।।गुरु रविदास जी और मूलनिवासी शूरवीर।।

।।गुरु रविदास और मूलनिवासी शूरवीर।।
गुरु रविदास जी महाराज के समय तक, किसी भी मूलनिवासी शूरवीर की गाथा सुनने केलिये, उपलब्ध नहीं है, होंगी तो सही मगर ब्राह्मण लेखकों ने कहीं भी किसी भी पुस्तक में, उनका जिक्र तक, कभी नहीं किया है, इसी कारण कोरेगांव की घटना का हमें, अभी पता चला, जब उस विराट विजय के दो सौ साल बीत चुके हैं। भारत के लेखकों ने कभी हमारे वीर योद्धाओं औऱ महापुरुषों को लाइमलाइट में लाने का प्रयास नहीं किया जिसके कारण वे भूतकाल के गर्त में डुबो दिए गए। इस का मुख्य कारण यही रहा है कि, मूलनिवासियों के हाथ और कलम मनुस्मृतियों के काले कानूनों के द्वारा चलाना बन्द कर दिए थे। सिंधुघाटी की लिपि छीन ली थी, लिखने, पढ़ने का अधिकार छीन लिया था, जिस अधिकार को, गुरु रविदास जी ने, गुरमुखी लिपि ईजाद कर, खुद लिखकर, खुद पढ़, पढ़ाकर, पुनः स्थापित किया था। उसी कारण मूलनिवासी लेखन की पुनः शुरुआत हुई। गुरु रविदास जी ने, सबसे पहले ही, मनुबाद के खिलाफ़ झंडा उठाया, उसे लेकर, अकेले ही, ब्राह्मणवाद के अत्याचारों के खिलाफ भयानक जंग शुरू की मगर, हमारे आदिधर्मी, आदिवासी, मूलनिवासी, उनके ऐतिहासिक क्रांतिकारी आंदोलन को समझ ही नहीं सके और ना ही, गुरु जी साथ, उसे गति देने का प्रयास किया। गुरु रविदास जी महाराज ने स्वयं ब्राह्मणवाद की तानाशाही और अत्याचार सहन किए थे, उन्होंने अपनी सफलता के लिए, जनमत तैयार करने केलिये, सन्त जीवनदास जी और सन्त रैदास जी के साथ, देश-विदेश में निरन्तर, पैदल भ्रमण किया और जनचेतना जागृत की। अपनी वीर रस की रचनाओं के द्वारा, उन्होंने रसातल की गई, वीर भावना को, अछूतों के रक्त में संचारित किया। गुरु रविदास जी महाराज ने शूरवीर की विशेषताओं का वर्णन इस प्रकार किया है:----
रविदास सोई सूरा भला, जउ लरै धरम के हेत।
अंग अंग काटि भुइँ गिरै, तउ बी ना छाँड़ै खेत।।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, शूरवीर, बहादुर वही अच्छा होता है, जो सत्य की जीत केलिये, असत्य से युद्ध करता है, सत्य का निर्वहण करना शूरवीर का ही धर्म है अर्थात जो धर्म केलिये लड़ाई लड़ता है जिसमें, उसके शरीर का एक एक अंग कट जाता है, तब भी वह रणक्षेत्र छोड़कर नहीं भागता है। गुरु रविदास जी इन दो पंक्तियों में वहुत सी बातें कह गए हैं, पहले तो कहने वाले गुरु रविदास जी की ही वीरता का अनुमान लगाया जा सकता है कि वे कितने, आध्यात्मिक शक्ति रखते थे ? कितने बाहुबली भी थे ? कितने मॉनसिक रूप से ताकतवर थे ? कितने निडर थे ? कितने दूरदर्शी थे ? और किस प्रकार वे मुर्दों में भी वीरता का संचार करके, नस नस में रक्त की रवानी तेज कर देते थे ? गुरु रविदास जी, कांशी में, अपनी जीत की खुशी में, भगवान की स्तुति में लिखते हैं:-----
ऐसी लाल तुझ बिन काऊन करै।
गरीब नवाजु गुसैंइयाँ मेरा,
मात्थे छत्र धरै।।रहाउ।।
जा की छोत जगत कउ लागै,
ता पर तुहि ढरै।।
नीचहूँ ऊंच करै मेरा गोविंद,
काहू ते न डरै।।
नामदेव कबीरु त्रिलोचनु,
सधना सैन तरै।।
कहि रविदास सुनहु रे संतहु,
हरि जिउ ते सभी सरै।।
प्रोफेसर लालसिंह जी गुरु रविदास जी की धीरता, गंभीरता, वीरता, निडरता, दृढ़ता और निर्भयता (वाणी गुरु रविदास अते तत्त सिद्धान्त, पृष्ठ-251) के विचारों के अनुसार यह छुआछूत, जातिपाति, हिन्दू धर्म के "भगवान ब्रह्मा" की बनाई हुई है (ऋग्वेद 10-90-11-12) ब्रह्मा स्वयं प्रभु की ही सृजना करता है। इसलिए छुआछूत केवल मनुष्य ने बनाई है, प्रभु ने नहीं।इन शव्दों में गुरु जी ने हिन्दू धर्म को अस्वीकार किया है तथा इसके स्थान पर एक नई धर्म-विचारधारा विकसित की, जो संपूर्ण विश्व के लिए है, यह एक क्रांतिकारी बदलाव है। जिस मनुष्य की छूत सारे संसार को लगती हो, ऐसे अछूत मनुष्य पर भी हे ! प्रभु, आप स्वयं ही कृपा करते हो। हे, भाइयो ! मेरा गोविंद नीच मनुष्यों को भी ऊंचा बना देता है। छोटे से बड़ा बना देता है। वह किसी से भी नहीं डरता है। गुरु रविदास जी स्पष्ट कहते हैं कि, इस नए मॉनव धर्म को महत्वपूर्ण विचारधारा के कारण ही यहां अनेक सन्त नामदेव, कबीर, त्रिलोचन, सधना, सेन आदि इस संसार-सागर से पार उतर गए हैं।
इसलिए गुरु रविदास जी सन्तों को संबोधित करते हुए फरमाते हैं कि, हे सन्तों सुनो ! प्रभु बड़ी बड़ी अलोकिक घटनाएं करता है, (अछूतों को राजगुरु बना देता है) अन्याय को समाप्त कर देता है। ऐसा करते समय वह किसी से नहीं डरता है क्योंकि वह सब कुछ करने में समर्थ है।इसलिए प्रभु का सिमरन सबको निर्भय बना देता है। इसलिए आप भी इस नई विचारधारा के अनुसार समाज को निर्भय बनाकर अन्यायपूर्ण विचारधारा को बदलने के लिए एक क्रान्ति मचा दो। यही आज के युग की जरूरत है।
गुरु रविदास जी महाराज, वहुजन शूरवीर की विशेषताओं के बारे में आगे फिर, बड़े ही सुंदर ढंग से और वीर रस में लिखते हैं कि:----
धरम हेत संगराम मंह, जउ दुश्मन काटे, कटाए सीस।
सउ जीवन सुफला भया, रविदास मिलिहिं जगदीश।।
गुरु रविदास जी धर्म अर्थात सत्य के मार्ग पर चलते हुए, जो अपने कर्म को संपन्न करने केलिये संग्राम करते करते, दुश्मन के सिर को काट देता है और आवश्यकता पड़ने पर, खुद भी अपने शीश को कटवा लेता है, गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, उन्हीं का जीवन सफल होता है, उन्हीं को भगवान मिलते हैं।
गुरु रविदास जी महाराज इस दोहे में अपने विराट स्वरूप को प्रकट करते हुए कहते हैं, कि वे कितने भगवान के भगत थे ? कितने खूनी क्रान्ति के समर्थक थे ? कितने सहनशील थे ? वे तो शांति केलिये शांति के समर्थक थे और हिंसा के साथ हिंसा करने के पक्ष में थे मगर ब्राह्मणों ने तो उनकी क्रांतिकारी विचारधारा को दबाने केलिये, उन्हें चमत्कारों की काल्पनिक कथाओं के सृजन से मंदिर के देवता और भगवान के भगत, पुजारी बनाकर, वहुजन समाज की आवाज को अपने जनेऊओं की सत्यता सिद्ध करने, गंगा की सत्यता, प्रमाणिकता, पवित्रता सिद्ध करने में ही उलझा कर, उनकी अति खूनी तलवार की धार को मद्धिम कर दिया, इसलिए हमें जरूरत है कि, गुरु रविदास जी महाराज के क्रांतिकारी मिशन को जन जन तक पहुंचाएं, घर घर जा कर समझाऐं ताकि बेगमपुरा बसाया जा सके।
।।सोहम।।जय गुरुदेव।।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।।





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