जउ हम बांधे मोह फ़ास।।

 

   ।।जउ हम बांधे मोह फ़ास।।
             ।। राग सोरठ।।
इस शब्द के अध्ययन और विश्लेषण करने पर यह ज्ञात होता है, कि गुरु रविदास जी महाराज ने आदपुरुष के साक्षात दर्शन कर लिए थे, तब उन्होंने अनुभव किया था कि, ईश्वरीय मोह और आकर्षण किस प्रकार का होता है ? जब आद पुरुष से जीव का बंधन पड़ जाता है, तो बंधन  कभी भी नहीं टूटता है, मगर ईश्वर तो हर कदम पर जीव की परीक्षा लेता रहता है क्योंकि मनुष्य के साक्षात्कार (मिलन) के बाद भी काम, क्रोध, मोह, लोभ अहंकार और माया उस का साथ नहीं छोड़ती हैं और हर कदम कदम पर परिपूर्ण ज्योतिर्ज्ञान के संतो, महंतों और पैगंबरों की भी परीक्षा जारी रहती है, जिस के उदाहरण सतगुरु कबीर जी, सतगुरु नामदेव जी, सतगुरु मीराबाई जी हमारे सामने हैं। जब इन सभी महात्माओं ने आदपुरष के दर्शन कर लिए थे, तब भी इन को सामाजिक अत्याचारों का सामना करना पड़ा था मगर सभी अपने सन्मार्ग से कभी विचलित नहीं हुए थे और सांसारिक यातनाओं को सहन करते हुए जीवन व्यतीत करते रहे, अगर कोई कहे कि  मिलन के बाद मनुष्य को ईश्वर से अलग नहीं किया जा सकता है, ये तर्कपूर्ण नहीं है, क्योंकि मॉनव फिर भी भटक सकता है। गुरु रविदास जी महाराज सत्य को उजागर करते हुए इस शब्द में फरमाते हैं, कि जिस मनुष्य की इच्छा शक्ति दृढ़ होती है, उसे तो कोई तनिक भी डगमगा नहीं सकता है और उस का प्रेम का बंधन नहीं टूटता है मगर जो रास्ते में भटक जाते हैं, वे ना तो घर के रहते हैं और ना घराट के रहते हैं।
जउ हम बांधे मोह फ़ास।
हम प्रेम बंधनी तुम बांधे।।
अपने छूटन को जतनु करहू।
हम छूटे तुम अराधै।।१।।
गुरु रविदास जी महाराज ने इस शब्द में हम शब्द का प्रयोग किया है और इस से स्पष्ट होता है, कि उन्होंने मनुष्य को काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार में डूबे रहने के कारण बताया है, कि जब तक मनुष्य जाति इन बंधनो में बंधी रहती है, तब तक वह दुखों में ही उलझी रहती है परंतु जो मनुष्य आदपुरुष की निरंतर भक्ति करता है और उस से सच्चा प्रेम करता है, तो ईश्वर मनुष्य के प्रेम बंधन में बंध जाता है, फिर उस प्रेम के बंधन को कोई तोड़ नहीं सकता है। गुरु जी फरमाते हैं कि, हे आदपुरष! अब हम ने आप को अपने प्रेम के फंदे में जकड़ लिया है। अब तुम चाहे कितना भी परेशान करो तुम हमारे बंधन से मुक्त नहीं हो सकते हो, चाहे कितनी ही साधना तपस्या और आराधना करो अब इस से मुक्त होना संभव नहीं है।
माधवे जानत हहू जैसी तैसी।
अब कहा करू गे ऐसी।।१।।रहाउ।।
हे आदपुरुष! आप अच्छी तरह जानते हैं, कि मेरे और आप के बीच कैसा संबंध है? ऐसी हालत में आप क्या कर सकोगे? अर्थात इस परिपक्व और अथाह प्रेम से आप छुटकारा नहीं पा सकते हैं।
मीनु पकरि फांकिउ अरु काटिउ।
रान्धी कीउ वह बानी।।
खंड खंड करि भोजनु कीनो।
तउ न बिसरिउ पानी।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज सच्चे प्रेम का उदाहरण देते हुए मछली का प्रमाण देते हैं, कि मछली को पकड़ कर उसके टुकड़े-टुकड़े भी कर दिए जाते हैं और उसको छील कर, भून कर अनेकों प्रकार से पकाया जाता है, उस के मांस के टुकड़े टुकड़े कर के खाया जाता है, मछली का मांस खाते समय भी बार-बार पानी मांगता है और आदमी पानी पीता रहता है। जली भुनी हुआ मछली पेट में जा कर के भी पानी को कभी नहीं बुलाती है और खाने वाले को पानी पीने के लिए विवश करती रहती है। गुरु रविदास महाराज फरमाते हैं कि सच्चे प्रभु प्रेमियों का भी हाल मछली की तरह ही होता है, चाहे उन्हें कितनी भी सजा क्यों ना दे दी जाए, वे कभी भी अपने मार्ग से नहीं भटकते हैं और प्रभु के प्रेम के साथ ही बंधे रहते हैं। सच्चे प्रभु प्रेमियों की कैद से आदपुरष कभी निकल नहीं पाता है।
आपन वापै ना ही किसी को।
भावन को हरि राजा।।
मोह पटल सभु जगतु बिआपिउ।
भगत नहीं संतापा।।
ब्राह्मणों ने आदपुरुष को अपनी पैतृक संपत्ति मान रखा है, उस के ऊपर अपना एकाधिकार जमा कर के दूसरों को भक्ति करने से रोक रखा है, इसलिए गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, हे आद पुरुष राजा! आप किसी के बाप की जागीर नहीं है। किसी की बपौती नहीं है। आप तो उस के हैं, जिस के मन को आप अच्छे लगते हैं। मोह माया का पर्दा सारे विश्व में फैला हुआ है। इस पर्दे (घुंघट) का आवरण केवल आदपुरुष का नाम जपने वाले भक्त ही दूर कर पाते हैं। यह आवरण आदपुरुष के प्रेमियों को दुखी नहीं कर पाता है अर्थात आद पुरुष से प्रेम करने वाले सदा सुखी और खुशी रहते हैं।
कहि रविदास भगति इक बाढ़ी।
अब इह का सिऊँ कहीऐ।।
जा कारनी हम तुम अराधै।
सो दुखु अजहू सहिऐ।।४।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज के शब्दों में आदपुरुष से भगत कहते हैं, कि हे आदपुरुष! अब हमारी और आपके बीच भगति इतनी अधिक विकसित हो चुकी है, कि जिस के बारे में हम किसी को भी बता नहीं सकते हैं, जिस कारण हम ने आप की आराधना की है, आप को पाने के लिए साधना की है, वह दुख हम आज भी सहन कर रहे हैं अर्थात जो जो यातनाएं ब्राह्मणों ने भक्ति करते समय हमें दी हैं, उन को हम ने बड़ी शालीनता के साथ सहन किया है, जिन का वर्णन हम किसी के सामने नहीं कर सकते हैं, कि परमपिता परमेश्वर हम ने आप को पाने के लिए असंख्य अत्याचारों को बर्दाश्त किया है। अब हमारा प्रेम इतना प्रगाढ़ हो चुका है, कि हम उसका प्रदर्शन किसी के सामने नहीं कर सकते हैं।
शब्दार्थ:--- मोह फ़ास-प्यार का फंदा /संबंध। बंधनी-बंधन। अराधै-आराधना/भक्ति करना। फांकिउ-टुकड़े टुकड़े करना। रान्धी-हांडी में पकाना। बहू बानी- विभन्न प्रकार से, कई तरीकों से। बिसरिउ-भूलना। भावन-मन को अच्छा लगना, प्रेम, प्यार। पटल-अंधकार, अज्ञानता का पर्दा। बिआपिउ-बुरी तरह व्यवहार करना, पेश आना। संताप-पीड़ा, दर्द, दुख। कारनी-करनी। सिऊँ-से।  बाढ़ी-बढ़ना, विकसित। अजहू-अभी तक। सहीऐ-सहन करना।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।।

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