हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरे।।
।।हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरे।।
।।राग आसा।।
गुरु रविदास जी महाराज ने हरि शब्द का प्रयोग आदपुरष के लिए किया हुआ है इसीलिए उसकी महिमा का वर्णन करने के लिए इस शब्द में हरि का बार बार सात बार प्रयोग किया गया है। गुरु जी फरमाते हैं कि आदपुरुष सर्वगुण संपन्न है, वह परिपूर्ण गुरु भी है और उसकी रचना भी विस्मयकारी है। आदपुरुष ने जल थल के ऊपर जिस प्रकार जीव जगत की रचना की हुई है और वनस्पति को जंगलों में उत्पन्न किया है, वह उन की अलौकिक सोच समझ और बुद्धि का ही चमत्कार है। हरि को प्राप्त करने के लिए उन्होंने "सोहम" शब्द का अविष्कार किया है। "सो" का अर्थ है "वह" और हम का अर्थ है "मैं" अर्थात प्राणी की आत्मा। वास्तव में, हरि और जीव दोनों का मिलन ही पवित्र सोहम शब्द के जाप से होता है, क्योंकि गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि:---
सोहम, सोहम जप लै, सोहम सोहम जाप।। सोहम सोहम जपदे लभ लवेंगे आप।।
उठत बैठत जागत सोवत जपिया सोहम जाप।।
गुर ऐनक में नैन रचे तिस कोल वसै हरि आप।। गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, बादशाह की कुर्सी पर बैठे हुए हरि को पाने के लिए केवल सीढ़ी सोहम सोहम ही है, जिसके ऊपर चढ़कर के ही मानव हरि तक पहुंच सकता है, जिस के अतिरिक्त आदमी के पास और कोई साधन नहीं है, इसलिए हरि और सोहम का आपस में अटूट संबंध है। हम जहां भी बैठे हुए हों वहीं सोहम जाप करने पर हरि स्वत: वहीं आ जाते हैं और मानव के सिमरन को सुन लेते हैं। हरि को पाने के लिए गुरु रविदास जी महाराज, गुरु कबीर जी गुरु नामदेव जी, गुरु सेन जी गुरु सदना जी, गुरु धन्ना जी, गुरु पीपा जी आदि सभी आध्यात्मिक गुरुओं ने "सोहम" का ही प्रयोग ध्यान लगाने के लिए किया है। यदि हरि आराध्य है तो उसे प्राप्त करने के लिए सोहम शब्द उस तक पहुंचने वाली गोलडन सीढ़ी है।
हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरे।।
हरि सिमरत जन गए निस तरि।।!१।।रहाउ।।
गुरु रविदास जी महाराज ने इस शब्द में हरि शब्द का सात बार उच्चारण कर के आदपुरष की सर्वोच्चता का महत्व बताया हुआ है। गुरु जी फरमाते हैं, कि जिन लोगों ने हरि को समक्ष रख कर उस को प्राप्त करने के लिए "सोहम" का जाप किया है, व सभी संसार रूपी सागर से पार हो गए हैं अर्थात संसारिक बंधनों से मुक्त हो गए हैं। काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार जैसे विषैले सांपों से सुरक्षित हो गए हैं। गुरु कबीर जी सोहम का जाप करते हुए "हरि" को प्राप्त कर गए हैं और संसार में अपना नाम भी रोशन कर गए हैं। उनके जन्म के सारे पाप खत्म हो गए हैं। हरि का ध्यान लगाने से ही गुरु नामदेव जी ने आदपुरष को दूध पिलाया था, इसलिए उन्हें संसारिक मुसीबतें परेशान नहीं कर पाई थी। गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि जो हरि अर्थात निराकार राम के रंग में रंग जाते हैं, वे सभी परिपूर्ण गुरु के प्रसाद रूपी आशीर्वाद से मुसीबतों से सुरक्षित रहते हैं अर्थात धरती के ऊपर किसी भी प्रकार के नर्क रूपी मुसीबत से दुखी नहीं होते हैं।
हरि के नामु कबीर उजागर।।
जनम जनम के काटे कागर।।१।।
गुरुओं के गुरु संत शिरोमणि गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि सोहम, सोहम जाप कर के हरि को सतगुरु कबीर ने पाया है, हरि नाम के कारण ही उन्होंने अपना नाम सारे संसार में रोशन किया है और अपने जन्म के पापों को मिटा लिया है।
निमत नामु देऊ दूध पीआईआ।।
तउ जग जनम संकट नहीं आईआ।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि हरि के निमित्त अर्थात हरि को पाने के लिए नामदेव जी ने भी सोहम की सीढ़ी का प्रयोग करते हुए हरि के दर्शन किए हैं और उनको अपने हाथों से दूध पिलाया है, उनको ब्राह्मणों ने खूब सताया मगर उन्हें कोई भी मुसीबत दुखी नहीं कर पाई थी, अर्थात जिन्होंने हरि को पाया है, सभी संकट मुक्त हो जाते हैं। गुरु जी संगत को उपदेश देते हैं, कि आप भी नामदेव की तरह "सोहम" का जाप करते हुए हरि के दर्शन करने का प्रयास करो तभी तो आप मुसीबतों, दुखों और कष्टों से बच सकते हैं।
जन रविदास राम रंग राता।।
इऊँ गुर प्रसादि नरक नहीं जाता।।३।।५।।
गुरु रविदास जी महाराज सिमरन का महत्व बताते हुए समझाते हैं, कि जिन जिन लोगों ने हरि की भक्ति की है, उस का भजन और कीर्तन किया है, उसका सत्संग किया है और दूसरों को भी उस को पाने के लिए रास्ता बताया है,वे भी हरि के रंग में रंग कर हरि का स्वरूप बन गए हैं। उन का भी परमात्मा में विलय हो गया है, ऐसे लोग संसार में आ कर गुरु के प्रसाद से आदियों, व्यादियों से बचे रहते हैं, अर्थात दुख रूपी नर्क से बचे रहते हैं। सिमरन करने से जीव के अंदर इतनी शक्ति पैदा हो जाती है कि "सोहम सोहम" जाप करते करते आत्मा और परमात्मा, जीव और हरि एकाकार हो जाते हैं।
शब्दार्थ:--- हरि-आदपुरष। हरे-दूर करना, हटाना। सिमरत-मनन करना, सोहम सोहम जपना। निसतरि-सोहम सोहम जाप कर के संसार में सुखी रहना, भवसागर में दुखों से छुटकारा पा कर आनंदमय जीवन जीना। उजागर-प्रसिद्ध होना। कागर-पाप, काले अर्थात बुरे कार्य, बुरे कर्मों के परिणाम। निमत-समर्पित, के लिए। पीआईआ-पिलाना। संकट-मुशीबत, दुख। रंग राता-अलौकिक रंग में रंग जाना। प्रसादि-ईश्वरीय कृपा, दया, मेहर।
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