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तत्त सिद्धांत ।।भाग छः।।

..तत्त्व सिद्धांत।। भाग। ये शलोक गुरु रविदास जी का है।। शलोक "हरि सो हीरा छाँड़ि कै" के कर्ता बारे विद्वान एक मत नहीं हैं। डाक्टर साहब सिंह और जसवीर सिंह साबर इस शलोक को गुरु कबीर जी का मानते हैं। डा सावर ने ऐसा मानते हुए कोई दलील नहीं दी है। केवल वे फुट नोट के बीच लिखते हैं कि:--- सब प्रतियां के बीच यह साखी गुरु रविदास जी के नाम के नीचे है जब कि श्री गुरु ग्रँथ साहिब के अंदर ये साखी कबीर जी के शलोक नंबर २४३के ऊपर है। पहली बात ये है कि शलोक नंबर २४३ है नहीं ये शलोक नंबर २४२ के ऊपर दर्ज है। डा सावर ने बिना विचार किये ही मॉन लिया है, इस निर्णय ने विवाद तो किया ही है, इस ने आम व्यक्तियां को भी गुमराह किया है,उस का ये निर्णय सही नहीं लगता है। डाक्टर साहब सिंह ने भी बिना दलील देते ही यह तर्क रहित निर्णय दे दिया है, कि वे शलोक नंबर २४२ को गुरु कबीर का बताते हुए इस निम्न नोट के बीच लिखते हैं:---- "! भगत नामदेव जी और गुरु रविदास जी के कोई शलोक नहीं हैं, सिर्फ शब्द हैं। जिस प्रकार शलोक नंबर २४२ को गुरु कबीर जी के अपने उच्चारे हुए हैं, वैसे ये शलोक नंबर २१२ और  २१३ कबीर जी के अपने...

तत्त सिद्धांत।। भाग पाँच।।

।।तत्त सिद्धांत भाग पाँच।।                ।।सोहम।                 इक़ ओंकार -------------------------------------------------- इक़।                          ओंकार ऊर्जा।                         ऊर्जा के तीन हिस्से      ------ ------------------------------------------ उ।                      अ।                    म। जन्म देने वाला।  पालन करने वाला।   संहारक ब्रह्मा।                विष्णु                    महेश इलेक्ट्रान।           न्यूट्रॉन।                प्रोटान ब्रह्मा विष्णु महेश आदि भगवानों को रद्द कर के सिद्ध किया गया है कि ये तीन गुणं (१) सृष्टि की उतपत्ति है (२)उस की पालना करना (३) उस का संहार करना महापुरुषों की ही शक्तियाँ हैं।उपरोक्त भगवान देहधारी और पारब्रह्म की ही रचना है। सृष्टि की हर रचना के बीच वह आप विचर रहा है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश के बीच भी वह आप ही विराजमान हैं, फिर पारब्रह्म की अपनी रचना ही उस की बराबरी किस प्रकार कर सकती है? इस कर के ये तीन देहधारी भगवान उस की शक्तियों के मालिक नहीं बन सकते। यही विचार गुरु नानकदेव जी ने जपुजी के बीच निरूपित कर के इक़ ओं...

तत्त सिद्धांत।। भाग चार।।

।।तत्त सिद्धांत भाग चार।। सो सोहम के बीच ओम व्यापक है।सोहम के इस गुप्त रूप ओम को प्रकट कर के विश्व व्यापी विचारधारा के आधार ओम को इक़ ओंकार का स्वरूप दिया है। इस तरह से हम ओम और इक ओंकार तीनों शब्दों के अर्थो में कोई अंतर नहीं मानते है। हरि जपत तेऊ जन वाले शब्द के बीच गुरु रविदास जी ने सोहम ओम को और व्यापक अर्थों के बीच खोल कर व्याख्या की है। इस व्याख्या के साथ सोहम ओम का स्वरूप बदल कर इक ओम बन गया है। सो उन्होंने सोहम को इक ओंकार का स्वरूप देकर विश्व व्यापी विचारधारा को परिपक्वता और दृढ़ता प्रदान की है। उन का कथन है कि:--- हरि जपत तेऊ जना पदम् कवलासपति तास सम तुल नहीं आन कोऊ।। एक ही एक अनेक होई बिस्तारियो आन रे आन भरपूर सोऊ।। रहाऊ।। इस शलोक में आए हरि के अर्थ को इस शब्द के बीच दर्ज हरि स्पष्ट करता है। ये स्पष्ठता भी रहाऊ के अधीन है। रहाऊ वाले बन्द के बीच समूचे शब्द का बुनियादी सिद्धांत और मुख्य मंतव्य होता है इस तरह हरि के अर्थों की स्पष्टता और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। इस के बीच आए हरि के अर्थ हैं, पारब्रह्म केवल और केवल एक हैं। विष्णु महेश और ना कोई अन्य ब्रह्मा आदि हरि भगत के भी बराब...

तत्त सिद्धांत। भाग दो।।

।। तत्त सिद्धांत भाग दो।। इन दोनों सिद्धांतों को गुरु रविदास जी ने दो दृष्टांत देकर और भी स्पष्ट कर दिया है, जिस प्रकार: सोना (सो) सोने का ही अंश है (हं), अहं का ही संक्षेप) से बने गहने हैं: जब सोने के आभूषणों को ढाल (समेट) लिया जाता है, तब वे सोना ही बन जाते हैं। जिस प्रकार पानी सो और पानी अंश (हं) लहरें हैं: जब लहरें मिट जाती हैं तब वे पानी ही बन जाती हैं। उसी प्रकार पारब्रह्म (सो) और पारब्रह्म की अंश आत्मा (हं) सृष्टि के बीच निरूपित है: जब सृष्टि समेटी जाती है, तब पारब्रह्म की अंश आत्मा (हं) पारब्रह्म सो के बीच समा जाती है। स्पष्ट है कि तोहि (सो) और मोहि (हं) एक ही हैं। इन के बीच कोई भी अंतर नहीं है। इस तरह परिपक्व हो गया है कि:--- सो-वह भाव पारब्रह्म तोहि -उ हैं-अंश भाव पारब्रह्म की अंश, मोहि -अं उ, वह का संक्षेप है और अं, अंश का संक्षेप है। सो " सोहम "सिद्धांत की स्थापना के साथ ही साथ ओम की स्थापना भी सिद्ध हो गई है और सोहम ओम से सृष्टि के सृजन का संकल्प भी दृढ़ हो गया है। इस की परिपक्वता गुरु नानक देव जी के निम्नलिखित लिखे गए शब्द से हो जाती है। उअंकारी ब्रह्मा उतपत्ति।।...

।।तत्त सिद्धांत भाग दो।

।।सोहम/इक ओंकार के सिद्धांत का निरूपण।। गुरु ग्रँथ साहिब के बीच दर्ज भगतों की वाणी के बीच आज तक किसी भी विद्वान ने मूलमंत्र का तत्त सिद्धांत ढूंढने की कोशिश नहीं की।पलेठा सिद्धांतात्मक अध्ययन होने के कारण भगतों की वाणी के बीच मूलमंत्र के सिद्धांतात्मक विचारों की खोज कर के सिद्धांत स्थापित करना एक कठिन कार्य बन गया है। ये इस कारण बन गया है, क्योंकि पहले ऐसा कोई मॉडल उपलब्ध नहीं है, चाहे वाणी की खास कर के जपु जी की चर्चा करते हुए विद्वानों ने सिद्धांतक मॉडल स्थापित किये हैं। शलोक हरि सो हीरा छाँड़ि करी----के बीच सोहम इक ओम का सिद्धांत उपलब्ध है। सोहम से ही सृष्टि का सृजन हुआ है। इस की पुष्टि के लिए नीचे अध्ययन करते हैं। इस शलोक के आरंभिक तीनों शब्दों का अर्थ पार ब्रह्म प्रभु बनता है। "हरि" का अर्थ पारब्रह्म है, "सो" का अर्थ पारब्रह्म है और हीरा का अर्थ भी करतार अर्थात पारब्रह्म ही है। इस के साथ एक और महत्त्वपूर्ण विचार स्पष्ट होता है---- "हरि" एक वचन हैं, "सो" एक वचन है और "हीरा" भी एक वचन है। इस से बड़ी परिपक्वता के साथ दृढ़ हो जाता है, कि ...

सिंधुघाटी सभ्यता और ज्योतिर्मंडल गुरु रविदास जी।

सिंधुघाटी सभ्यता और ज्योतिर्मंडल गुरु रविदास जी।।। विदेशियों लेखकों ने, गुरु रविदास जी महाराज को समझा परखा और माना है कि वे विश्व की अमूल्य धरोहर है, इसीलिए मार्क आदि अनेकों इतिहासकारों ने गुरु जी के बारे में लिखा है, जो आज हमारे लिए प्रेरणास्रोत बना हुआ है। यदि ये जातिवाद के दुश्मन ना लिखते तो आज गुरु रविदास जी गुमनाम दुनियां में ही होते। केवल गुरु रविदास जी के इतिहास को मिटाने का काम ब्राह्मणों ने ही नहीं किया है, अपितु बुद्ध और सिख मत ने भी भी पूरा ऐड़ीचोटी का जोर लगा कर अपनी जातिवादी मानसिकता को प्रदर्शित किया है। आज भी इन मतों के प्रचारक गुरु जी का नाम ले कर अपनी संख्या बढ़ाने के लिए उन का सहारा लेते हैं मगर अंदर खाते सभी गुरु जी का विरोध ही करते हैं। सिखों के अवतार गुरु नानकदेव जी गुरु रविदास जी के शिष्य हुए हैं मगर सिखों ने गुरु नानकदेवजी के नाम पर अनेकों आलीशान गुरुदुआरे, मूलमंत्र भवन तोरण आदि बना कर उनको सम्मानित कर रखा है, मगर गुरु रविदास जी के नाम पर कहीं एक ईंट तक नहीं लगाई है। अमर ऐतिहासिक तीर्थ सुल्तानपुर लोधी तो केवल गुरु रविदास जी के कारण ही विश्व में प्रसिद्ध हुआ था, गुर...

सिंधुघाटी सभ्यता में गुरु रविदास जी का दर्शन झलकता है।।

।।सिंधुघाटी सभ्यता में गुरु रविदास जी का दर्शन झलकता है।। इस्लाम दर्शन जिसे अब अरब दर्शन भी कहा जाता है, उस के मुख्य चार आयाम निम्नलिखित हैं:--- मुतजलवाद (बुद्धिवाद)। अशअरवाद (पांडित्यवाद)। सूफीवाद (रहस्यवाद)। दर्शन। इस्लाम मुतजलवाद हिजरी सम्मत की प्रथम शताव्दी का अंत होते समय स्थापित हुआ था। ये धर्म ईश्वरीय एकत्व तथा ईश्वरीय न्याय पर आधारित था। ईश्वरीय एकत्व से अभिप्राय है, केवल अद्वैत  अर्थात अकेला एक आदपुरुख सर्वोच्च, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान है। अशअरवाद :---अपने समय में अशअरवाद, मुतजलवाद के विरुद्ध एक प्रतिक्रियात्मक आंदोलन था। सूफीवाद:---ये आयाम आत्मा परमात्मा के बीच के गुप्त रहस्य अर्थात भेद को जानने का प्रयास करता है। इस का मूल दर्शन है अपने अंतःकरण को किस प्रकार पवित्र बनाएं, अपना नैतिक धरातल कैसे मजबूत बनाएं? अपने आंतरिक और बाह्य जीवन का कैसे निर्माण करें, ताकि शाश्वत आनंद की प्राप्ति हो सके। इस्लाम दर्शन:---इस्लाम धर्म के अभ्युदय से पूर्व मेसोपोटामिया सभ्यता में हरनि तथा मिश्र में अलेक्सानड्रिया अपनी हैलेनिक संस्कृति के कारण प्रसिद्ध था।ओमैद काल के अरब साम्राज्यवादी गैर अरबियो...