूलनिवासियों को पढ़ने लिखने के अधिकार मिले। मनुस्मृति के काले कानूनो का अनुसार, पढ़ने लिखने के अधिकार केवल ब्राह्मणों को ही हैं। राजपूत वाणियां भी पढ़-लिख नहीं सकते थे। ये तो शुक्र है कि, लार्ड मैकाले जैसा बुद्धिमान अंग्रेज शासक भारत आ गया और उसने, राजपूतों वाणियों और वहुजन समाज को भी पढ़ने केलिये स्कूलों के दरवाजे खोल दिये, मगर उस समय ब्राह्मण ही अध्यापक हुआ करते थे, जो वहुजन समाज के वच्चों को मार-मार कर स्कूल से भगा दिया करते थे, पंजाब के साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल और उत्तरप्रदेश से परम पूज्य स्वामी अच्छूतानंद जी महाराज, इन्हीं यातनाओं के शिकार हुए थे। प्रोफेसर सरदार दितसिंह जी भी अंग्रेजों की उदारवादिता के कारण ही, अठाहरवीं शताव्दी में, पीएचडी करके पहले मूलनिवासी सिख, प्रोफेसर बन कर, विश्विद्यालय स्तर तक पहुंचे थे। डाक्टर भीमराव अंवेदकर तो सैनिक सूबेदार पिता और बड़ोदा के महाराज की कृपा से ही मैट्रिक पास कर सके, यदि वे अमेरिका और इंग्लैंड पढ़ने नहीं जाते तो, उन्हें भी कोई डिग्री ब्राह्मण लेने ही नहीं देते।
अंग्रेजों ने भी तभी मानवीय अधिकार दिए, जब गुरु रविदास जी महाराज ने पंद्रहवी और सोहलवीं शताव्दी में, खुंखार बादशाहों और राजाओँ को झुकाकर इंसान बनाकर, अपने क्रांतिकारी धार्मिक और समाजवादी सिद्धांतों के अनुसार शासन करने केलिये, बादशाहों और महाराजाओं को विवश किया था। अगर अंग्रेज भारत पर शासन नहीं करते, तो आज भी भारत के मूलनिवासी, ब्राह्मणवाद और मनुवाद की चक्की तले ही पिसते और ब्राह्मणवाद के गुलाम ही होते।
।।सोहम।जय गुरुदेव।।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।

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