।।कहा भइउ जउ तनु भइउ छिनु छिनु।।

 

कहा भइउ जउ तनु भइउ छिनु छिनु।।
                ।। राग आसा।।
गुरु रविदास जी महाराज संगत को समझाते हुए फरमाते हैं, कि ईश्वर को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को प्राणों तक को निछावर करना पड़ता है और अगर प्राणों का बलिदान करने के उपरांत भी यदि परम पिता परमेश्वर अर्थात आद पुरुष के दर्शन हो जाएँ, तो भी बहुत ही सस्ता सौदा होता है। गुरु जी ने स्वयं जिन लोगों के मन में ज्योतिर्ज्ञान का प्रकाश किया है, उन की कड़ी से कड़ी परीक्षा ली थी। महाराजा कुंभसिंह ने कई पाप और अपराध किए थे, परंतु जब उस पापी ने अपनी महारानी झालाबाई के मजबूर करने पर ज्योतिर्ज्ञान की दात ले ली, तब उसी के राज कुमार उदयसिंह ने जातीय घमंड के कारण कुंभ सिंह को कहा, कि पिताश्री आप चमार गुरु रविदास जी को छोड़कर किसी सवर्ण गुरु को अपना लो मगर महाराजा कुंभसिंह जानते थे, कि गुरु रविदास जी महाराज के सिवाय धरती के ऊपर कोई भी जो परिपूर्ण ज्योतिर्ज्ञानी गुरु नहीं है इसलिए उस ने राजकुमार उदय को कहा, बेटा! गुरु रविदास जी महाराज से श्रेष्ठ धरती के ऊपर कोई भी गुरु नहीं है, इसलिए मैं चाहता था कि आप सभी उनकी शरण में जा कर के उन्हें अपना गुरु अपना लो मगर उदयसिंह ने राजा कुंभसिंह को ही आड़े हाथों लेकर कहा, खुद तो आप चमार रविदास के पास जा कर भ्रष्ट हो ही गए हो, अब हमें भी उसे गुरु अपनाने के लिए कह रहे हैं। जब महाराजा कुंभसिंह ने उदय का कहना नहीं माना तो, उस ने तलबार से उन का कत्ल कर दिया था, इसे स्पष्ट हो जाता है कि परमेश्वर को प्राप्त करने के लिए अपने सिर तक का बलिदान करना पड़ता है, इसीलिए गुरु रविदास जी महाराज इस शब्द में आदपुरुष को पाने के लिए कितना बलिदान करना पड़ता है उसका वर्णन करते हैं:---
कहा भइउ जउ तनु भइउ छिनु छिनु।।
प्रेमु जाए तउ डरपै तेरो जनु।।१।।
गुरु रविदास जी आदपुरुष की शरण में बने रहने के लिए फरमाते हैं, कि आप के इस आदमी को इस बात से क्या फर्क पड़ेगा ?  कि मेरे शरीर के चिथड़े चिथड़े हो जाएं, शरीर के प्रत्येक अंग के टुकड़े टुकड़े हो जाएं, मगर डर तो इस बात का लगता है कि कहीं आप के सेवक का, आप के प्रति मन से प्रेम समाप्त ना हो जाए।
इस पद में गुरु रविदास जी महाराज आदपुरुष को पाने के लिए अपने बलिदान की चरम सीमा बताते हैं।
तुझहि चरण अरविंद भवन मनु।।
पान करत पाइउ पाइउ रामईआ धनु।।१।।रहाउ।।
हे आदपुरुष अब मेरे लिए आपके चरण कमल ही महल हैं, जिस के बीच रह कर आप से ज्ञान  रूपी अमृत पी पी कर मैंने राम नाम धन प्राप्त किया है अर्थात ज्योतिर्ज्ञान पाया है। गुरु जी ने बड़े-बड़े विशाल मठों, मंदिरों के निर्माण का भी मजाक उड़ाते हुए फरमाया हैं, कि साधना के लिए केवल और केवल आदपुरुष का महल उन के चरण ही हैं और उन में रह कर पूजा अर्चना करने पर परमपिता परमेश्वर के दर्शन होते हैं।
संपति बिपति पटल माइआ धनु।।
ता महि मगन होत न तेरो जनु।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज अपनी मन:स्थिति को स्पष्ट करते हुए फरमाते हैं, कि हे परम पिता परमेश्वर आद पुरुष! आप की शरण में आने के बाद मुझे सुख-दुख, धन-दौलत, माया और मुशीबतें पर्दा बन कर के रुकावट नहीं डाल सकती हैं। आप के सेवक का मन इन की ओर  तनिक भी आकर्षित नहीं हो पाता है और ना ही इन में तल्लीन रहता है।
जब साधक को आदपुरष के दर्शन हो जाते हैं, तो गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार जैसे शैतान उनके मार्ग में रुकावट नहीं डाल सकते हैं और ना ही उनको अपनी ओर आकर्षित करके साधना में विघ्न डाल सकते हैं।
प्रेम की जेवरी बाँधिउ तेरो जन।।
कहि रविदास छूटिबो कवन गुन।।३।।४।।
गुरु रविदास जी महाराज परम पिता परमेश्वर को अपनी मन:स्थिति का चित्रण करते हुए बताते हैं, कि आप के प्रेमी के गले में प्रेम की पक्की लोहे की जंजीर पड़ चुकी है, वे फरमाते हैं कि अब ये जंजीर किस तरह छूट सकती है अर्थात जंजीर का बंधन आप के प्रेम को कभी भी मुझ से अलग नहीं होने देगा।
शब्दार्थ:--- कहा भइउ- क्या हुआ। जउ- जो। छिनु छिनु-छिछरे, चीथड़े चीथड़े, खण्ड खण्ड, छोटे छोटे टुकड़े। डरपै- भयभीत। अरविंद- कमल। पान-पीना, ग्रहण करना। पाईउ-प्राप्त करना। रामईया-आदपुरष। धनु-धन, सम्पत्ति। बिपति-मुशीबत। पटल-पर्दा, आवरण। महि-बीच। मगन-लीन। जनु-जन, मॉनव। छूटिबो- मुक्त होना, स्वतंत्र होना। जेवरी-गले में डाली जंजीर, रस्सी। कवन-कभ, किस समय। गुन-किस कारण।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।

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