।। माटी को पुतरा कैसे नचतु है?

 

        ।।माटी को पुतरा कैसे नचतु है?
             ।। राग आसा।।
गुरु रविदास जी महाराज संसार को एक नाटक मंच मानते हुए फरमाते हैं, कि मानव इस मंच के ऊपर एक पुतले की तरह किस प्रकार नाचता है? यह पुतला मिट्टी से बना हुआ है, जिस प्रकार मिट्टी से असंख्य वनस्पति के पेड़, पौधे उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार इसी मिट्टी से मनुष्य का शरीर उत्पन्न होता है, इसी मिट्टी में जल, वायु, अग्नि और अकाश का संयुक्त योग होता है, जिस के मणिकांचन योग से ही शरीर बनते हैं। यह शरीर संसार रूपी मंच के ऊपर आ कर के अपना अपना अभिनय करने के लिए नर्तन करते हैं। सभी प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ प्राणी मनुष्य जब कुछ प्राप्त कर लेता है, तो बड़ा अहंकार और घमंड अनुभव करता है। खूब धन दौलत कमाता है और फिर जब ये माया खत्म हो जाती है, तो रोने लगता है, दुखी होने लगता है और इस प्रकार सांसारिक आकर्षणों में सम्मोहित हो कर के अपना सर्वस्व बर्बाद कर देता है, गुरु रविदास जी मानव जाति को समझाते हुए फरमाते हैं, कि यह मिट्टी का पुतला एक दिन नष्ट हो ही जाएगा इसलिए आज ही संभल कर परमपिता परमेश्वर अर्थात आदपुरष का ध्यान कर, इसीलिए वे लिखते हैं :---
माटी को पुतरा कैसे नचतु है।।
देखै देखै सुनै बोलै दउरिउ फिरतु है।।१।।रहाउ।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि मिट्टी से बना हुआ पुतला अर्थात मानव काम, क्रोध, मोह लोभ और अहंकार के प्रति आकर्षित हो कर के किस प्रकार धरती के ऊपर बने हुए मंच के ऊपर नाचता फिरता है और सांसारिक ऐश्वर्यों को देख कर के उन के वशीभूत हो कर के सुनता, बोलता और देख देख कर इधर उधर दौड़ता फिरता है अर्थात आजीवन काम, क्रोध, मोह, लोभ माया और अहंकार के कारण दिन रात, चौबीस घण्टे सुख-सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए इधर उधर दौड़ता रहता है।
जब कछु पावै तब गरबु करत है।।
माईआ गई तब रोवनु लगतु है।।१।।
आद पुरुष को विस्मृत कर के जब मानव, धन दौलत संग्रह कर लेता है, तो उसे देख कर के बहुत खुश होता है और बहुत घमंड करता है, मगर जब वह धन दौलत और सुख समृद्धि और ऐश्वर्या समाप्त हो जाते हैं, तो वह रोने लगता है अर्थात पछताने लगता है, गुरु जी का फरमान है कि मनुष्य काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार मैं ही डूब कर सुख समृद्धि और ऐश्वर्या का सामान जुटाता फिरता है और इसी में उस का हीरे जैसा अमूल्य जीवन समाप्त होता जाता है और मृत्यु के समय पछताता है। जब अंत में उस के सभी कर्मों का हिसाब किताब होता है और उनके अनुसार शरीर को मृत्यु के समय यातनाएं मिलती हैं, तो खूब रोता और चिल्लाता है, मगर उस समय मानव के हाथ में कुछ नहीं आता है। जो लोग सत्य के रास्ते पर चलते हुए इमानदारी से हक हलाल की कमाई खाते हुए, सदाचारी जीवन जीते हैं, उनके लिए आदपुरुष ऐसे दुख नहीं देते हैं। इसलिए मनुष्य को अपने जीवन में कर्म करते हुए "सोहम सोहम" जाप करते हुए, हरि को पाने का भी प्रयास करना चाहिए।
मन बच क्रम रस कसाहि लुभाना।।
बिनसि गईआ जाई कहूँ समाना।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज मनुष्य की मन: स्थिति का वर्णन करते हुए फरमाते हैं, कि मनुष्य मन से अनेकों प्रकार की योजनाएं बनाता है और कई कई प्रकार की बातें करता है, संसारिक कार्यों में व्यस्त रह कर के अनेक प्रकार के ऐश्वर्यों  का आस्वादन लेता है और उन्हीं के आकर्षण में उलझा रहता है, परंतु जब ये ऐश्वर्य समाप्त हो जाते हैं, तो फिर कहां जाकर के समा आएगा? यह विचार उस के मन में कभी नहीं आता है अर्थात मनुष्य मन वचन और कर्म के रसों में ही ललचाता रहता है और जब मृत्यु आती है तो फिर कहां जा कर के समा आएगा, यह नहीं सोचता है
कहि रविदास बाजी जगु भाई।।
बाजीगर सउ मोहि प्रीति बनी आई।।३।।६।।
गुरु रविदास जी महाराज मनुष्य को समझाते हुए बताते हैं कि हे भाई! यह संसार एक खेल है जिसमें कई प्रकार की खेलें खेली जा रही हैं, तू भी इस खेल की एक बाजी लगा रहा है, जिसके बाजीगर अर्थात परमपिता परमेश्वर के साथ मेरा प्यार हो गया है, इसलिए आप भी इस खेल को बड़े प्यार से खेलो और बाजीगर के साथ भी प्रेम करो।
शब्दार्थ:--- माटी-मिट्टी। पुतरा-पुतला।नचतु-नाचता है। दउरिउ-दौड़ता। फिरत-फिरना, चलना। गरबु-घमंड। कछु-कुछ। करतू-करता है।माईआ-धन दौलत, सुख, ऐश्वर्य। गई-खत्म हो गई। रोवनु-रोना। लगतु-रोना शुरू करना। बच-वचन। करम-कर्म। रस-स्वाद, आनंद। कसहि- कैसे। लुभाना-आकर्षित करना, लालच देना। बिनसि-विनाश, मौत। कहूँ-कहां, गन्दी जगह। बाजी जगु-सृष्टि के खेल की पारी। बाजी-दांव, खेलने की बारी। प्रीति-प्यार। बनिआई-हो गया। बाजीगर-खेल रचने वाला।

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