।।गुरु रविदास जी और सामाजिक क्रांति।।
।।गुरु रविदास और सामाजिक क्रांति।।
गुरु रविदास जी ने अनुभव किया था कि, केवल भारत ही नहीं अपितु, समस्त विश्व, जातीय वर्ण- भेद, ऊंच-नीच, काले-गोरे, यूरोप-एशिया के अर्थहीन मूल्यों के कारण, विभाजित है, जिसे एक सूत्र में बांधने केलिये, प्रयास करना चाहिये।गुरु रविदास जी ने, सामाजिक मान्यताओं के विभिन्नताओं को ही मॉनव की एकता के रास्ते मे बाधा समझा। उन्होंने समझा कि, जब तक ये सामाजिक बाधाएं नहीं मिटेंगी तब तक, आपस में एक दूसरे को मॉनव जाति समझकर, सुखी नहीं रह सकेगा और आपस में कटता-फटता ही रहेगा। भारत में इंसान ही इंसान को हेय मानकर, उसके गले में हांडी बांध कर, पीठ के पीछे झाड़ू बांध कर चलने केलिये विवश किए हुए है, धार्मिक ज्ञान सुनने पर, इंसान के कानों में इंसान ही सिक्का भरता जाता है, इंसान की ओर देखने पर, इंसान ही इंसान की आंखें निकाल देता है, ऊंचे स्थान पर बैठने पर कीलें गाड़ी जाती, इंसान ने इंसान को गुलाम बनाकर रखा हुआ है, नंगे भूखे रखकर सारा दिन काम लेकर शाम को, केवल रूखी सुखी रोटी, लस्सी औऱ साग के साथ खाने केलिये दिया जाता है। गुरु रविदास जी ने गुलामी को पाप बताते हुए कहा:-----
पराधीनता पाप है, जान लेउ रे मीत।
रविदास पराधीन से, करै ना कोई प्रीत।।
यूरोप में गोरे इंसान काले लोगों के साथ भी पशुओँ जैसा व्यवहार करते हैं, अमीर, गरीबों को गुलाम बनाकर शोषण करते आ रहे हैं। अरब मुल्कों में भी सिया और सुन्नी विवाद ने इंसान का इंसान को दुश्मन बन रखा है।
गुरु रविदास जी ने, इसीलिए सामाजिक बुराइयों को समाप्त करके, इंसान को इंसान बनाने केलिये, रंग-भेद, जाति-भेद को समूल नष्ट करने केलिये, सामाजिक क्रांति को ही पहल दी, जिसकी सफलता केलिये, उन्होंने क्रांतिकारी जनआंदोलन शुरू करने का जो शंखनाद किया उसके आगाज से शूद्रों के हत्यारों, शोषकों को ही, सबसे पहले आड़े हाथों लिया और कहा:----
मात्थे तिलक हाथ जप माला, जग ठगने कू सवांग बनाया।
मारग छांड़ि कुमारग डहि कै, सांची प्रीत बिन राम ना पाया।।
मदिरों और मसीतों की सच्चाई को उजागर करते हुए, गुरु रविदास जी, अपनी क्रांतिकारी भावना को उजागर करते हुए, अपनी निर्भीक और स्वाभिमानी आत्मा की आवाज, में फरमाते हैं:-----
देहरा और मसीत मांहि रविदास ना सीस नवाय।
जिह लों सीस निवावना सो ठाकुर सभ थांय।।
गुरु जी वहुत बड़ी हिम्मत से, सामाजिक क्रांति को, गति देते हुए, समझाते हैं, कि मैं किसी भी मंदिर-मस्जिद में शीश नहीं झुकाता हूं क्योंकि, वहां कोई भगवान निवास नहीं करता है, निवास कोई करते हैं, तो केवल समाज को ठगने वाले ठग ही निवास करते हैं। जहां तक शीश झुकाने की बात है, शीश हर जगह झुका कर, अल्लाह की इबादत औऱ बन्दगी की जा सकती है क्योंकि, वह तो प्रत्येक जगह विद्यमान रहता है। गुरु रविदास जी विश्व के इंसानों को सही रास्ता बताते हुए, फरमाते हैं :-----
ऊँचे कुल कांरने ब्राह्मण कोय ना होय।
जउ जानी ब्रह्म आत्मा, रविदास ब्राह्मण सोय।।
गुरु रविदास जी उच्च वर्ण के घमंडियों, स्वयंभू ऊँचे कुलीन समझने वालों को क्रान्ति की तर्ज पर शान्ति से समझाते हुए फरमाते हैं कि, जो लोग ब्रह्म को पहचान कर, इंसानों की तरह जीवनयापन करते हैं, वही विद्वान होते है, किसी विशेष जाति में जन्म लेने पर कोई पूजनीय नहीं हो जाता है। वे आगे फरमाते हैं :----
रविदास जउ वेता ब्रह्म का सोई ब्राह्मण जान।
ब्रह्म ना जउ जानहिं, तउ ना ब्राह्मण मॉन।।
धरम करम जाने नाहिं, मन माहिं जाति अभिमॉन।
ऐसेउ ब्राह्मण सिओं भलो, रविदास श्रमुक हूँ जान।।
जिस समय ब्राह्मणों ने राजाओँ, बादशाहों को अपने अभिशापों के, भय से भयभीत कर रखा था, जिनके आदेश से कोई क्रांतिकारी शव्द तक मुंह से निकाल ही नहीं सकता था, उसी तानाशाही युग में, गुरु रविदास जी ने धोती और तिलक लगाकर, ब्राह्मण बनने का स्वांग (ढोंग) रचा औऱ समूचे संसार के ढोंगियों के ढोंगों को उजागर करने केलिये, क्रांतिकारी आंदोलन का उद्घोष किया था। वे शालीनता से फरमाते हैं कि, जो मॉनवतावादी ज्ञान रखता हो वही ज्ञानी होता है। जो लोग धर्म-कर्म की पवित्रता और भाव के लक्ष्य को नहीं जानते हैं, वे ब्राह्मण नहीं होते। वे आगे अपने क्रांतिकारी कारवाँ को ले जाते हुए ब्राह्मणों की सत्यता को उजागर करते हैं:-----
काम क्रोध मद लोभ तजि, जो करहि धर्म की कार।
सोई परम ब्रह्म, ब्राह्मण जानहिं, कहि रविदास विचार।।
गुरु जी पाखंडियों को लताड़ते हुए कहते हैं कि, जो कामवासनाओं को त्याग कर, क्रोध, ममता लोभ छोड़कर, धर्म कर्म करते हैं, वहीं ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण होते हैं। वे क्षत्रियों की पहचान बताते हुए फरमाते हैं:----
दीन दुखी के हेत, जो बारे अपने प्राण।
रविदास वही सूर कूं, साँचा छत्री जान।।
अंग अंग कटावहि, जउ दीनन के हेत।
रविदास छत्री सोई जानिए जउ छाड़ै नहीं खेत।।
गुरु जी फरमाते हैं कि, जो दुखियों, पीड़ितों के दुखों को दूर करने केलिये, प्राणों का बलिदान करते हैं, वही असली वीर, धीर, गंभीर क्षत्रिय होते हैं।
गुरु रविदास जी महाराज, वैश्यों की पहचान बताते हुए कहते हैं कि:-----
रविदास वैश सोई जानिए, जउ सत कार कमाय।
पुण्य कमाई सदा लहै, दोई सरवत सुखाय।।
सांची हाटी बैठी करी, सौदा सच्चा देई।
तकड़ी तोले साँच की,रविदास वैश ना कोई।।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, वाणियां वही है जो सच्चा कर्म करता है, जो केवल पवित्र कमाई लेता है अर्थात नाहक किसी की खून पसीने की कमाई को नहीं लूटता है। जो सत्य के आधार पर सामान बेचता है, उसकी ही सच्ची दुकान चलती है। गुरु रविदास जी ने, वाणी रूपी हथियारों से, सामाजिक क्रांति को सफल बनाने का, जो क्रांतिकारी अभियान चलाया, उसने बड़े बड़े शहंशाहों, बादशाहों को भी झुकाना शुरू कर दिया था।
।।सोहम।।जय गुरुदेव।।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
गुरु रविदास जी ने अनुभव किया था कि, केवल भारत ही नहीं अपितु, समस्त विश्व, जातीय वर्ण- भेद, ऊंच-नीच, काले-गोरे, यूरोप-एशिया के अर्थहीन मूल्यों के कारण, विभाजित है, जिसे एक सूत्र में बांधने केलिये, प्रयास करना चाहिये।गुरु रविदास जी ने, सामाजिक मान्यताओं के विभिन्नताओं को ही मॉनव की एकता के रास्ते मे बाधा समझा। उन्होंने समझा कि, जब तक ये सामाजिक बाधाएं नहीं मिटेंगी तब तक, आपस में एक दूसरे को मॉनव जाति समझकर, सुखी नहीं रह सकेगा और आपस में कटता-फटता ही रहेगा। भारत में इंसान ही इंसान को हेय मानकर, उसके गले में हांडी बांध कर, पीठ के पीछे झाड़ू बांध कर चलने केलिये विवश किए हुए है, धार्मिक ज्ञान सुनने पर, इंसान के कानों में इंसान ही सिक्का भरता जाता है, इंसान की ओर देखने पर, इंसान ही इंसान की आंखें निकाल देता है, ऊंचे स्थान पर बैठने पर कीलें गाड़ी जाती, इंसान ने इंसान को गुलाम बनाकर रखा हुआ है, नंगे भूखे रखकर सारा दिन काम लेकर शाम को, केवल रूखी सुखी रोटी, लस्सी औऱ साग के साथ खाने केलिये दिया जाता है। गुरु रविदास जी ने गुलामी को पाप बताते हुए कहा:-----
पराधीनता पाप है, जान लेउ रे मीत।
रविदास पराधीन से, करै ना कोई प्रीत।।
यूरोप में गोरे इंसान काले लोगों के साथ भी पशुओँ जैसा व्यवहार करते हैं, अमीर, गरीबों को गुलाम बनाकर शोषण करते आ रहे हैं। अरब मुल्कों में भी सिया और सुन्नी विवाद ने इंसान का इंसान को दुश्मन बन रखा है।
गुरु रविदास जी ने, इसीलिए सामाजिक बुराइयों को समाप्त करके, इंसान को इंसान बनाने केलिये, रंग-भेद, जाति-भेद को समूल नष्ट करने केलिये, सामाजिक क्रांति को ही पहल दी, जिसकी सफलता केलिये, उन्होंने क्रांतिकारी जनआंदोलन शुरू करने का जो शंखनाद किया उसके आगाज से शूद्रों के हत्यारों, शोषकों को ही, सबसे पहले आड़े हाथों लिया और कहा:----
मात्थे तिलक हाथ जप माला, जग ठगने कू सवांग बनाया।
मारग छांड़ि कुमारग डहि कै, सांची प्रीत बिन राम ना पाया।।
मदिरों और मसीतों की सच्चाई को उजागर करते हुए, गुरु रविदास जी, अपनी क्रांतिकारी भावना को उजागर करते हुए, अपनी निर्भीक और स्वाभिमानी आत्मा की आवाज, में फरमाते हैं:-----
देहरा और मसीत मांहि रविदास ना सीस नवाय।
जिह लों सीस निवावना सो ठाकुर सभ थांय।।
गुरु जी वहुत बड़ी हिम्मत से, सामाजिक क्रांति को, गति देते हुए, समझाते हैं, कि मैं किसी भी मंदिर-मस्जिद में शीश नहीं झुकाता हूं क्योंकि, वहां कोई भगवान निवास नहीं करता है, निवास कोई करते हैं, तो केवल समाज को ठगने वाले ठग ही निवास करते हैं। जहां तक शीश झुकाने की बात है, शीश हर जगह झुका कर, अल्लाह की इबादत औऱ बन्दगी की जा सकती है क्योंकि, वह तो प्रत्येक जगह विद्यमान रहता है। गुरु रविदास जी विश्व के इंसानों को सही रास्ता बताते हुए, फरमाते हैं :-----
ऊँचे कुल कांरने ब्राह्मण कोय ना होय।
जउ जानी ब्रह्म आत्मा, रविदास ब्राह्मण सोय।।
गुरु रविदास जी उच्च वर्ण के घमंडियों, स्वयंभू ऊँचे कुलीन समझने वालों को क्रान्ति की तर्ज पर शान्ति से समझाते हुए फरमाते हैं कि, जो लोग ब्रह्म को पहचान कर, इंसानों की तरह जीवनयापन करते हैं, वही विद्वान होते है, किसी विशेष जाति में जन्म लेने पर कोई पूजनीय नहीं हो जाता है। वे आगे फरमाते हैं :----
रविदास जउ वेता ब्रह्म का सोई ब्राह्मण जान।
ब्रह्म ना जउ जानहिं, तउ ना ब्राह्मण मॉन।।
धरम करम जाने नाहिं, मन माहिं जाति अभिमॉन।
ऐसेउ ब्राह्मण सिओं भलो, रविदास श्रमुक हूँ जान।।
जिस समय ब्राह्मणों ने राजाओँ, बादशाहों को अपने अभिशापों के, भय से भयभीत कर रखा था, जिनके आदेश से कोई क्रांतिकारी शव्द तक मुंह से निकाल ही नहीं सकता था, उसी तानाशाही युग में, गुरु रविदास जी ने धोती और तिलक लगाकर, ब्राह्मण बनने का स्वांग (ढोंग) रचा औऱ समूचे संसार के ढोंगियों के ढोंगों को उजागर करने केलिये, क्रांतिकारी आंदोलन का उद्घोष किया था। वे शालीनता से फरमाते हैं कि, जो मॉनवतावादी ज्ञान रखता हो वही ज्ञानी होता है। जो लोग धर्म-कर्म की पवित्रता और भाव के लक्ष्य को नहीं जानते हैं, वे ब्राह्मण नहीं होते। वे आगे अपने क्रांतिकारी कारवाँ को ले जाते हुए ब्राह्मणों की सत्यता को उजागर करते हैं:-----
काम क्रोध मद लोभ तजि, जो करहि धर्म की कार।
सोई परम ब्रह्म, ब्राह्मण जानहिं, कहि रविदास विचार।।
गुरु जी पाखंडियों को लताड़ते हुए कहते हैं कि, जो कामवासनाओं को त्याग कर, क्रोध, ममता लोभ छोड़कर, धर्म कर्म करते हैं, वहीं ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण होते हैं। वे क्षत्रियों की पहचान बताते हुए फरमाते हैं:----
दीन दुखी के हेत, जो बारे अपने प्राण।
रविदास वही सूर कूं, साँचा छत्री जान।।
अंग अंग कटावहि, जउ दीनन के हेत।
रविदास छत्री सोई जानिए जउ छाड़ै नहीं खेत।।
गुरु जी फरमाते हैं कि, जो दुखियों, पीड़ितों के दुखों को दूर करने केलिये, प्राणों का बलिदान करते हैं, वही असली वीर, धीर, गंभीर क्षत्रिय होते हैं।
गुरु रविदास जी महाराज, वैश्यों की पहचान बताते हुए कहते हैं कि:-----
रविदास वैश सोई जानिए, जउ सत कार कमाय।
पुण्य कमाई सदा लहै, दोई सरवत सुखाय।।
सांची हाटी बैठी करी, सौदा सच्चा देई।
तकड़ी तोले साँच की,रविदास वैश ना कोई।।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, वाणियां वही है जो सच्चा कर्म करता है, जो केवल पवित्र कमाई लेता है अर्थात नाहक किसी की खून पसीने की कमाई को नहीं लूटता है। जो सत्य के आधार पर सामान बेचता है, उसकी ही सच्ची दुकान चलती है। गुरु रविदास जी ने, वाणी रूपी हथियारों से, सामाजिक क्रांति को सफल बनाने का, जो क्रांतिकारी अभियान चलाया, उसने बड़े बड़े शहंशाहों, बादशाहों को भी झुकाना शुरू कर दिया था।
।।सोहम।।जय गुरुदेव।।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
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