।।तुम चंदन हम अरिण्डबापुरो।।
।।तुम चंदन हम अरिंड बापुरो।।
।।राग आसा।।
गुरु रविदास जी महाराज ने ज्योतिर्ज्ञान के मुख्य स्रोत, साधु-संतों और संगत के आपसी संबंधों का वर्णन करते हुए, अनेकों सिद्धांतों का सृजन किया है। गुरु जी के अनुसार संत वही हैं जिस में ईश्वरीय गुण और पूर्ण ज्योतिर्ज्ञान हो, वह दूसरों को भी अपने ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित करता हो, अगर कोई ज्योतिर्ज्ञानी साधु संत संगत को तर्कसंगत अध्यात्मिक ज्ञान नहीं देता है, मधुर वाणी में शब्द कीर्तन कर के आनंदमयी रस की वर्षा नहीं करता है, तो वह आदर्श ज्योतिर्ज्ञानी गुरु नहीं है। गुरु रविदास जी महाराज परिपूर्ण परम पिता परमेश्वर ज्योतिर्ज्ञानी गुरु के आदर्शों का वर्णन करते हुए फरमाते हैं:---
तुम चंदन हम अरिंड बापुरे,
संगि तुमारे बासा।।
नीच रुख ते ऊँच भय हैं,
गंध सुगंध निवासा।।१।।
गुरु रविदास जी महाराज साधु-संतों और आद पुरुष के बीच जो अंतर है, उस का वर्णन करते हुए फरमाते हैं, कि हे परमपिता परमेश्वर आद पुरुष जी! आप सुगन्धित चंदन की तरह सभी गुणों से परिपूर्ण हो जिस के पास हमारा निवास है अर्थात आप की सुगंध चंदन की सुगंध की तरह है, जिस के साए में बड़े बड़े विषियर नाग लटके रहते हैं, मगर फिर भी चंदन के पेड़ को जहर नहीं चढ़ता है। इसीलिये आप चंदन का स्वरूप हो और हम तुच्छ, विष अर्थात काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार आदि अबगुणों से भरपूर विषैले सांप और बेकार अरिण्ड के पौदे की तरह है, जो चंदन के पेड़ों के समीप होने पर चंदन की तरह सुगन्धित हो कर, निम्न स्तर के हो कर भी चंदन के ही उच्च गुणों वाले बन जाते है, इसी तरह संगत भी आप के साए में रह कर आप जैसे गुणों से भरपूर हो जाती है। (गुरु रविदास जी महाराज तो ज्योतिर्ज्ञान से परिपूर्ण स्त्रोत जन्मजात ही थे मगर वे सँगत का पक्ष आदपुरष के पास रखते हुए ही फरमाते हैं)
माधउ सतसंगति सरनि तुमारी।।
हम अउगन तुम उपकारी।।१।। रहाउ।।
गुरु रविदास जी महाराज संगत के प्रतिनिधि के रूप में आद पुरुष के समक्ष अनुनय विनय करते हैं, कि हम सांसारिक लोग अबगुणों के भंडार हैं और आप सभी का उपकार करने वाले हो, आप सभी की भलाई करते हो इसीलिए हे परमपिता परमेश्वर, ज्योतिर्ज्ञान के पुंज! हम आप की सत अर्थात अच्छी संगत देख कर आपकी शरण में आए हुए हैं, इसलिए हमारे ऊपर कृपा करके हमें बख्श लो।
तुम मखतूल सुपेद सपीअल
हम बपुरे जस कीरा।।
सत संगति मिली रहीऐ माधउ,
जैसे मधुप मखीरा ।।२।।
गुरु रविदास महाराज आदपुरष की विशेषताओं का वर्णन करते हुए फरमाते हैं कि, है आदपुरुष आप सफेद चादर की तरह निष्कलंक हैं, आप के दामन पर कोई दाग नहीं है, आप सफेद और पीले रंग के रेशम की तरह बेदाग हैं और हम तो अबगुणों से भरे हुए कुरूप कीड़े जैसे हैं। गुरु रविदास जी महाराज सँगत की ओर से आदपुरष के समक्ष फरियाद करते हुए फरमाते हैं, कि हे आदपुरष! धरती के ऊपर लोग अबगुणों से भरे हुए हैं, आप कृपा करके इनको अपनी संगत मैं शामिल कर लो, ताकि ये लोग आपकी अच्छी संगत में, मधुमक्खियां की तरह मिलजुल कर रहें अर्थात जिस प्रकार मधुमक्खियां शहद के छत्ते में इकठ्ठा हो कर मिल कर रहती हैं वैसे ही हम भी रहें, उन की तरह ही मिलजुल कर दुश्मन का मुकाबला करें।
जाति उछा पाती उछा,
उछा जनम हमारा।।
राज राम की सेव ना किन्हीं,
कहि रविदास चमारा।।३।।३।।
गुरु रविदास जी महाराज अछूतों का पक्ष रखते हुए परम पिता परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं कि हे आदपुरष! अछूतों की जाति और पहचान निम्न है और इन का कार्य भी निम्न स्तर का है। इन लोगों का जन्म भी अछूत परिवारों में हुआ है और इन्हें अशिक्षित रख कर के मूर्ख और गंवार बनाया हुआ है। इसी अनपढ़ता और मूर्खता के कारण इन्होंने ना तो आपकी सेवा की है और ना ही आप की भक्ति की है, इसलिए मैं रविदास चमार, आपके पास प्रार्थना करता हूं, कि गुलाम लोगों को अपनी संगत में ले कर के, इन का भी उद्धार करो।
गुरु रविदास जी महाराज ने लाचार असहाय और कमजोर लोगों को आपस में इकट्ठे मिल जुल कर रहने का क्रांतिकारी उपदेश और निर्देश देकर समझाया है, कि जिस प्रकार मधुमक्खियां अपने छत्ते में मिल जुल कर रहती है और एक मधुमक्खी रानी के निर्देश पर शांतिपूर्ण अपना कार्य करती रहती हैं मगर जब कोई उनके छत्ते के ऊपर आक्रमण करता है तो बे रानी मक्खी के आदेश का इंतजार नहीं करती हैं और तुरंत सभी मिल कर आक्रमण करने वाले दुष्ट आक्रांता के ऊपर टूट पढ़ती हैं और उसको मौत के घाट उतार कर ही दम लेती हैं, इसलिए निर्बल लोगों को भी मधुमक्खियों से सीखना चाहिए और आपस में मिल जुल कर रहना चाहिए, अगर कोई उनके मान सम्मान के खिलाफ या उनके अधिकारों को छीनने का प्रयास करें, तो उन्हें मिल कर अपने दुश्मन को सदा सदा के लिए मिटा देना चाहिए, चाहे इस में कितना ही खून खराबा क्यों ना करना पड़े, क्योंकि मधुमक्खियां जब दुश्मन के ऊपर आक्रमण करती हैं, तो उन में से भी कई शहीद हो जाती हैं, मगर जो जिंदा रहती हैं उन के लिए वे दुश्मन का विनाश कर देती हैं
शब्दार्थ:--- चंदन-बहुमूल्य सुगन्धित लकड़ी। अरिंड-औषधि का पौदा। नीच-निम्न स्तर का, घटिया मानसिकता वाला, अबगुणी, निकम्मा।माधउ-आदपुरष, परमेश्वर। मखतूल-रेशम। उपकारी-कल्याणकारी। सुपेद-सफेद, बेदाग। सपीअल-पीला। बपरे-करूप। जस-जैसा, जिस प्रकार। कीरा-कीड़ा। मधुप-शहद की मक्खी। मखीरा-शहद का छता।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
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