।।दूध त बछरे थनहू बिटारिउ।।

 ।।दूध त बछरे थनहू बिटारिउ।।

          ।।राग गुजरी।।

गुरु रविदास जी महाराज परमपिता परमेश्वर अर्थात आद पुरुष को सृष्टि का विधाता और हर वस्तु का निर्माता बताते हुए फरमाते हैं, कि हे आदपुरुष! आप सर्वश्रेष्ठ, सर्वोच्च कायनात के मालिक हो। मैं कुछ भी आपको अर्पित नहीं कर सकता हूं, क्योंकि सारी वनस्पति आप ने नहीं बनाई हुई है, उस में से कुछ भी आपको नैवेद्य करने लायक नहीं है। गुरुजी फरमाते हैं कि:---

दूध त बछरे बनहू बिटारिउ।।

फ़ूलु भँवरि जलु मीनि बिगारिउ।।१।।

तिलकधारी ब्राह्मण पंडे पुजारी मंदिरों में बैठ कर के खूब घंटे घड़ियाल बजा कर, मूर्तिकार द्वारा लोहे की छेनी से घड़ी गई, पत्थर की बनाई हुई मूर्तियों को धूप, दीप, कर के उन्हें भोजन अर्पित करते हैं। तरह-तरह के आडंबर और पाखंड कर के संगत को लूटते हैं मगर इन आडंबरों को देख कर के, गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि हे आदपुरुष! अगर आपको पवित्र दूध चढ़ाऊं तो वह पहले ही बछड़े ने जूठा कर रखा है, यदि फल, फूल अर्पित करूं तो उन को भी भ्रमरों ने जूठा कर दिया है, अगर आप को पवित्र गंगाजल से स्नान करवाऊं तो उस को भी मच्छलियों ने अपवित्र कर रखा है, इसलिए हे मेरे गोविंद! मैं आप की पूजा में क्या चढ़ाऊँ? क्योंकि धरती पर कुछ भी आप को चढ़ाने लायक नहीं है, इसलिए मैं आप को कुछ भी अर्पित करना उचित नहीं समझता हूं।

माई गोविंद पूजा कहा लै चरावउ।।

अवरू न फ़ूलु अनूप न पावउ।।१।।रहाउ।।

गुरु रविदास जी महाराज परम पिता परमेश्वर के आगे फरियाद करते हैं , कि हे आदपुरुष! मैं आपको चढ़ाने के लिए पूजा सामग्री कहां से लाऊं, मुझे कहीं भी अनूठी, अनुपम पवित्र पूजा सामग्री नहीं मिलती है, जिस को पाकर मैं आप को अर्पित कर सकूं।

मैलागर बेहरे है भुईअंगा।।

विखु अमिरतु बसहि इक संगा।।२।।

गुरु रविदास जी चंदन की अपवित्र के बारे में फरमाते हैं, कि चंदन के विशाल जंगल भी वलबड़े-बड़े विषैले सांपों के साथ भरे हुए हैं, जो चंदन की सुगंध लेने के लिए चंदन के पेड़ों के साथ चिपके रहते हैं। इन सुगन्धित वृक्षों पर विष और अमृत एक साथ निवास करते हैं। चंदन में भी सांपों का विष समरस होने के कारण, वह भी आप को चढ़ाने लायक नहीं है, इसलिए चंदन भी आपको अर्पित करने के लिए पवित्र नहीं है।

धूप दीप नवेदहि बासा।।

कैसे पूज करहि तेरी दासा।।३।।

गुरु रविदास महाराज पूजा सामग्री की पवित्रता के बारे में फरमाते हैं, कि धूप, दीप और सुगंधित चंदन ये सभी आप के द्वारा ही तैयार किए गए हैं। ये भी, सभी अपवित्र होने के कारण आप को अर्पित करने के लायक नहीं है, फिर मैं दास गुरु रविदास आपकी पूजा कैसे कर सकता हूं।

तनु मनु अरपउ पूज चरावउ।।

गुर परसादि निरंजनु पावउ।।४।।

गुरु रविदास जी महाराज ब्राह्मणों द्वारा तैयार की गई हर किस्म की पूजा सामग्री का खंडन करते हुए फरमाते हैं, कि यह सामग्रियां आपको अर्पित करने के लिए उचित नहीं है, इसलिए मेरा शरीर और मन आप की सेवा में अर्पण कर के इन्हें पूजा में चढ़ाता हूं। गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि आप के प्रसाद के बिना आप को पाया नहीं जा सकता, इसीलिए हे परमपिता परमेश्वर! दूध, फल, फूल,गंगाजल, चंदन, अमृत, धूप, दीप और चिराग आदि जूठे पदार्थ सभी व्यर्थ और अपवित्र हैं, इसलिए ये सब आपकी पूजा में के योग्य नहीं है और वैसे भी यह आप की पूजा के लिए जरूरी नहीं है।

पूजा अरचा आहि न तोरी।।

कहि रविदास कबन गति मोरी।।५।।१।।

गुरु रविदास जी महाराज ब्राह्मणों द्वारा तैयार की गई पूजा सामग्री का जोरदार खंडन करते हुए फरमाते हैं, कि ये सभी वस्तुएं आप की पूजा अर्चना के लिए जरूरी नहीं है, इन बहु कीमती वस्तुओं को गरीब लोग इकट्ठा नहीं कर सकते हैं, जिस से वे आपकी पूजा नहीं कर सकते हैं, ऐसी हालत में हम कभी भी आप की पूजा नहीं कर सकते थे। हे आदपुरष! ऐसे में हमारा क्या हाल होता? इस लिए इन वस्तुओं की जगह आप का दिया हुआ तन और मन ही हम पूजा में अर्पित करते हैं। हे मेरे परमपिता परमेश्वर अर्थात आदपुरुष! हम आप की निस्वार्थ भाव से भक्ति करते हैं, इसलिए हमें अपने दर्शन देकर कृतार्थ करो।

रामसिंह आदवंशी।

अध्यक्ष।

विश्व आदधर्म मंडल।।


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