।।गुरु रविदास जी और उन की हत्या का दुष्प्रचार।।
गुरु रविदास जी महाराज, के ज्योति, जोत में ब्रह्मलीन हो जाने को भी ब्राह्मण औऱ उनके टुकड़ों पर पलने वाले अछूत लेखकों ने, उनको दैवीय शक्तिहीन सिद्ध करने में कोई कसर नहीं छोड़ी हुई है, ऐसा लगता है कि ये लोग समझते हैं कि, हमारे जैसे लेखकों के सिवाए औऱ कोई ऐसा बुद्धिमान लेखक है, ही नहीं, जो हमारी गुरु रविदास विरोधी, काली करतूतों को समझ नहीं पाएंगे। कोई इनके लिखे काले चिठ्ठों का आलोचनात्मक अध्ययन करके विश्लेषण ही नहीं कर सकेंगे। जिन जिन लोगों ने हमारी जाति में जन्म लेकर राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ में काम किया है, जिन जिन स्कॉलरों ने अपने थीसिजों में, गुरु रविदास जी की हत्या का वर्णन किया है, मुझे लगता है कि, उन्होंने ब्राह्मणवादी कुलपतियों के परेशान करने पर, गुरु रविदास जी की हत्या का कलंक अपने शोध पत्रों में लिखकर, थिशिज अपरूब करबाए हैं, मगर उन्होंने ये तनिक नहीं सोचा कि, एक सौ इक़ाबन वर्षीय वृद्ध, जिनकी केबल मात्र हड्डियों ही शेष मात्र रह गईं थीं, केवल अस्थिपिंजर रह गया था, जिनके शरीर पर, तलवार चलाने केलिये, रंच मात्र भी मांस शेष नहीं था, उन्हें कत्ल करके दिखाना और लिखना क्या उन्हीं की मूर्खता की ओर इंगित नहीं करेगा ? उन्होंने ईश्वर से तनिक भी डर कर नहीं लिखा कि, हम, अपने ही वाप का सरासर झूठा अपमान करके, अपना ही अपमान कर रहे हैं, संसार में ऐसा कोई भी मूर्ख नहीं मिलेगा जो, अपने वाप का सचमुच कत्ल होने पर भी, ये खुद लिखे कि मेरे वाप का कत्ल हुआ है, मगर ये धन और बुद्धि के कंगाल कुछ धन लेकर, अपनी किताबें छपवाने केलिये, अपने गुरुओं, पीरों के मान सम्मान को भी बेचकर खा गए।
सिक्खों के प्रथम गुरु एवं गुरु रविदास जी के सर्वश्रेष्ठ शिष्य, गुरु नानकदेवजी महाराज, अपने ही पिता श्री कालूदास जी को, अपने प्रिय गुरु रविदास जी की नीच जातपात का खंडन करते हुए, बेझिझक, निर्भीक होकर फरमाते हैं कि:-----
नीचाँ अंदर नीच, जाति नीची हूँ, अति नीच।।
नानक तिन संग,साथि बडीआ सो किया रीस।
गुरु ग्रँथ साहिब के जनक, गुरु अर्जुनदेव जी महाराज ने, तो गुरु रविदास जी को ठाकुर तक कह कर उनकी सर्वोच्चता को निम्नलिखित सम्मान देते हुए लिखा है:-----
भलो,कबीर दास, दासन को,
उत्तम सैन जनु पाई।
ऊंच ते ऊँच नामदेव समदर्शी,
"रविदास ठाकुर वणि आई"।
भाषा के डिक्टेटर कबीर साहिब ने भी गुरु रविदास जी के बारे में फरमाया है कि:-----
संतन में रविदास सन्त हैं,
सुपच ऋषि सो मानियो।
हिन्दू-तुर्क, दुई-दीन बने हैं,
जिन कछू नहीं पछानियो।।
ब्राह्मण युग में रचित, मनुस्मृति की धज्जियाँ उड़ाने वाली, राजपुत्री वीरांगना मीराबाई ने भगवान रविदास जी के बारे में लिखा है कि:-----
"गुरु मिलया रविदास जी, दीन्हीं ज्ञान की गुटकी"
किसी अज्ञात ब्राह्मण ने लिखा है कि:----
भक्तों में, भक्त शिरोमणि पुत्र तुम्हारा,
करे जगत में निज उजियारा।
चँवर वंश का सुयश बढावें,
वहुत सम्मान जगत में पावें।
राजपूत राजा एवं सन्त पीपा जी महाराज भी, गुरु रविदास जी की महिमा में लिखते हैं कि:----
जौ कलि काल रविदास, कबीर ना होते।
तो लोक वेद अरु कलियुग,
मिलिकर भगति रसातल कर देते।।
गुरु रविदास जी की वाणी को, कबीर साहिब, नामदेव साहिब, सैन साहिब आदि अवतारों ने भी इस प्रकार, अपने प्रवचनों और सत्संगों में, गुरु रविदास जी की महिमा में, उनकी सत्यता की चरमसीमा को व्यक्त करते हुए कहा है:-----
"धुर की वाणी आई, तिन सगली चिन्त मटाई"।
बुद्धिमान ब्राह्मणों, राजपूतों, वाणियों ने भी, गुरु रविदास जी के दिव्य स्वरूप को परख कर, जो उपरोक्त वर्णन किया है, वही उन चमार लेखकों केलिये, चुल्लू भर पानी में डूब मरने केलिये काफी है, जिन्होंने, गुरु रविदास जी की हत्या किए जाने केलिये, गन्दे, मन्दे और अति अभद्र ही नहीं भद्दे शव्द लिखे हैं।
गुरु रविदास जी के समय में ही धर्मान्ध, कुतर्क करने वाले ब्राह्मण लेखकों की, नियत को भांप कर, स्वंय गुरु रविदास जी ने यों लिखा है:---
"पंडित मुल्ला जौ लिखि दिआ।
छांड़ि चले हम कछू न लिआ ।।
अंग्रेज इतिहासकार "मैंकालिफ़" लिखते हैं कि, "श्री गुरु रविदास साहिब का तेज, प्रताप एवं यश, एक सूर्य की भांति फैल गया है"। सर्वश्रेष्ठ गुरु रविदास जी की नेक व सुहिरद सोच के सामने कपटी, लालची और मॉनवता विरोधियों की एक भी नहीं चली"।
लेखक, ज्ञानी गुरचरण सिंह वैद जी भी अपनी पुस्तक, "गुरमुखी अख्खर भगत रविदास ने बनाए" में लिखते हैं कि, गुरवाणी द्वारा भगत रविदास जी के गुरमुखी भाषा केलिये अक्षर बनाना सिद्ध करता है कि, गुरु रविदास जी को, ब्राह्मणों ने देवनागरी लिपि को प्रयोग करने नहीं दिया था, इसी कारण उन्होंने नई गुरुमुखी लिपि ईजाद करके, उनको अपनी विलक्षणता से बुरी तरह शर्मसार किया था। उनकी विद्वता का क्रांतिकारी नाद, उनकी वाणी द्वारा पूर्ण रूप से समझा जा सकता है"। इन्होंने बड़े ही खूबसूरत शव्दों में लिखा है:----
"नाना ख्यान पुरान,
वेद विध चौतीस अख्खर माँहीं"।
उपरोक्त अमूल्य, शलाघ्य कमेंट, उन सवर्णों ने, लिखे, जिनके खिलाफ, गुरु रविदास जी ने खूनी क्रान्ति के शव्द रूपी मिजायल बनाए, मगर गुरु रविदास जी के वंशज कपूतों ने, गुरु जी के चरित्र को काले धब्बे लगाकर, उनके ऊपर तो अपनी गन्दी कलम की स्याही के छींटे फेंके ही हैं मगर उनसे हमारा दामन भी दूषित किया। काश ! हमारे कुल को दाग लगाने वालों को कुछ शर्म आती और कुछ होश आ जाती !
।।सोहम।। जय गुरुदेव।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
मई 13, 2020।
सिक्खों के प्रथम गुरु एवं गुरु रविदास जी के सर्वश्रेष्ठ शिष्य, गुरु नानकदेवजी महाराज, अपने ही पिता श्री कालूदास जी को, अपने प्रिय गुरु रविदास जी की नीच जातपात का खंडन करते हुए, बेझिझक, निर्भीक होकर फरमाते हैं कि:-----
नीचाँ अंदर नीच, जाति नीची हूँ, अति नीच।।
नानक तिन संग,साथि बडीआ सो किया रीस।
गुरु ग्रँथ साहिब के जनक, गुरु अर्जुनदेव जी महाराज ने, तो गुरु रविदास जी को ठाकुर तक कह कर उनकी सर्वोच्चता को निम्नलिखित सम्मान देते हुए लिखा है:-----
भलो,कबीर दास, दासन को,
उत्तम सैन जनु पाई।
ऊंच ते ऊँच नामदेव समदर्शी,
"रविदास ठाकुर वणि आई"।
भाषा के डिक्टेटर कबीर साहिब ने भी गुरु रविदास जी के बारे में फरमाया है कि:-----
संतन में रविदास सन्त हैं,
सुपच ऋषि सो मानियो।
हिन्दू-तुर्क, दुई-दीन बने हैं,
जिन कछू नहीं पछानियो।।
ब्राह्मण युग में रचित, मनुस्मृति की धज्जियाँ उड़ाने वाली, राजपुत्री वीरांगना मीराबाई ने भगवान रविदास जी के बारे में लिखा है कि:-----
"गुरु मिलया रविदास जी, दीन्हीं ज्ञान की गुटकी"
किसी अज्ञात ब्राह्मण ने लिखा है कि:----
भक्तों में, भक्त शिरोमणि पुत्र तुम्हारा,
करे जगत में निज उजियारा।
चँवर वंश का सुयश बढावें,
वहुत सम्मान जगत में पावें।
राजपूत राजा एवं सन्त पीपा जी महाराज भी, गुरु रविदास जी की महिमा में लिखते हैं कि:----
जौ कलि काल रविदास, कबीर ना होते।
तो लोक वेद अरु कलियुग,
मिलिकर भगति रसातल कर देते।।
गुरु रविदास जी की वाणी को, कबीर साहिब, नामदेव साहिब, सैन साहिब आदि अवतारों ने भी इस प्रकार, अपने प्रवचनों और सत्संगों में, गुरु रविदास जी की महिमा में, उनकी सत्यता की चरमसीमा को व्यक्त करते हुए कहा है:-----
"धुर की वाणी आई, तिन सगली चिन्त मटाई"।
बुद्धिमान ब्राह्मणों, राजपूतों, वाणियों ने भी, गुरु रविदास जी के दिव्य स्वरूप को परख कर, जो उपरोक्त वर्णन किया है, वही उन चमार लेखकों केलिये, चुल्लू भर पानी में डूब मरने केलिये काफी है, जिन्होंने, गुरु रविदास जी की हत्या किए जाने केलिये, गन्दे, मन्दे और अति अभद्र ही नहीं भद्दे शव्द लिखे हैं।
गुरु रविदास जी के समय में ही धर्मान्ध, कुतर्क करने वाले ब्राह्मण लेखकों की, नियत को भांप कर, स्वंय गुरु रविदास जी ने यों लिखा है:---
"पंडित मुल्ला जौ लिखि दिआ।
छांड़ि चले हम कछू न लिआ ।।
अंग्रेज इतिहासकार "मैंकालिफ़" लिखते हैं कि, "श्री गुरु रविदास साहिब का तेज, प्रताप एवं यश, एक सूर्य की भांति फैल गया है"। सर्वश्रेष्ठ गुरु रविदास जी की नेक व सुहिरद सोच के सामने कपटी, लालची और मॉनवता विरोधियों की एक भी नहीं चली"।
लेखक, ज्ञानी गुरचरण सिंह वैद जी भी अपनी पुस्तक, "गुरमुखी अख्खर भगत रविदास ने बनाए" में लिखते हैं कि, गुरवाणी द्वारा भगत रविदास जी के गुरमुखी भाषा केलिये अक्षर बनाना सिद्ध करता है कि, गुरु रविदास जी को, ब्राह्मणों ने देवनागरी लिपि को प्रयोग करने नहीं दिया था, इसी कारण उन्होंने नई गुरुमुखी लिपि ईजाद करके, उनको अपनी विलक्षणता से बुरी तरह शर्मसार किया था। उनकी विद्वता का क्रांतिकारी नाद, उनकी वाणी द्वारा पूर्ण रूप से समझा जा सकता है"। इन्होंने बड़े ही खूबसूरत शव्दों में लिखा है:----
"नाना ख्यान पुरान,
वेद विध चौतीस अख्खर माँहीं"।
उपरोक्त अमूल्य, शलाघ्य कमेंट, उन सवर्णों ने, लिखे, जिनके खिलाफ, गुरु रविदास जी ने खूनी क्रान्ति के शव्द रूपी मिजायल बनाए, मगर गुरु रविदास जी के वंशज कपूतों ने, गुरु जी के चरित्र को काले धब्बे लगाकर, उनके ऊपर तो अपनी गन्दी कलम की स्याही के छींटे फेंके ही हैं मगर उनसे हमारा दामन भी दूषित किया। काश ! हमारे कुल को दाग लगाने वालों को कुछ शर्म आती और कुछ होश आ जाती !
।।सोहम।। जय गुरुदेव।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
मई 13, 2020।
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