।।गुरु रविदास महाराज की धार्मिक क्रान्ति।।

    ।।गुरु रविदास और धार्मिक क्रान्ति।।
गुरु रविदास जी महाराज से पूर्व, विश्व में चार महाशक्तियों का आविर्भाव हो चुका था, पहले थे आदिकाल के आरंभ में आदिपुरुष जिनके सपुत्र जुगाद हुए उसी चँवर वंश में सिद्ध चानो के बाद गुरु रविदास जी हुए, दूसरे पच्चीस सौ वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध, तीसरे पैगम्बर मुहम्मदुरसूलुल्लाह, चौथे ईसा मसीह, जिन्होंने भारत, अरब और यूरोप देशों में, धार्मिकता को स्थापित करने केलिये, जीवन कुर्बान किया था, जिनके अवसान के उपरांत, इन्हीं अवतारों को, धर्मों के गाड़ फादर घोषित करके, आदिधर्म, बौद्ध धर्म, इस्लाम धर्म और क्रिश्चन धर्म अस्तित्व में आए। इन चारों धर्मो और इनके मूलाधार अवतारों का यहाँ जिक्र करना इसलिए जरूरी है कि, इन्होंने भी गुरु रविदास जी से पहले आध्यात्मिक सिद्धांतों की शुरुआत की थी। बौद्ध धर्म, इस्लाम धर्म और क्रिश्चियन धर्मो के सिद्धांतों को लेकर इन महापुरुषों ने, जो धार्मिक आंदोलन शुरू किए थे, अपने मतों का जो प्रचार-प्रसार किया, उनके बाद उन्हींके शिष्यों में धार्मिक मतभेदों के कारण जो वैचारिक टकराब हुए उनके परिणाम सन्तोषजनक नहीं निकले। इन विचारधाराओं के जो आपस में तनाव हुए उनसे मॉनव एक दूसरे का दुश्मन बन कर, एक धर्म दूसरे धर्म के अनुयायियों का हित ना करके अहित अधिक करता हुआ नजर आ रहा है।
भारत में अनादिकाल से आदिधर्म चला आ रहा था, जिसमें ना तो उस समय कोई बिखराव था और ना ही आज है मगर युरेशयनों ने, भारत मे आकर उसे बुरी तरह तबाह करके अपना, अमानवीय धर्म तंत्र लागू करके, मूलभारतीय सिद्धांतो को नष्ट कर दिया है, आदिधर्म का आदर्श मूलमंत्र, कभी भी आपस में, वैमनष्यता, शत्रुतापूर्ण, शोषण, अत्याचार, व्यभिचार, कत्लोगारद, को जीवन में कोई स्थान नहीं देता। भले ही, पाँच हजार सालों से, युरेशयन लोगों ने भारत में आकर छलबल से सत्ता छीन ली है, सम्राट शिव को छलबल से मारा, राजा बलि ने, वचन देने पर सारा राजपाठ देदिया मगर उन्होंने नारी और भिखारी पर हाथ, कभी नहीं उठाया, ना ही भिखारी को खाली हाथ भेजा, जिसकी सजा आज भारत के मूलनिवासी भुगत रहे। आदिधर्म, क्रिश्चन धर्म और इस्लाम धर्म, तीनों एकेश्वरवाद में विश्वास रखते हैं, तीनों के सिद्धांत मिलते जुलते ही हैं मगर जितने इस्लाम धर्म के अनुयायी बादशाह भारत में आए, उन्होंने ब्राह्मणवादी राजनीति से समझौता करके, इंसानियत को दरकिनार करके, ब्राह्मणवाद का ही साथ दिया था और मूलभारतीयों केलिये, वे कहर बनकर पेश आए थे। उनके लिए निर्दयी मनुवादियों की मनुस्मृतियों और मुस्लिमों के अति कठोर व्यवहार में कोई अंतर नहीं मिला। इतिहासकार शम्सुल और बद्री नारायण मानते हैं कि, बादशाहों में समानता का अधिकार नहीं था, जो मनुस्मृति से ही मेल खाता है, उधर इस्लाम में भी उच्च जातियों को ही महत्व दिया गया है। एक हजार साल पूर्व, ईसाइयों ने इस्लाम की आलोचना करना शुरू कर दी थी। कुरान और हदीस इस्लामी धार्मिक किताबों की विश्वनीयता पर सवाल खड़े किए गए थे। ब्रिटिश राज में प्रख्यात मुसलमान दार्शनिक, यथार्तवादी, समाज सुधारक, सैय्यद अहमद खान के अनुसार, हदीस मुसलमानों पर कानूनी रुप से बाध्य नहीं है। इस्लाम में पैगम्बर मुहम्मद के जीवन की भी आलोचना हुई। काफिरों (अविश्वासी) गैर मुसलमानों के प्रति दुर्व्यवहार औऱ हर किस्म के शोषण, सजाओं की अकाटय धार्मिक व्यवस्था है। आधुनिक इस्लामी राष्ट्रों में मानवाधिकारों के हनन की आलोचना हुई है। शरीयत कानूनों और दीगर इस्लामी रीति रिवाजों, महिलाओं, समलैंगिक, लोगों और धार्मिक नस्ली अल्पसंख्यक समुदायों की स्थिति पर भी इस्लाम, आलोचना का शिकार हुआ है। इस्लाम एक विशाल धर्म है मगर इसमें भी जातीय विखंडन, खूब भरा पड़ा हुआ है, जो आपस में, जनता को शांतिपूर्वक रहने नहीं देता है। मुख्य रूप से इसके भी दो खण्ड नजर आते हैं।
सुन्नी :-----इनकी संख्या 85 प्रतिशत है
सिया:-----इनकी संख्या 15 प्रतिशत है
इनके अतिरिक्त सूफी, अहमदिया, और अलाबी भी हैं, जिनकी संख्या तो नाममात्र ही है।
ईसाई धर्म भी परंपरा से निकला हुआ, समता और आडंबररहित एकेश्वरवादी धर्म है। प्रथम शताव्दी में फलिस्तीन से इसकी शुरुआत हुई है, जिस के अनुयायी ईसाई कहलाए। ईसा मसीह और इसके महापुरुषों की शिक्षाओं पर ये धर्म आधारित है। इस धर्म के भी तीन खण्ड हो चुके हैं।
कैथोलिक:----ये धर्माबलंबी, पोप को ही सर्वोच्च मानते हैं।
आर्थोडाक्स:-----ये रोम के पोप को नहीं मानते परन्तु अपने अपने राष्ट्रीय धर्म संघ के पैट्रिआर्क को मानते हैं और परंपरावादी होते हैं।
प्रोटेस्टेट:-----ये किसी भी पोप को नहीं मानते, ये केवल पवित्र बाईबल को ही मानते हैं और इसी में विश्वास रखते हैं।
विश्व के यही दो धर्म है जिनके अनुयायियों की विश्व मे जनसंख्या निम्नलिखित है:-----
1:----ईसाई विश्व मे दो अरब तीस करोड़ हैं।
2:----मुस्लिम अर्थात इस्लाम के अनुयायी, एक अरब छः करोड़ हैं।
इन दोनो ही धर्मो के कितने अनुयायी हैं, जो ईश्वर से डरने वाले हैं। कितने हैं जो अहिंसा में विश्वास रखते हैं। कितने हैं जो आपस में विखंडन का विरोद्ध करते हैं।
ईसाई:-----क्या सभी ईसाई विश्वनीय और योग्य हैं, कि बाईबल की समस्त मानवीय शिक्षाओं का अनुसरण करते हैं।
मुस्लिम:-----क्या मुस्लिम विश्वास योग्य ढंग से कुरान की सभी शिक्षाओं का अनुसरण करते हैं।
इस्लाम और ईसाई धर्म:----ईसाई और इस्लाम धर्म के अनुयायी, लगभग एक ही सिद्धान्त के पक्षधर हैं।
दोनों के नैतिक नियम एक समान हैं।
दोनों ही धर्म एकेश्वरवाद में विश्वास रखते हैं।
दोनो का लक्ष्य विश्व में राज करना है।
दोनो का इतिहास हिंसा से भरा हुआ है।
The religion of Peace नामक बेब साईट के प्रतिदिन के आंकड़े बताते हैं कि, इस्लाम धर्म के मानने वाले, हररोज चार से पाँच हिंसक घटनाएं अवश्य करते हैं।
Christian Terrorism नामक बेब साईट भी प्रतिदिन चार से पाँच ईसाई धर्म की आतंकवादी घटनाओं को दर्शाती हैं।
अब सवाल ये पैदा होता है, कि इस्लाम औऱ ईसाई धर्मों के नीति नियम एक जैसे ही हैं, फिर दोनो ही धर्म मॉनवतावादी होने का दम भरते आए हैं, दोनों ही एकेश्वरवादी हैं, फिर दोनो ही, विश्व में भी राज करते आए हैं, करते जा रहे हैं और भविष्य में भी करना चाहते हैं, जिसके लिए, इनके धर्मावरदार खून की नदियाँ बहाते आए हैं ! ऐसा क्यों ?
गुरु रविदास जी ने, इन धर्मो को बड़ी नजदीकी से देखा, परखा और चिन्तन किया है और अनुभव किया है, कि इनका जो लक्ष्य आदर्श मॉनवता की रचना करना है, वह तो नजरअंदाज होकर ही रह गया है। इनका उद्देश्य तो राज करके विश्व में अपने अपने धर्मो के झंडे लहराना है, जिसके लिए ये इंसानियत को भूलकर, हैवानियत का खेल खेलते आए हैं, जबकि धर्म को, इंसानियत को कोई आंच ना आए, उसकी रक्षा करनी चाहिए। दोनों ही धर्मो ने भारत के दार्शनिक, शांतिपूर्ण जीवन जीने वाले, मेहमानों को भगवान का रूप समझकर सेवा करके जीते हैं, उनको बुरी तरह नेशतनाबूद करते आए हैं, फिर इनके नीति नियम कहां और चले गए ?
इन्हीं यूरेशियन ने आदिपुरुष की आदिवासी, मूलनिवासी, छलकपट से दूर रहने वाली, जनता को अपनी विस्तारवादी नीति से क्यों, लहूलुहान किया। गुरु जी ने अनुभव किया कि, यदि विश्व मे एक ही धर्म हो और एक ही वैश्विक शासक हो तो, ये अमानवीय घटनाएं नहीं घटेंगी। इसीलिए गुरु रविदास जी ने, वैश्विक सरकार का प्रारूप तैयार किया था ताकि संसार के लोग निरंकुश, आतताइयों के जुल्मोसितम से बेमौत ना मरें, इन अति जाहिल लोगों की काली करतूतों के कारण मॉनवता शर्मसार ना हो और मॉनव ही नहीं सारी प्रकृति समरस होकर जीवनयापन करने से वंचित हो। इसीलिए गुरु रविदास जी ने जो संक्षिप्त"पोथीसाहिब" संविधान बनाया था, जिसका मूल था :----
ऐसा चाहूं राज मैं, जहाँ मिले सबन को अन्न।
छोट बड़ सब सम वसै तां रविदास रहे प्रसन्न।।
समूचे मॉनव जगत को गुरु रविदासजी ने सुखमय जीवन का रास्ता इन्हीं दो पंक्तियों में बताया था, वे इसी सिद्धान्त पर विश्व को बेगमपुरा बनाने का आह्वान करते हैं। वे धर्म और राजनीतिक को भी समरस करके ही, शासकों और धार्मिक नेताओं को, समझाते हुए कहते हैं कि, मॉनव योनि सौभाग्यवश ही मिलती है, जिसे खून खराबे में व्यर्थ बर्बाद नहीं करना चाहिए ,वे चाहते हैं कि इंसान, अपने जीवन को दुखों से ना भरे अपितु जीवन को सुखमय बनाकर ही जिए। गुरु रविदास जी आगे फिर फरमाते हैं :-----
हरि सो हीरा छांड़ि कर, करे आन की आस।
ते नर दोजख जाहिंगे, सति भाखै रविदास।।
इस्लाम और क्रिश्चन धर्म के हमलावरों द्वारा दबाई गई, कुचली गई वैश्विक कायनात को अपनी क्रांतिकारी वाणी में जागृत करते हुए, गुरु रविदास जी, फरमाते हैं कि, जो आदिपुरुष, गॉड, अल्लाह जैसे अमूल्य हीरे को छोड़ कर, तेती करोड़ देवताओं के नाम पर बनाए गए पत्थरोँ का ध्यान लगाते हैं, वे सभी, नंगे भूखे प्यासे रह कर इसी धरती पर नारकीय जिंदगी जीते हैं, जो लोग पत्थरोँ की पूजा करते हैं, वे लोग इसी धरती पर नारकीय जीवन व्यतीत करते हैं। जो भगवान जैसे अमूल्य हीरे को छोड़कर पत्थरों का ध्यान लगाते हैं, वहीं इसी धरती पर दुखों को गले लगाते हैं, जो कड़ी मेहनत करते हुए सोते-जागते, उठते-बैठते आदिपुरुष का नाम लेते रहते उन्हें कोई दुख नहीं सताता है।
।।सोहम।।जय गुरुदेव।।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।

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