।।गुरु रविदास और पराधीनता मुक्त क्रान्ति।

।।गुरु रविदास और पराधीनता मुक्त क्रान्ति।।
गुरु रविदास जी महाराज के, वहुद्देशीय, बहुमुखी क्रांतिकारी आंदोलन का महत्वपूर्ण विषय था, युरेशयन की पराधीनता को नेशतनाबूद करके मूलनिवासियों को स्वतंत्र करवाना था, क्योंकि मूलनिवासियों के ऊपर धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक गुलामियों को थोंप कर, शूद्र वर्ण को केवल सेवादार बनाकर रखा गया है, वे जानते थे, कि वहुजन समाज की सभी समस्याओं का मूल कारण केवल मुसलमान और राजाओँ की दोहरी पराधीनता ही है और वह भी सबसे अधिक क्रूर ब्राह्मणों की। तीनों वर्णों को शिक्षा, शास्त्रविद्या से वंचित रखा गया है, तीनों वर्णों को शिक्षा विहीन रखा गया है क्योंकि वे कहते हैं कि :----
सत विद्या को पढ़े, जउ प्राप्त करै सदा गिआन।
रविदास, बिन विद्या के ,नर कु जान अनजान।।
गुरु रविदास जी जानते थे कि, ब्राह्मणों ने ही, वीर राजपूतों को भी बुरी तरह गुलाम बनाने केलिये शास्त्र विद्या से वंचित रखकर, शस्त्र विद्या तक ही सीमित रखा हुआ है और उनकी जनसंख्या कम करने लिए, उन्हें ही युद्धों में झोंकने की नीति बनाई हुई है। उन्होंने, वाणियों को भी शास्त्रों की शिक्षा पर प्रतिबंध लगाकर, शिक्षा अर्जित करने से वंचित करके, उनके ज्ञान चक्षु बन्द करके रखे हुए हैं, ताकि राजनीति की बात ही ना सोच सकें। वे जानते थे कि जब तक सभी तीनों वर्ण मूर्खता के अंधकार में डूबे रहेंगे तब तक हम अप्रत्यक्ष रूप से राज करते रहेंगे, ज्यों ही ये तीनों वर्ण ज्ञान की बातें सीख जाएंगे, त्यों ही ब्राह्मणों की गुलामी के दिन भी शुरू हो जाएंगे। यह बात आज सत्य सिद्ध हो चुकी है। अगर राजपूत, वनियाँ, ब्राह्मणों का साथ छोड़ दें तो ये सभी बुरे कर्मों की सजा भुगतने लग पड़ेंगे मगर इन दोनों ही वर्णों को समझ नहीं आ रही कि वाणियां मोहनदास करमचंद गांधी ब्राह्मणों ने प्रयोग किया और मार दिया, नेहरू परिवार मरवा दिया, लाल बहादुर शास्त्री मरवा दिया, सुभाषचंद्र बोस मरवा दिया, डाक्टर भीमराव अंवेदकर को अपनी ब्राह्मण कन्या देकर भी मरवा दिया, बेताज बादशाह साहिब कांशीराम मरवा दिया, साहिबे कलाम मंगू राम मुगोबाल और स्वामी अच्छूतानंद जी महाराज कंगाली की हालत में मरवाए गए। गुरु रविदास जी की नीतियों को तीनों वर्णों ने हलके में लेकर जो अपनी बर्बादी की है, उसकी भरपाई करना बड़ी कठिन है। गुरु रविदास जी ने तीनों वर्णों की गुलामी को देखते हुए कहा था:-----
पराधीनता पाप है, जान लियो रे मीत।
रविदास पराधीन से, करै ना कोई प्रीत।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, हे मित्रो ! गुलामी सबसे बड़ा पाप है, गुलामों से कोई मित्रता नहीं करता है, कोई उनसे प्यार नहीं करता मगर जानबरों की तरह काम लेकर, दिन रात कोहलू के बैल की तरह प्रयोग करके मार दिया जाता है। इसलिए, कोहलू का बैल बनना त्याग दो, गुलामी की जंजीरों, बेड़ियों को तोड़ दो, पशुओँ की जिंदगी जीना छोड़कर स्वाभिमान की जिंदगी जिओ। तुम गुलाम हो, मैं तुम्हें गुलामी का अहसास करवा कर आजाद करने आया हूँ, तुम्हें गुलामी की आदत पड़ चुकी है जिसे समझाने आया हूँ। वे आगे कहते हैं:----
पराधीनता को दीन जन, क्या पराधीन है बेदीन।
रविदास दास पराधीन को, सभी समझें हीन।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, जो लोग गुलाम हैं, वे नहीं जानते हैं कि, गुलाम कौन होता है ? विधर्मी कौन होता है ? रविदास जी समझाते हैं, कि गुलाम को सभी नीच और सबसे गिरा हुआ घटिया समझा जाता है। गुरु रविदास जी आगे कहते हैं कि:----
रविदास मानुष बसन कूं, सुख कर हैं दुइं ठाँव।।
इक सुख है स्वराज माहिं, दूसर मरघट गाँव।।सन्त रें ज्ञानी सुखवीर सिंह के अनुसार, गुरु नानकदेवजी के प्रकाश से पहले जो भक्ति लहर चली थी उसमें कबीर फरीद रविदास नामेदव सधना सेन त्रिलोचन रामानंद धन्ना सूरदास आदि प्रसिद्ध सन्तों ने इस भक्ति लहर द्वारा विदेशी हकूमत को खोखला कर दिया था।डाक्टर हरनेक सिंह कलेर के अनुसार, गुरु रविदास जी की शिष्य परंपरा की लड़ी में साधारण लोगों के अतिरिक्त उस समय की प्रसिद्ध विभूतियों स्वामी रामानंद सतगुरू कबीर सैन धन्ना पीपा रानी झालाबाई मीराबाई गुरु नानकदेव कमाल कमाली के नाम लिए जाते। भक्ति आंदोलन से ही, गुरु रविदास जी के नेतृत्व में, सन्तों ने मुगल बादशाहों को अत्याचार करने से रोक दिया था। उनकी प्रत्यक्ष पराधीनता से प्रजा को मुक्त करवा दिया था। गुरु रविदास जी ने प्रजा के सुख के दो ही स्थान बताए हैं:-----
इक सुख है स्वराज माहिं, दूसर मरघट गांव।
रविदास जु है बेगमपुरा, उह पूरन सुख धांम।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि आदमी को सुख आजादी में मिलता है या फिर श्मशान घाट में। स्वर्ग वहीं होता है, जहां किसी को कोई दुख दर्द नहीं होता वही देश सुख का घर होता है, जो प्रजा को दुर्लभ ही होता है।
।।सोहम।।जय गुरुदेव।।
रामसिंह शुक्ला।।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।

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