।।गुरु रविदास जी क्रांतिकारी महाऋषि।।

    ।।गुरु रविदास क्रांतिकारी महाऋषि।।
गुरु रविदास जी महाराज, बेताज विश्व चक्रवर्ती सम्राट हुए हैं, जिसके प्रमाण तत्कालीन राजे, महाराजे और बादशाह हुए हैं। प्रसिद्ध कांशी नरेश नागरमल उर्फ हरदेवसिंह, राजा बघेलसिंह, राणा कुंभसिंह, राणा रॉयमल, राणा संग्रामसिंह, राणा बिकमादित्य, कुंबर भोजराज।।गुरु रविदास और पराधीनता मुक्त क्रान्ति।।
गुरु रविदास जी महाराज के, वहुद्देशीय, बहुमुखी क्रांतिकारी आंदोलन का महत्वपूर्ण विषय था, युरेशयन की पराधीनता को नेशतनाबूद करके मूलनिवासियों को स्वतंत्र करवाना था, क्योंकि मूलनिवासियों के ऊपर धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक गुलामियों को थोंप कर, शूद्र वर्ण को केवल सेवादार बनाकर रखा गया है, वे जानते थे, कि वहुजन समाज की सभी समस्याओं का मूल कारण केवल मुसलमान और राजाओँ की दोहरी पराधीनता ही है और वह भी सबसे अधिक क्रूर ब्राह्मणों की। तीनों वर्णों को शिक्षा, शास्त्रविद्या से वंचित रखा गया है, तीनों वर्णों को शिक्षा विहीन रखा गया है क्योंकि वे कहते हैं कि :----
सत विद्या को पढ़े, जउ प्राप्त करै सदा गिआन।
रविदास, बिन विद्या के ,नर कु जान अनजान।।
गुरु रविदास जी जानते थे कि, ब्राह्मणों ने ही, वीर राजपूतों को भी बुरी तरह गुलाम बनाने केलिये शास्त्र विद्या से वंचित रखकर, शस्त्र विद्या तक ही सीमित रखा हुआ है और उनकी जनसंख्या कम करने लिए, उन्हें ही युद्धों में झोंकने की नीति बनाई हुई है। उन्होंने, वाणियों को भी शास्त्रों की शिक्षा पर प्रतिबंध लगाकर, शिक्षा अर्जित करने से वंचित करके, उनके ज्ञान चक्षु बन्द करके रखे हुए हैं, ताकि राजनीति की बात ही ना सोच सकें। वे जानते थे कि जब तक सभी तीनों वर्ण मूर्खता के अंधकार में डूबे रहेंगे तब तक हम अप्रत्यक्ष रूप से राज करते रहेंगे, ज्यों ही ये तीनों वर्ण ज्ञान की बातें सीख जाएंगे, त्यों ही ब्राह्मणों की गुलामी के दिन भी शुरू हो जाएंगे। यह बात आज सत्य सिद्ध हो चुकी है। अगर राजपूत, वनियाँ, ब्राह्मणों का साथ छोड़ दें तो ये सभी बुरे कर्मों की सजा भुगतने लग पड़ेंगे मगर इन दोनों ही वर्णों को समझ नहीं आ रही कि वाणियां मोहनदास करमचंद गांधी ब्राह्मणों ने प्रयोग किया और मार दिया, नेहरू परिवार मरवा दिया, लाल बहादुर शास्त्री मरवा दिया, सुभाषचंद्र बोस मरवा दिया, डाक्टर भीमराव अंवेदकर को अपनी ब्राह्मण कन्या देकर भी मरवा दिया, बेताज बादशाह साहिब कांशीराम मरवा दिया, साहिबे कलाम मंगू राम मुगोबाल और स्वामी अच्छूतानंद जी महाराज कंगाली की हालत में मरवाए गए। गुरु रविदास जी की नीतियों को तीनों वर्णों ने हलके में लेकर जो अपनी बर्बादी की है, उसकी भरपाई करना बड़ी कठिन है। गुरु रविदास जी ने तीनों वर्णों की गुलामी को देखते हुए कहा था:-----
पराधीनता पाप है, जान लियो रे मीत।
रविदास पराधीन से, करै ना कोई प्रीत।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, हे मित्रो ! गुलामी सबसे बड़ा पाप है, गुलामों से कोई मित्रता नहीं करता है, कोई उनसे प्यार नहीं करता मगर जानबरों की तरह काम लेकर, दिन रात कोहलू के बैल की तरह प्रयोग करके मार दिया जाता है। इसलिए, कोहलू का बैल बनना त्याग दो, गुलामी की जंजीरों, बेड़ियों को तोड़ दो, पशुओँ की जिंदगी जीना छोड़कर स्वाभिमान की जिंदगी जिओ। तुम गुलाम हो, मैं तुम्हें गुलामी का अहसास करवा कर आजाद करने आया हूँ, तुम्हें गुलामी की आदत पड़ चुकी है जिसे समझाने आया हूँ। वे आगे कहते हैं:----
पराधीनता को दीन जन, क्या पराधीन है बेदीन।
रविदास दास पराधीन को, सभी समझें हीन।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, जो लोग गुलाम हैं, वे नहीं जानते हैं कि, गुलाम कौन होता है ? विधर्मी कौन होता है ? रविदास जी समझाते हैं, कि गुलाम को सभी नीच और सबसे गिरा हुआ घटिया समझा जाता है। गुरु रविदास जी आगे कहते हैं कि:----
रविदास मानुष बसन कूं, सुख कर हैं दुइं ठाँव।।
इक सुख है स्वराज माहिं, दूसर मरघट गाँव।।सन्त रें ज्ञानी सुखवीर सिंह के अनुसार, गुरु नानकदेवजी के प्रकाश से पहले जो भक्ति लहर चली थी उसमें कबीर फरीद रविदास नामेदव सधना सेन त्रिलोचन रामानंद धन्ना सूरदास आदि प्रसिद्ध सन्तों ने इस भक्ति लहर द्वारा विदेशी हकूमत को खोखला कर दिया था।डाक्टर हरनेक सिंह कलेर के अनुसार, गुरु रविदास जी की शिष्य परंपरा की लड़ी में साधारण लोगों के अतिरिक्त उस समय की प्रसिद्ध विभूतियों स्वामी रामानंद सतगुरू कबीर सैन धन्ना पीपा रानी झालाबाई मीराबाई गुरु नानकदेव कमाल कमाली के नाम लिए जाते। भक्ति आंदोलन से ही, गुरु रविदास जी के नेतृत्व में, सन्तों ने मुगल बादशाहों को अत्याचार करने से रोक दिया था। उनकी प्रत्यक्ष पराधीनता से प्रजा को मुक्त करवा दिया था। गुरु रविदास जी ने प्रजा के सुख के दो ही स्थान बताए हैं:-----
इक सुख है स्वराज माहिं, दूसर मरघट गांव।
रविदास जु है बेगमपुरा, उह पूरन सुख धांम।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि आदमी को सुख आजादी में मिलता है या फिर श्मशान घाट में। स्वर्ग वहीं होता है, जहां किसी को कोई दुख दर्द नहीं होता वही देश सुख का घर होता है, जो प्रजा को दुर्लभ ही होता है।
।।सोहम।।जय गुरुदेव।।
रामसिंह शुक्ला।।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
जून 20, 2020। राणा रतनसिंह, राणा बैनसिंह, विजयपाल सिंह, राजा चंद्रपाल, राजा माडंव, राजा दूदाराव, राजा रतनसिंह, राजा पंढरपुर, राजा जूनागढ़, राजा उज्जैन, महारानी झालाबाई, राजा कुंडा, वीरसिंह (बाँधबगड़), मीराबाई, कर्माबाई, रूपमती, भानुमती, निर्दयी मुसलमान बादशाह अहलावादी, खूनी बादशाह सिकन्दर लोधी, बादशाह बिजलीखां, बादशाह बाबर खान आदि विद्यमान हैं। इन शासकों ने गुरु रविदास जी के समक्ष, आत्मसमर्पण करके, नतमस्तक होकर, गुरु रविदास जी को अपना गुरु स्वीकार करके, उनके आदेशों और निर्देशों का पालन करते हुए शासन किया, गुरु रविदास जी ने उन्हें आदर्श राज्य, बेगमपुरा बसाने का आग्रह ही नहीं अपितु हुक्म दिया था, जिसका पालन करते हुए, सभी राजाओँ और बादशाहों ने, शेष बचा हुआ अपना जीवन, गुरु रविदास जी के सिद्धांतों के अनुसार राज करके बिताया और भारत को सचमुच गम रहित राज्य बनाकर, स्वयं भी सुखी रहे और प्रजा भी सुखी रखी। जबसे ये शासक, गुरु रविदास जी के अनुयायी बने, तबसे लेकर सत्ताच्युत होने तक, इनके कार्यकाल में युद्ध नहीं हुए, ना कत्लेआम का नृशंस तांडव नृत्य हुआ। गुरु रविदास जी के निर्देशों का इतना असर हुआ जितना तो, हथियारों की नोक पर विजय हासिल करने वाले तानाशाहों के आदेशों का भी पालन नहीं होता था।
पहली विजय पर ही छत्र श्रृंगार:--गुरु रविदास जी जब नागरमल की अध्यक्षता में संपन्न हुए शास्त्रार्थ में, ब्राह्मणों को पराजित करके विजयी हुए तो शर्तानुसार, पराजित पक्ष को विजयी पक्ष को, काशीं बाजार में, घुमाकर सम्मानित करना था। गुरु रविदास जी को, ब्राह्मणों ने सोने की पालकी में सवार करके, सिर के ऊपर छत्र सजाया कर, सारे कांशी शहर में शोभायात्रा के रूप में घुमाया था। इस मनमोहक और मार्मिक दृश्य को गुरु रविदास जी ने अपने शव्दों में इस तरह पिरोया था:-----
ऐसी लाल तुझ बिनु कौउन करै।।
गरीब निवाजु गुसईयां मेरा माथे छत्र धरै।रहाउ।
जाकी छोत जगत कोउ लागै ता पर तूंही ढरै।।
निचहूँ ऊंच करै मेरा गोविंद काहू ते ना डरै।।
नामदेव कबीर त्रिलोचन सधना सैन तरै।।
कहि रविदास सुनहु रे सन्तों।
हरि जिउ ते सभै सरैं।।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, हे ! गरीबों के पालनकर्ता स्वामी जी, आपके बिना ऐसा मॉन सम्मान, हमारे जैसों का कौन कर सकता है? आपने हमारे मात्थे के ऊपर छत्र का श्रृंगार करके हमारा यश सारे विश्वमें किया है। ऐसा कर्म आप ही कर सकते हैं।
गुरु जी ने निसंकोच स्वयं फ़रमाया है कि:----
जाति भी ओछी पात भी ओछी,ओछा किसब हमारा।।
तुम्हारी कृपा तै ऊंच भए हैं, कहै रविदास चमारा।।
गुरु रविदास जी महाराज बिना किसी संकोच किए फरमाते हैं कि, हमारी जातिपाति ओछी है अर्थात निम्नतम है, हमारा पेशा भी, ओच्छा ही है। हे आदिपुरुष ! आपकी मेहरवानी से हम ऊँचे होकर अर्थात श्रेष्ठ हो गए हैं।
महारानी झालाबाई का यज्ञ:----अपने पति राणा कुंभसिंह की अनुमती से महारानी झालाबाई, गुरु रविदास जी को, अपना "गुरुश्री" बना कर जब चितौड़गढ़ वापस आई और गुरु जी के बारे में विस्तार पूर्वक बताया कि, महाराज ! धरती पर, देवदूत अगर कोई हैं, तो केवल गुरु रविदास जी ही हैं। मैं चाहती हूँ कि, आप भी उनके दर्शन करके, उन्हें अपना गुरुश्री बना लें। महाराजा कुंभसिंह भी सत्य को जानना चाहते थे। रानी ने कुंभसिंह से विनम्र प्रार्थना की कि, महाराज, में चाहती हूँ कि, हम यहां गुरु रविदास जी को आमंत्रित करके एक सत्संग करवाएं ताकि हमारा गृह पवित्र हो सके। राजा ने रानी के मशवरे को स्वीकार करते हुए, पवित्र आयोजन की तैयारी शुरू कर दी। पास पड़ोस के राजाओँ को भी सपरिवार सत्संग में आमंत्रित किया गया। गुरु रविदास जी ने, चितौड़गढ़ में ऐसा सत्संग किया कि, गुरु जी दिव्य वाणी को सुनकर सभी आत्मविभोर हो गए। सत्संग के बाद जब लंगर परोसा गया तो, गुरु रविदास जी को आलीशान दळीचे के ऊपर पंगत में बैठे हुए को देखकर, ब्राह्मण भड़क कर, पंगत से ये कह कर उठ गए कि, हम चमार के साथ बैठकर भोजन नहीं करेंगे। गुरु रविदास जी ने ब्राह्मणों की अफरा तफरी देखकर कहा, हमीं पंगत से उठ जाते, तुम सब भोजन करो! हम बाद में कर लेंगे। जब सारी पंगतों को भोजन परोस दिया गया और पँडित, अरदास करके भोजन करने लगे, तब सभी पुनः उठ गए और कहने लगे, रविदास मेरे साथ बैठ गया, दूसरा कहने लगा, रविदास मेरे साथ बैठ गया, इसी तरह सभी ब्राह्मणों को सभी पंगतों में हर दो आदमीयों के बीच रविदास ही रविदास नजर आ रहे थे। सभी उस करिश्में को देखकर हैरान थे, सभी ब्राह्मणों ने गुरु रविदास जी के पास पराजित होकर उनके पास, आत्मसमर्पण करते हुए उनके चरणकमलों पर शीश नवाकर माफी मांगी, और गुरु रविदास जी के साथ बैठकर भोजन किया।
बादशाह सिकन्दर लोधी की हार:----जब सिकन्दर लोधी, गुरु रविदास जी से परास्त गया तो वह भी गुरु रविदास जी को, तुगलकाबाद जेल से, सोने की अनुपम पालकी में विराजमान करके, शोभायात्रा के रूप में, अपने दिल्ली दरवार में लेकर आया था, जहां गुरु रविदास जी से, माफी मांगकर, सोने की थाली में उनके पवित्र चरणकमलों को, अपने हाथों से धोता है और गुरु जी से शासन करने के नियम पूछता है, तब गुरु जी कहा:-----
ऐसा चाहूं राज मैं, जहां मिले सबन्न को अन्न।
छोट बड़ सब सम वसै तां रविदास रहै प्रसन्न।।
सिकन्दर लोधी ने उसी समय प्रजा पर लगाए टैक्स समाप्त कर दिए, गरीबों को मुफ्त लंगर लगवा दिए, हिंसा छोड़कर सभी धर्मो का सम्मान करने लगा, कुछ ही दिनों में भारत को बेगमपुरा शहर बना दिया गया।
बादशाह बाबर का आत्मसमर्पण:-----बाबर भी पानीपत के युद्ध में नई नई तोप से नरसंहार करके, राणा सांगा सहित उसकी सेना की खून की नदी वहाकर, विजेता बन कर, बड़े चाव और स्वाभिमान से, गुरु रविदास जी के दर्शन केलिये सीधा कांशी चला आया। जब गुरु जी के चरण स्पर्श किए तो, गुरु जी ने उसकी ओर एक आंख से भी, मेहर की दृष्टि नहीं डाली और बादशाह के सम्मानार्थ, उसे बैठने के लिए ही कहा, गुरु जी के अंदाज को बाबर समझ गया कि गुरु जी खुश नहीं है, गुरु जी चुप थे क्योंकि भारत की जनता के कत्लोगारद से, गुरु जी वहुत ही आहत थे। बाबर ने, गुरु जी को कुरेदने का प्रयास किया जिससे गुरु जी भी बोलने लगे और बाबर को बुरी तरह फटकारा और कहा, बादशाह बाबर तूने, जो नरसंहार किया है, उसके पाप केलिये कौन सजा भुगतेगा ? ये बादशाहत तो यहीं रह जाएगी, साथ तो तेरी कत्लोगारद ही जाएगी ना, धरती पर तेरे जुल्मोसितम की गाथाएं ही याद रहेंगी, जनता तेरे नाम पर थूकेगी। बाबर गुरु जी के मानसिक दण्ड को सहन करता गया और क्षमायाचना करते हुए, तोबा करते हुए, गुनाह बख़्शने केलिये, प्रार्थना करने लगा, तब गुरु जी ने कहा, बाबर कसम खाओ कि, आज के बाद किसी की हत्या नहीं करूंगा और सिकन्दर लोधी के बेगमपुरा को पुनः स्थापित करूंगा।बाबर भी बुरी तरह गुरु रविदास जी की पवित्र वाणी की तेज धार से घायल होकर, एक अच्छा धार्मिक, मार्मिक, न्यायप्रिय, ईमानदार, आदर्श शासक बन गया।
गुरु रविदास ने तानाशाहों को वाणी से जीता:--गुरु रविदास जी, बिना तीर, तलबार,खड़ग और मिजायल के ही, तानाशाहों को नकेल डालकर मार दिया करते थे। उन्हें सदा केलिये अपना गुलाम बना लेते थे। बिना किसी सैन्य युद्ध के ही, वे शिरोमणि चक्रवर्ती शहंशाहों के शहनशाह बन गए थे क्योंकि उनके अंदर सत्य, ईमान, ज्ञान, वीरता, धैर्य और ध्यान विद्यमान थे, जिससे कॉफर, कसाई, निर्दयी, दंभी, अत्याचारी उनके समक्ष, हथियार डालने केलिये विवश हो जाते थे, इन्ही कारणों से, गुरु रविदास जी महाराज, संसार में विश्व सम्राट कहलाए।
।।सोहम।।जय गुरुदेव।।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
मई 20, 2020।गुरु रविदास जी महाराज ने, पावन धरती सीर गोवर्धन, उत्तरप्रदेश से अपनी जीवन यात्रा शुरू करके, जनमानस को, तानाशाहों के अत्याचारों से मुक्ति दिला दी थी। पन्द्रवीं और सोहलवीं शताब्दी में, गुरु रविदास जी ने, सभी धर्मो के ठेकेदारों को उनकी औकात दिखा दी थी, उनके अमानवीय सलूकों को संसार में उजागर करके, नेचर के शाश्वत सत्य को बताकर जीने का ढंग बता दिया था, इंसान को इंसान बनकर रहने में ही विश्व की भलाई है। मॉनव शरीर की सार्थकता समझाते हुए कहा:----
जल की भीत पवन का थंभा,रक्त बून्द का गारा।
हाड़ मांस नाड़ी को पिंजर, पंखी वसै बिचारा।।
प्राणी क्या मेरा, क्या तेरा।।
जैसे तरवर पंखि बसेरा।। रहाउ।।
राखहु कन्ध उसारहु नींवां।।
साढ़े तीन हथ तेरी सीवाँ ।।
बंके बाल पाग सिरी तेरी।।
इहु तनु होइगो भषम की ढेरी।।
ऊँचे मन्दर सुंदर नारी।।
राम नामु बिनु बाजी हारी।
मेरी जात कमीनी पाति कमीनी।।
ओच्छा जनमु हमारा।।
तुम शरणागति राजा राम प्यारा।।
कहि रविदास चमारा।।
गुरु रविदास जी ने शरीर की नश्वरता का चित्रण करके, आदमी की सभी सीमाओं को समझाया, ये भी समझाया कि आदमी की जाति की श्रेष्ठता क्या है ? ये भी समझाया कि अंत मे, साढ़े तीन हाथ धरती पर, हाड़ मांस की राख का, ढेर ही लगेगा, मगर उच्च जाति के लोग समझ नहीं पाए। गुरु रविदास जी ने पंद्रहवी शताव्दी में खुद, ब्राह्मणों के अथाह अत्याचार सहन किए थे। अपमानों के कड़बे घूंट पीए थे, जातीय भेदभाव सहन करके, जनकल्याणकारी उपदेश देकर, ढोंगियों को सुधारने के अथक प्रयास किए, नदी में, पत्थर तैरा कर ब्राह्मणों के पत्थरों से बने देवताओं को पानी मे डूबा कर, उनके झूठे आडंबरों को उजागर करके, राजा को भी अपना मुरीद बना कर, सुशासन करने केलिये बाध्य कर दिया था, मगर ब्राह्मणों ने, जातीयता के आधार पर गुरु रविदास जी को कम आंक कर, अपनी फितरत नहीं छोड़ी, जब उन्होंने महाराजा कुंभसिंह और महारानी झालाबाई, को अपनी शरण में आने केलिये विवश कर दिया, तब भी ब्राह्मणों ने, छलकपट नहीं छोड़ा, जब राजपूत राजकुमारी मीराबाई ने सत्य को जानकर, गुरु रविदास जी को अपना गुरु बना लिया, तब भी नहीं समझ सके, जब निरंकुश बादशाह जो, अमीरों, राजाओँ महाराजाओं से भी सर्वोपरि तानाशाह हुआ करते थे,, उन्होंने भी चरणों पर गिरकर, क्षमायाचना करते हुए, गुरु रविदास जी को अपना राजगुरु स्वीकार कर लिया, तब भी ब्राह्मणों का हिरदय परिवर्तन नहीं हुआ। बादशाहों और महाराजाओं के विजेता, चक्रवर्ती सम्राट गुरु रविदास जी को मान्यता नहीं दी, जब कि, गुरु रविदास विश्व में शहंशाहों के शहंशाह बन चुके थे, जिसका प्रमाण दिल्ली का बादशाह सिकन्दर लोधी था। मगर किसी ब्राह्मण लेखक ने, गुरु जी की श्रेष्ठता सिद्ध तो क्या करनी थी, उनका नाम तक साहित्य में लिखा तक नहीं। जब कोई चक्रवर्ती शहंशाह किसी से हार कर, विजेता को अपना शहंशाह स्वीकार कर लेता है, फिर भी कोई उस विजेता को चक्रवर्ती नहीं माने, तो उसके पीछे क्या राज है, आसानी से समझा जा सकता है। गुरु रविदास जी महाराज का चमार जाति में जन्म लेना ब्राह्मणों को रास नहीं आया। कहीं वे ब्राह्मण जाति में जन्में होते, तो आज वे सचमुच ही भारत के मसीहा ही होते, उन्हें वही सम्मान मिलता जिस प्रकार, वर्तमान राष्ट्रपति महामहिम, रामनाथ कोविंद को मिला हुआ है, क्योंकि उन्होंने आजीवन अपनी निम्त जातियों केलिये कोई भी काम ना करके, केवल, उच्च जातियों और ब्राह्मणों के लिए ही काम किया है और उन्हें सर्वोच्च पद पर विराजमान कर दिया है, जबकि वे अभी अभी, खुद मंदिर में प्रवेश नहीं कर सके, पण्डों ने मंदिर में घुसने तक ही नहीं दिया, फिर जो अपने लिए न्याय नहीं ले सके, वह नेता दूसरों को क्या न्याय दिला सकेगा, मगर गुरु रविदास जी ने किसी के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया, भले ही कई बार दरवारों में पेशियां भुगती हों। कई बार कड़ी से कड़ी परीक्षाएं देनी पड़ीं हों, इसीलिए कबीर साहिब ने गुरु रविदास जी के बारे में कहा:-----
सन्तन जात ना पूछो निरगुनियां।
साध ब्राह्मण, साध छत्तरी,साधै जाति वनियाँ।
साधनमा छतीस क़ौम हैं, टेढ़ी तोर पुछनिया ।
साधै नाऊ, साधै धोबी, साधै जाति है बरिया।
साधनमा रविदास सन्त हैं,सुपच ऋषि सो मानिया।
दुई दीन बने हैं, कछु नहीं पहचानियां।
लाखन जाति जगत मॉ फैली, काल के फंद पसरियाँ।
सब संतना सन्त बड़े हैं, सबद रूप जिन देहियां।
कहे कबीर सुनो भई साधो, सन्त रूप वही जानियां।
कबीर साहिब फरमाते हैं कि, हे ! प्यारी साध सँगत जी, निर्गुणी सन्तों की जातपात नहीं पूछनी चाहिए, उनका ज्ञान ही हासिल करना चाहिए। साधना करने वाले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अनेकों साध हुए हैं, इनके साथ छतीस जातियोँ में से भी अनेकों सन्त हुए हैं। ये जो जातपात, पूछने की प्रवृति है, यही मानसिक कुटिलता है, कहने केलिये तो नाई, धोबी, बारी आदि जातियोँ में अनेकों सन्त हुए मगर इन सभी सन्तों, महंतो में जो सर्वोपरि स्थान गुरु रविदास जी महाराज का है और किसी का नहीं है, जिसे समस्त सर्वश्रेष्ठ मुनियों ने भी स्वीकार और मानकर, उनसे ज्ञान का अमृपान किया है। हिन्दू मुस्लिमों ने गुरु रविदास जी से, गुरु दीक्षा ली, जिन्होंने कोई जातपात नहीं पूछी, ना ही जानी पहचानी, वस केवल गुरु रविदास जी का ज्ञान ही देखा था। मौत के फंदे में असंख्य जातियां फंसी हुई हैं, जिन्हें मौत निगल गई मगर सत्य को निगल नहीं सका, अगर किसी को मिला है, तो उसी को मिला, जिसने गुरु रविदास जी की शरण ग्रहण की है, वही सभी सन्तों को दैदिप्यमान करने वाले प्रकाश पुंज सूर्य हैं, जिनके प्रकाश से वे नक्षत्र रुपी सन्त भी, भक्ति के आसमान में प्रकाशमान हैं। कबीर साहिब समझाते हैं, हे साधो सुनो ! सत्य (आदिपुरुष) को केवल वही (गुरु रविदास जी) ही जानते हैं।
कबीर साहिब ने, गुरु रविदास जी के व्यक्तित्व का जो वर्णन किया है, उससे ज्ञात होता है कि, गुरु रविदास जी से पूर्व कोई भी महापुरुष ऐसा नहीं हुआ जिसे, ऐसा सर्वोच्च पद, सर्वश्रेष्ठ सम्मान किसी को मिला हो, गुरु जी तो विजेता महाराजाओं के उपर चक्रवर्ती सम्राट हुए हैं, जिन्हें कुटिल ब्राह्मणवाद के कुचक्र ने, जातीय भ्रमजाल में उलझा कर, अपना तो अहित किया ही मगर सारे भारत को भी बर्बाद किया है।
।।सोहम।।जय गुरुदेव।।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।

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