।।गुरु रविदास और उनकी हत्या लिखना एक षडयंत्र।।

गुरु रविदास जी महाराज,151 साल के वयोवृद्ध हो चुके थे, सम्मत 1583 में जब बाबर गुरु जी के दर्शन करने कांशी आया, उस समय गुरु रविदास जी इतने क्षीण हो चुके थे कि, वे बादशाह बाबर के साथ कोई लंबी चौड़ी वार्ता नहीं कर सके, लगता है कि गुरु जी इतने सक्षम नहीं थे कि, वे अपनी क्रांतिकारी वाणी में बाबर को झिड़कियां दे सकें, वे पानीपत के युद्ध में हुए रक्तप्रवाह से अति विदीर्ण हो गए थे, राणा सांगा और उसके राजपूत सैनिकों को तोप के गोलों से धराशायी करने के कारण, वे वहुत परेशान थे मगर उस समय वे कुछ भी बोलने में असमर्थ थे क्योंकि शरीर कुछ भी बोलने की अनुमती नहीं दे रहा था। इसीलिए जब बाबर उनके दर्शन करने केलिये वहां खड़ा था, उस समय वे बड़े ही अनमने ढंग से, बाबर के साथ पेश आए। गुरु जी ने बाबर के अभिवादन का उत्तर तो दिया, मगर उस पर मेहर भरी नजर नहीं डाली। बाबर के बार बार कुरेदने पर, गुरु जी ने उसे कहा, बाबर आपने पानीपत के युद्ध में जो खून बहाया है, उससे हम खुश नहीं हैं, क्या मिला तुझे बेगुनाहों का रक्तपात करके ? क्या आपको बेगुनाह सैनिकों की चीखें, आपके मन को वेचैन नहीं करतीं ? क्या उन माताओं के विलाप आपकी आत्मा को झकजोड़ नहीं रहे हैं ? क्या उनकी विधबाओं का क्रन्दन आपको रुला नहीं रहे ? जब संसार से जाओगे, तो क्या लेकर जाओगे ? कौन आपको याद रखेगा ? इतिहास आपको अपने पन्नों में काले अक्षरों में दफन करके सदा केलिये भूल जाएगा।
बाबर, हताश होकर गुरु रविदास जी महाराज के चरणकमलों पर धड़ाम से गिर पड़ा और क्षमायाचना करते हुए, गुरु रविदास जी के समक्ष तोबा तोबा करने लगा, बोला ऐ मेरे पीर मुझे बख़्श लो, मैं वहुत बड़े बड़े गुनाह कर चुका हूँ, मैं आपके दीदार के लिये तड़फता रहा, मगर दीदार तब करने आया जब मेरा पाप का घड़ा पूर्ण रूप से भर गया, मेरा अन्तर्मन का दरवाजा, आपके दर्शन से ही खुला, काश मैं वहुत पहले आपके दर्शन कर लेता तो शायद मेरी आँखें वहुत पहले ही खुल जाती और आज मैं गुनाहों के बोझ से नहीं दबता। ऐ मेरे परवरदिगार, अब भी मुझे मार्ग बता दो, मैं गाफिल आपके दर पर भीख मांगने आया हूँ। गुरु रविदास जी ने देखा कि, बाबर मोम बनता जा रहा है, गुरु रविदास जी ने क्रोधित होते हुए कहा, बाबर किए गए गुनाहों की सजा तो आपको भुगतनी ही पड़ेगी मगर आपका जो बाकी जीवन है उसे, आदर्श बादशाह की तरह ही बिताना और प्रजा को सुखी रख कर, उनके साथ न्याय करो, किसी की आत्मा को मत सताना, बस मुझे इतना ही आपको समझाना है। बाबर गुरु रविदास जी के चरणकमलों पर नतमस्तक होकर, अमृतजल की भीख मांगने लगा, गुरु जी ने एक काफर को इंसान बनाकर अमृजल देकर विदा किया।
बाबर ही अंतिम बादशाह निकला, जिसने सबसे अंत में गुरु रविदास जी के पास आत्मसमर्पण किया और भारत में, जब तक रहा, तब तक उस ने प्रजा को सुख शान्ति से रखा, सारी प्रजा को न्याय दिया।
अब प्रश्न ये पैदा होता है कि, राणा सांगा अमर हो चुका था, फिर वह कौन था ? जिसने गुरु जी को चितौड़गढ़ में कत्ल किया ? उस समय केवल बादशाह बाबर था, जिसने गुरु रविदास जी को अपना गुरु, पीर मॉन लिया था। क्या उसकी तलबार, गुरु रविदास जी के कातिल को माफ कर देती।
गुरु रविदास जी से प्रकांड पंडे पुजारी और ब्राह्मण गुरु गोरखनाथ, परमानंद, रामानंद पराजित हो चुके थे। गुरु रविदास जी ने आठ साल की आयु में ब्राह्मणों को गड़ाघाट पर बुरी तरह शास्त्रार्थ में हराकर दण्डित किया था वे तब, वच्चे को ही खुद मार नहीं सके थे और ना ही राजाओँ महाराजाओं से मरवा सके थे, तो वृदावस्था में कोई कैसे कत्ल कर सकता था। मीराबाई के देवर बिकमादित्य, भाई रतनसिंह आदि, गुरु रविदास जी के सामने, चल रहे सत्संग में, उनकी शिष्या को ही कत्ल नहीं सके थे और शव्द कीर्तन सुनते ही, आत्मविभोर हो गए थे। उनके द्वारा, कँवलों में छुपाए, बरछे, भाले तलवारें गिर कर, गुरु जी के सामने धरती पर पड़ गईं थीं, तो फिर अनुमान लगाया जा सकता है, कि क्या कोई गुरु रविदास जी का कत्ल कर सकता था ? क्या किसी में इतनी हिम्मत थी कि गुरूओं के गुरु को कत्ल कर दे ?
सिकन्दर लोधी जैसा खूनी, आतताई, निरंकुश, बादशाह, गुरु रविदास जी को तुगलकाबाद जेल में बन्द कर देता है ताकि जेल में रह कर ही शायद गुरु जी का हिरदय परिवर्तन हो जाए और दुखी होकर मेरे पास आत्मसमर्पण करके इस्लाम स्वीकार करके, इस्लाम को उन्नति की बुलंदियों पर ले जाएं मगर उसकी सोच भी असफल हुई। जब गुरु रविदास जी ने सिकन्दर लोधी को कहा था, "हिन्दू अंधा, मुस्लिम काणा", सिकन्दर लोधी, उसी समय कत्ल कर देता मगर सिकन्दर के अंदर भी दम नहीं था, कि वह गुरु रविदास जी को आजमाए बिना कोई गलत कदम उठाए। सिकन्दर लोधी खुद ही गुरु रविदास जी के सामने आत्मसमर्पण करते हुए, बिलख विलख कर रोता है और कहता है, ऐ मेरे परवरदिगार ! मुझ से वहुत बड़ी खता हो गई है, मुझे बालक समझ कर माफ कर दो।
राजा वैन ने पंजाब के गाँव खुरालगड़ में, गुरु रविदास जी, कबीर साहिब सेन जी, मीराबाई, सन्त रैदास जी ,सन्त जीवनदास जी के साथ, कैद करके, दण्ड दिया कि आपको चक्की में अन्न पीसना पड़ेगा, गुरु जी ने अपने साथी सन्तों के साथ, सजा को सिर मात्थे रखकर, चक्की चलाई मगर चक्की खुद ही चलती रही और राज्य का सारा अनाज पन्द्रह दिनों में ही पीस दिया, जिसने राजा को हैरत में डाल दिया, आटा भी पन्द्रह दिनों में ही खाकर प्रजा में त्राहिमाम मच गया, राजा वैन अपने किए पर तोबा तोबा करते हुए नंगे पैर खुरालगड़ आया और गुरु जी के चरणकमलों पर गिरकर माफी मांग कर, उनका मुरीद बन गया।
गुरु जी की शक्तियों से सारा इतिहास भरा पड़ा है, फिर भी उन्हें हत्या के जाल में उलझा कर, उनका कद छोटा करने का, कुछ लोग दुस्साहस कर रहे हैं और उनके खिलाफ दुष्प्रचार करते जा रहे, उनकी ये भावना गुरु रविदास जी के प्रति ईर्षा और जलन को ही दर्शाती है, मगर वे भूल गए हैं कि 22 जनवरी 2005 को, हिमाचल प्रदेश सरकार ने, सुप्रीमकोर्ट के गलत ही नहीं गुरु रविदास और चमार विरोधी, मानसिकता के कारण दिए गए, निर्णय को लागू करते हुए, गुरु रविदास मंदिर, गांव सन्तोसगढ़ जिला ऊना, हिमाचल प्रदेश को, दस हजार पुलिसकर्मियों के द्वारा गिराया था, जिसके दंडस्वरूप, गुरु जी ने 22 जनवरी की सुवह, चार बजे जिस जेसीबी के ड्राइवर ने, सबसे पहले मंदिर को गिराना शुरू किया था, वह तेरह अप्रैल सन 2005 को ही वैशाखी वाले दिन, नंगल डैम के पास ही गुरु रविदास चौक में, ट्रैक्टर पलटने से हुई दुर्घटना में अपनी दोनो टांगों को गंवा बैठा और जमीन हड़पने बाले ब्राह्मण परिवार के सात सदस्यों को 2009 में ही, इकठ्ठा नैनादेवी में खत्म कर दिया था, इसलिए गुरु रविदास जी की शक्ति को, आज के संदर्भ में भी अनुभव करके, आंका जा सकता है।
।।सोहम।।जय गुरुदेव।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।

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