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।।दुलभु जनमु पुन फल पाइउ।।

       ।।दुलभु जनमु पुंन फल पाइउ।।                ।।राग सोरठ।। गुरु रविदास जी महाराज मनुष्य जन्म को सर्वश्रेष्ठ सर्वोत्तम, सर्वोच्च जन्म मानते हैं। उन के अनुसार यह जन्म सौभाग्यशाली लोगों को ही मिलता है, क्योंकि मानव योनि के अतिरिक्त सभी योनियां हैं, इस की तुलना में नगण्य मात्र ही हैं। हिन्दू मतानुसार चौरासी लाख जीवों की योनियों के पास मनुष्य जैसी बुद्धि, विवेक और सोचने की शक्ति नहीं है। मॉनव जी तरह सभी प्राणियों में आपस में भी प्यार भी नहीं है। कुछ प्राणी तो अपने ही बच्चों को मार कर खा जाते हैं, इसलिए मानव योनि सभी योनियों में श्रेष्ठ योनि है। गुरु रविदास जी महाराज मानव जीवन के बारे में फरमाते हैं कि:--- दुलभु जनमु पुंन फल पाइउ, बिरथा जनम अविबेकै।। राजे इंद्र समसरि गरहि आसन, बिनु हरि भगति करहु किह लेखै।।१।। गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि मनुष्य जन्म अत्यंत दुर्लभ है, इस योनि का मिलना पुण्य (अच्छे) कर्मों का ही फल है, इसलिए अज्ञानता वश और मूर्खता के कारण इस जन्म को व्यर्थ में बर्बाद नहीं करना चाहिए। माया मोह में मोहित हो क...

जउ हम बांधे मोह फ़ास।।

     ।।जउ हम बांधे मोह फ़ास।।              ।। राग सोरठ।। इस शब्द के अध्ययन और विश्लेषण करने पर यह ज्ञात होता है, कि गुरु रविदास जी महाराज ने आदपुरुष के साक्षात दर्शन कर लिए थे, तब उन्होंने अनुभव किया था कि, ईश्वरीय मोह और आकर्षण किस प्रकार का होता है ? जब आद पुरुष से जीव का बंधन पड़ जाता है, तो बंधन  कभी भी नहीं टूटता है, मगर ईश्वर तो हर कदम पर जीव की परीक्षा लेता रहता है क्योंकि मनुष्य के साक्षात्कार (मिलन) के बाद भी काम, क्रोध, मोह, लोभ अहंकार और माया उस का साथ नहीं छोड़ती हैं और हर कदम कदम पर परिपूर्ण ज्योतिर्ज्ञान के संतो, महंतों और पैगंबरों की भी परीक्षा जारी रहती है, जिस के उदाहरण सतगुरु कबीर जी, सतगुरु नामदेव जी, सतगुरु मीराबाई जी हमारे सामने हैं। जब इन सभी महात्माओं ने आदपुरष के दर्शन कर लिए थे, तब भी इन को सामाजिक अत्याचारों का सामना करना पड़ा था मगर सभी अपने सन्मार्ग से कभी विचलित नहीं हुए थे और सांसारिक यातनाओं को सहन करते हुए जीवन व्यतीत करते रहे, अगर कोई कहे कि  मिलन के बाद मनुष्य को ईश्वर...

।।दूध त बछरे थनहू बिटारिउ।।

 ।।दूध त बछरे थनहू बिटारिउ।।           ।।राग गुजरी।। गुरु रविदास जी महाराज परमपिता परमेश्वर अर्थात आद पुरुष को सृष्टि का विधाता और हर वस्तु का निर्माता बताते हुए फरमाते हैं, कि हे आदपुरुष! आप सर्वश्रेष्ठ, सर्वोच्च कायनात के मालिक हो। मैं कुछ भी आपको अर्पित नहीं कर सकता हूं, क्योंकि सारी वनस्पति आप ने नहीं बनाई हुई है, उस में से कुछ भी आपको नैवेद्य करने लायक नहीं है। गुरुजी फरमाते हैं कि:--- दूध त बछरे बनहू बिटारिउ।। फ़ूलु भँवरि जलु मीनि बिगारिउ।।१।। तिलकधारी ब्राह्मण पंडे पुजारी मंदिरों में बैठ कर के खूब घंटे घड़ियाल बजा कर, मूर्तिकार द्वारा लोहे की छेनी से घड़ी गई, पत्थर की बनाई हुई मूर्तियों को धूप, दीप, कर के उन्हें भोजन अर्पित करते हैं। तरह-तरह के आडंबर और पाखंड कर के संगत को लूटते हैं मगर इन आडंबरों को देख कर के, गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि हे आदपुरुष! अगर आपको पवित्र दूध चढ़ाऊं तो वह पहले ही बछड़े ने जूठा कर रखा है, यदि फल, फूल अर्पित करूं तो उन को भी भ्रमरों ने जूठा कर दिया है, अगर आप को पवित्र गंगाजल से स्नान करवाऊं तो उस को भी मच्छलियों ने अ...

।। माटी को पुतरा कैसे नचतु है?

          ।।माटी को पुतरा कैसे नचतु है?              ।। राग आसा।। गुरु रविदास जी महाराज संसार को एक नाटक मंच मानते हुए फरमाते हैं, कि मानव इस मंच के ऊपर एक पुतले की तरह किस प्रकार नाचता है? यह पुतला मिट्टी से बना हुआ है, जिस प्रकार मिट्टी से असंख्य वनस्पति के पेड़, पौधे उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार इसी मिट्टी से मनुष्य का शरीर उत्पन्न होता है, इसी मिट्टी में जल, वायु, अग्नि और अकाश का संयुक्त योग होता है, जिस के मणिकांचन योग से ही शरीर बनते हैं। यह शरीर संसार रूपी मंच के ऊपर आ कर के अपना अपना अभिनय करने के लिए नर्तन करते हैं। सभी प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ प्राणी मनुष्य जब कुछ प्राप्त कर लेता है, तो बड़ा अहंकार और घमंड अनुभव करता है। खूब धन दौलत कमाता है और फिर जब ये माया खत्म हो जाती है, तो रोने लगता है, दुखी होने लगता है और इस प्रकार सांसारिक आकर्षणों में सम्मोहित हो कर के अपना सर्वस्व बर्बाद कर देता है, गुरु रविदास जी मानव जाति को समझाते हुए फरमाते हैं, कि यह मिट्टी का पुतला एक दिन नष...

हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरे।।

      ।।हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरे।।                 ।।राग आसा।। गुरु रविदास जी महाराज ने हरि शब्द का प्रयोग आदपुरष के लिए किया हुआ है इसीलिए उसकी महिमा का वर्णन करने के लिए इस शब्द में हरि का बार बार सात बार प्रयोग किया गया है। गुरु जी फरमाते हैं कि आदपुरुष सर्वगुण संपन्न है, वह परिपूर्ण गुरु भी है और उसकी रचना भी विस्मयकारी है। आदपुरुष ने जल थल के ऊपर जिस प्रकार जीव जगत की रचना की हुई है और वनस्पति को जंगलों में उत्पन्न किया है, वह उन की अलौकिक सोच समझ और बुद्धि का ही चमत्कार है। हरि को प्राप्त करने के लिए उन्होंने "सोहम" शब्द का अविष्कार किया है। "सो" का अर्थ है "वह" और हम का अर्थ है "मैं" अर्थात प्राणी की आत्मा। वास्तव में, हरि और जीव दोनों का मिलन ही पवित्र सोहम शब्द के जाप से होता है, क्योंकि गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि:--- सोहम, सोहम जप लै, सोहम सोहम जाप।। सोहम सोहम जपदे लभ लवेंगे आप।। उठत बैठत जागत सोवत जपिया सोहम जाप।। गुर ऐनक में नैन रचे तिस कोल वसै हरि आप।। गुरु रविदा...

।।कहा भइउ जउ तनु भइउ छिनु छिनु।।

  कहा भइउ जउ तनु भइउ छिनु छिनु।।                 ।। राग आसा।। गुरु रविदास जी महाराज संगत को समझाते हुए फरमाते हैं, कि ईश्वर को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को प्राणों तक को निछावर करना पड़ता है और अगर प्राणों का बलिदान करने के उपरांत भी यदि परम पिता परमेश्वर अर्थात आद पुरुष के दर्शन हो जाएँ, तो भी बहुत ही सस्ता सौदा होता है। गुरु जी ने स्वयं जिन लोगों के मन में ज्योतिर्ज्ञान का प्रकाश किया है, उन की कड़ी से कड़ी परीक्षा ली थी। महाराजा कुंभसिंह ने कई पाप और अपराध किए थे, परंतु जब उस पापी ने अपनी महारानी झालाबाई के मजबूर करने पर ज्योतिर्ज्ञान की दात ले ली, तब उसी के राज कुमार उदयसिंह ने जातीय घमंड के कारण कुंभ सिंह को कहा, कि पिताश्री आप चमार गुरु रविदास जी को छोड़कर किसी सवर्ण गुरु को अपना लो मगर महाराजा कुंभसिंह जानते थे, कि गुरु रविदास जी महाराज के सिवाय धरती के ऊपर कोई भी जो परिपूर्ण ज्योतिर्ज्ञानी गुरु नहीं है इसलिए उस ने राजकुमार उदय को कहा, बेटा! गुरु रविदास जी महाराज से श्रेष्ठ धरती के ऊपर कोई भी गुरु ...

।।तुम चंदन हम अरिण्डबापुरो।।

          ।।तुम चंदन हम अरिंड बापुरो।।                  ।।राग आसा।। गुरु रविदास जी महाराज ने ज्योतिर्ज्ञान के मुख्य स्रोत, साधु-संतों और संगत के आपसी संबंधों का वर्णन करते हुए, अनेकों सिद्धांतों का सृजन किया है। गुरु जी के अनुसार संत वही हैं जिस में ईश्वरीय गुण और पूर्ण ज्योतिर्ज्ञान हो, वह दूसरों को भी अपने ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित करता हो, अगर कोई ज्योतिर्ज्ञानी साधु संत संगत को तर्कसंगत अध्यात्मिक ज्ञान नहीं देता है, मधुर वाणी में शब्द कीर्तन कर के आनंदमयी रस की वर्षा नहीं करता है, तो वह आदर्श ज्योतिर्ज्ञानी गुरु नहीं है। गुरु रविदास जी महाराज परिपूर्ण परम पिता परमेश्वर ज्योतिर्ज्ञानी गुरु के आदर्शों का वर्णन करते हुए फरमाते हैं:--- तुम चंदन हम अरिंड बापुरे, संगि तुमारे बासा।।  नीच रुख ते ऊँच भय हैं, गंध सुगंध निवासा।।१।। गुरु रविदास जी महाराज साधु-संतों और आद पुरुष के बीच जो अंतर है, उस का वर्णन करते हुए फरमाते हैं, कि हे परमपिता परमेश्वर आद पुरुष जी...